अविनाश चंद्रा's blog

मैं हिंदी हूँ, मैं भाषा हूँ। मैं राष्ट्रगौरव की अभिलाषा हूँ।।
मैं सज्जा हूँ, मैं जीवन हूँ। मैं भावों का दर्पण हूँ।।
मैं अमृत हूँ, मैं संगत हूँ। मैं प्रेम की चिर यौवन हूँ।।
मैं हिंदी हूँ, मैं भाषा हूँ। मैं राष्ट्रगौरव की अभिलाषा हूँ।।

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दुनिया भर में 67 करोड़ लोगों के द्वारा प्रयुक्त की जाने वाली ‘हिंदी’ विश्व की तीसरी सबसे अधिक बोली जाने वाली भाषा है। मैंड्रिन (चीनी) और अंग्रेजी का स्थान क्रमशः पहला और दूसरा है। दुनिया भर में एक ओर जहां तमाम भाषाएं विलुप्त हो रही हैं और उनके संरक्षण और संवर्द्धन के लिए अनेक कदम उठाने की जरूरत पड़ रही है वहीं हिंदी का प्रसार दिन दूनी रात चौगुनी गति से हो रहा है। लेकिन ऐसा हमेशा से ही नहीं था। आजादी के पहले व बाद में हिंदी के प्रचार प्रसार के लिए व्यक्तिगत और संस्थागत स्तर पर प्रयास किए जाते रहे। लोकमान्य तिलक, लाला लाजपत राय, पं.

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सर होर्म्सजी फ़िरोज़शाह मोदी को सर होमी मोदी के नाम से जाना जाता है। वह एक प्रसिद्ध पारसी व्यवसायी थे, जो टाटा समूह से जुड़े और भारत के प्रशासक बने। वह 1929 से 1943 तक 14 वर्षों के लिए भारतीय विधान सभा के सदस्य थे। उन्होंने वायसराय की कार्यकारी परिषद में अपनी सेवाएं प्रदान की थी। होमी मोदी को भारत की संविधान सभा के सदस्य के रूप में भी चुना गया था। मुंबई में एक सड़क का नाम उनके नाम पर ‘सर होमी मोदी स्ट्रीट’ रखा गया है।

होमी मोदी का प्रारंभिक जीवन

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शेतकरी संगठन के संस्थापक शरद अनंतराव जोशी का जन्म 3 सितंबर 1935 को हुआ था। आरंभिक जीवन में वह एक प्रोफेसर और ब्यूरोक्रैट थे किंतु उन्हें सबसे ज्यादा प्रसिद्धि और आदर उनके द्वारा किसानों के अधिकारों के लिए छेड़ी गई मुहिम के कारण प्राप्त हुई। वे एक ऐसे विरले भारतीय उदारवादी चिंतक थे जिन्होंने वातानुकूलित कमरे की बजाए धरातल पर काम किया।

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बहुमुखी प्रतिभा के धनी रवींद्रनाथ टैगोर का जन्म 7 मई, 1861 को बंगाली परिवार में हुआ था। उनके पिता का नाम देवेंद्रनाथ टैगोर और माता का नाम शारदा देवी था। उनकी स्कूल की पढ़ाई प्रतिष्ठित सेंट जेवियर स्कूल में हुई। टैगोर ने बैरिस्टर बनने की चाहत में 1878 में इंग्लैंड के ब्रिजटोन पब्लिक स्कूल में नाम दर्ज कराया। उन्होंने लंदन कॉलेज विश्वविद्यालय में कानून का अध्ययन किया लेकिन 1880 में बिना डिग्री हासिल किए ही वापस आ गए। रवींद्रनाथ टैगोर को बचपन से ही कविताएं और कहानियां लिखने का शौक था। वह गुरुदेव के नाम से लोकप्रिय थे। भारत आकर गुरुदेव ने फिर से

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यह कहने की आवश्यकता नहीं कि मैं प्रतिबंध के पक्ष में नहीं हूं। मैं शराब पर प्रतिबंध के पक्ष में नहीं हूं। मैं सिगरेट पीने पर लगाए गए प्रतिबंध के पक्ष में नहीं हूं; मैं सैक्रीन व साइक्लामेट पर प्रतिबंध के पक्ष में नहीं हूं वरन मैं बस इस पक्ष में हूं कि हर किसी को खतरों से अवगत कराया जाए और उन्हें इस बात की छूट मिले कि अपनी पूरी बुद्धिशीलता व अपने निर्णय के अनुसार वे वही करें जो करना चाहते हैं।

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विधवा महिलाओं के मसीहा और सहनशीलता, सादगी तथा उदार विचारधारा के लिए प्रसिद्ध महान शिक्षाशास्त्री ईश्वर चन्द्र विद्यासागर का 26 सितंबर 1820 को पश्चिमी मेदिनीपुर जिला, पश्चिम बंगाल में एक गरीब परिवार में हुआ था। उनके बचपन का नाम ईश्वरचंद्र बन्दोपाध्याय था। वे बंगाल के पुनर्जागरण के स्तम्भों में से एक थे। वे महान दार्शनिक, समाजसुधारक और लेखक के रूप में जाने जाते हैं।

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कोरोना महामारी से मंद पड़ी कारोबार की रफ्तार की तेज करने के लिए हरियाणा सरकार जिला स्तर पर तैनात नोडल अफसरों को और अधिक शक्तियां प्रदान करने जा रही हैं। राज्य को उम्मीद है कि कारोबार की सुगमता बढ़ाए जाने से जहां राज्य में निवेश के द्वार खुलेंगे वहीं कोरोना काल में गिरे राजस्व संग्रह में भी सुधार की संभावना बढ़ेगी। अभी तक नए निवेश के लिए सीएलयू, प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की मंजूरी व बिजली कनेक्शन से लेकर 20 से अधिक विभागों की 80 तरह की मंजूरियां  चंडीगढ़ स्थित हरियाणा उद्यम प्रोत्साहन केन्द्र से दी जाती हैं। अब ये मंजूरियां जिला स्तर पर ही जिला उद्योग केंद्रों में तैनात नोडल

फ्रेडरिक बास्तियात का जन्म 30 जून 1801 में बेयोन में हुआ था। उनका परिवार एक छोटे से कस्बे मुग्रोन से ताल्लुक रखता था, जहां उन्होंने अपनी जिंदगी का अधिकांश हिस्सा गुजारा और जहां पर उनकी एक प्रतिमा भी स्थापित है। मुग्रोन, बेयोन के उत्तर-पूर्व में एक फ्रांसीसी हिस्से 'लेस लेंडेस' (Les Landes) में स्थित है। उन्होंने अपनी जिंदगी का बाद का हिस्सा पेरिस में 'लेस जर्नल डेस इकानॉमिस्तेस' (Le Journal des Economistes) के संपादक और 1848 में संसद सदस्य के तौर पर गुजारा।

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