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Thursday, December 30, 2010

नहीं, कोई ऐसा नहीं कर सकता कि वह डॉ. विनायक सेन और उनके साथियों को रायपुर की एक अदालत द्वारा आजीवन कारावास दिए जाने पर खुशी मनाए। वैचारिक विरोधों की भी अपनी सीमाएं हैं। इसके अलावा देश में अभी और भी अदालतें हैं। हमें अपनी अदालतों और अपने तंत्र पर भरोसा तो करना ही होगा। आखिर क्या अदालतें हवा में फैसले करती हैं? क्या इतने ताकतवर लोगों के खिलाफ सबूत गढ़े जा सकते हैं? ये सारे सुविधा के सिद्धात हैं कि फैसला आपके हक में हो तो सब कुछ अच्छा और न हो तो अदालतें भरोसे के काबिल नहीं हैं। भारतीय सविधान, जनतंत्र और अदालतों को...

Wednesday, December 29, 2010

2-जी स्पेक्ट्रम घोटाला मामले की जेपीसी से जांच कराने की मांग पर सरकार और विपक्ष के बीच गतिरोध के चलते संसद का पूरा शीतकालीन सत्र बिना किसी काम काज के समाप्त हो गया. इसी के साथ पूरे सत्र के दौरान एक भी दिन कामकाज नहीं हो पाने का देश के संसदीय इतिहास में एक रिकॉर्ड बन गया.

यहीं एक गंभीर प्रश्न उठता है कि क्या हमारी संसद वाकई हमारे लिए सार्थक है? संसद के ठप्प हो जाने के बाद भी, देश के बाकी काम काज सुचारू रूप से चलते रहे. एक तरफ हमारे नीति निर्माता एक दूसरे पर आरोप प्रत्यारोप की...

Tuesday, December 28, 2010

प्रसिद्ध उद्योगपति अजीम प्रेमजी ने समृद्ध और गहन सामाजिक सरोकारों का परिचय देते हुए महादान का प्रेरणादायक उदाहरण प्रस्तुत किया है। दुनिया के 28वें तथा देश के तीसरे सबसे धनी व्यक्ति अमीन अजीम प्रेमजी ने शिक्षा का स्तर सुधारने के लिए 8846 करोड़ रुपयों का दान देकर दान परंपरा को नई ऊंचाई पर पहुंचाया है। उन्होंने 21.3 करोड़ शेयर अजीम प्रेमजी फाउंडेशन को देने की घोषणा की है। यह राशि विप्रो में उनकी हिस्सेदारी का लगभग 11 फीसदी है। अजीम प्रेमजी ट्रस्ट उत्तराचल, राजस्थान व कर्नाटक के दो-दो जिलों में 25 हजार स्कूलों को...

Wednesday, December 22, 2010

प्रायः 'दरिद्रता' और 'निर्धनता' को पर्यायवाची के रूप में उपयोग किया जाता है किन्तु इन दोनों शब्दों में भारी अंतराल है. 'निर्धनता' एक भौतिक स्थिति है जिसमें व्यक्ति के पास धन का अभाव होता है किन्तु इससे उसकी मानसिक स्थिति का कोई सम्बन्ध नहीं है. निर्धन व्यक्ति स्वाभिमानी तथा परोपकारी हो सकता है. 'दरिद्रता' शब्द भौतिक स्थिति से अधिक मानसिक स्थिति का परिचायक है जिसमें व्यक्ति दीन-हीन अनुभव करता है जिसके कारण उसमें और अधिक पाने की इच्छा सदैव बनी रहती है. अनेक धनवान व्यक्ति भी दरिद्रता से पीड़ित होते हैं.

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Tuesday, December 21, 2010

देशभर में बहुत से ऐसे लोग हैं जो खुले आसमान के तले जीवन बसर करते हैं। सिर ढंकने तक को छत नहीं मिल रही। दूसरी ओर जिन स्थानीय निकायों पर लोगों को सस्ते आवास उपलब्ध कराने की जिम्मेदारी है, वे जमीनों के कारोबार में लग गए हैं। ये निकाय जनहित और आवास योजनाओं के नाम पर किसानों की जमीनें तो बहुत कम कीमत में लेते हैं, लेकिन जब योजना विकसित करके भूखंड अथवा आवास देने की बारी आती है तो वे इतने शुल्क जोड़ देते हैं कि वही जमीन दस गुना महंगी हो जाती है।

ऐसे में निकायों की आवास योजनाओं में...

Monday, December 20, 2010

कुछ हफ्तों पहले मैंने ‘द सोशल नेटवर्क’ देखी। अद्भुत फिल्म है और इसका असर मेरे दिलो-दिमाग से अब तक गया नहीं है।

द एक्सीडेंटल बिलियनेअर्स किताब पर आधारित यह फिल्म सोशल नेटवर्किग साइट फेसबुक के निर्माण की कहानी बताती है। इसमें आधी हकीकत है और आधा फसाना। फिल्म तो खैर बहुत अच्छे ढंग से बनाई ही गई है, इसकी कहानी और भी ज्यादा शानदार है।

फेसबुक बनाने वाला शख्स मार्क जकरबर्ग अभी मात्र 26 बरस का है और दुनिया का सबसे नौजवान अरबपति है।...

Friday, December 17, 2010

'वॉच डॉग' की भूमिका का निर्वाह करने वाला मीडिया भला 'खतरनाक' कैसे हो सकता है? निष्ठापूर्वक अपने इन कर्तव्य का पालन-अनुसरण करने वाले मीडिया को महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री पृथ्वीराज चव्हाण ने खतरनाक प्रवृत्ति निरूपित कर वस्तुत: लोकतंत्र के इस चौथे पाये की भूमिका और कर्तव्य निष्ठा को कटघरे में खड़ा किया है। वैसे बिरादरी से त्वरित प्रतिक्रिया यह आई है कि चव्हाण की टिप्पणी ही वस्तुत: लोकतंत्र के लिए खतरनाक है।

यह मुद्दा राष्ट्रीय बहस का आग्रही है। मुख्यमंत्री चव्हाण ने मुंबई के आदर्श सोसाइटी घोटाले...

Thursday, December 16, 2010

फ्रेडरिक बास्तियात ने अपने बहुचर्चित प्रभावी लेख, “क्या देखा जाता है और क्या नहीं देखा जाता” में लिखा है कि हम कैसे मान लेते हैं कि एक सामाजिक प्रणाली का एक तय परिणाम ही होगा, जबकि इसके कई परिणाम हो सकते हैं। ये सभी विरोधाभासी भी हो सकते हैं। सच में तो हम यह भी सोच सकते हैं कि “न देखी गई बात को देखने” की सोच तो कथनात्मक प्रक्रिया है, जिसमें लगातार कुछ न कुछ जोड़ते रहने की जरुरत है। और वाकई, ‘क्या नहीं देखा जाता’ वाकई दृष्टिकोण का मामला है। और जितने ज्यादा लोग उतने ज्यादा दृष्टिकोण। इसी अलग-थलग बात में मैं...

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