सच का सामना

सच का सामनाप्राइम टाइम में निगाहें स्टार प्लस के प्रोग्राम “सच का सामना” पर गड़ी हैं. दर्शक हैं कि दिल थामे इंतजार कर रहे हैं कि एंकर हॉट सीट पर बैठे शख्स से अगला प्रश्न क्या पूछेगा। और यह जिज्ञासा हो भी क्यों न। हॉट सीट पर बैठा शख्स एक के बाद एक सच जो उगल रहा है। यह उससे जबरन नहीं कराया जा रहा है बल्कि वह अपनी मर्जी से कर रहा है। तभी तो “सच का सामना” में हिस्सा लेने के बाद कुछ लोगों ने कहा है कि उन्होंने शो में अपनी बात कहकर खुद को हल्का महसूस किया है। इसी को तो कहते हैं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता।

यानी जो दिल में दबा है उसे कह दिया जाए तो मन भारी नहीं रहता। इसी सच ने तो इस कार्यक्रम की टीआरपी को पंख लगा दिए हैं, बेशक चैनल का उद्देश्य टीआरपी हासिल करने का है, सच बोलने वाले को सच बोलने की एक कीमत भी मिल रही है, लेकिन बात जो भी हो इस तरह के मंच पर सच बोलना बोलने और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का ही तो विस्तार है।

21 प्रश्नों के इस कार्यक्रम में जैसे-जैसे गेम आगे बढ़ता है, प्रश्न और निजी होते जाते हैं। इसी पर हमारे नेता जागे और उन्होंने हाइकोर्ट में इस पर रोक के लिए याचिका कर दी। लेकिन कोर्ट ने भी यह सलाह देते हुए याचिकाएं खारिज कर दीं, कि जिन्हें यह पसंद नहीं वे अपने टीवी सेट बंद कर सकते हैं। वाकई यह एक सराहनीय फैसला है।

अगर पति का सरेआम यह कबूलना कि उन्होंने पत्नी के साथ बेवफाई की है, और पत्नी का यह कहना कि एक समय ऐसा भी आया जब मेरा मन किया कि उन्हें मार ही डालूं, अगर यह भारतीय पारंपरिक सीमाओं का उल्लंघन है तो जो कुछ जम्मू-कश्मीर विधानसभा में हुआ उसे क्या कहेंगे?

अगर सच कहना अनैतिक है, अगर अपनी बात सबके सामने कहना गलत है, तो घूस लेकर संसद में प्रश्न पूछना कितना सही है? कुल मिलाकर कहें तो बोलने या अभिव्यक्ति के अपने मूल अधिकार के प्रयोग के बारे में आप क्या कहेंगे, इसे आप किस तरह आंकेगें?

- आज़ाद "हिन्दुस्तानी"