काले धन ने किया शर्मसार

भारत में अगर कोई पानीदार सरकार होती तो आज वह बिन पानी ही डूब मरती. जो काम सरकार को करना चाहिए, वह काम सर्वोच्च न्यायालय को करना पड़े, इससे बढ़कर लज्जा की बात किसी सरकार के लिए क्या हो सकती है. विदेशों में जमा काले धन की वापसी पर माननीय न्यायाधीशों ने जो टिप्पणियां की हैं, वे तो अपनी जगह है ही, सबसे बड़ी बात तो यह हुई कि सरकार द्वारा नियुक्त उच्च समिति को अदालत ने रद्द कर दिया है और उसकी जगह उसने स्वयं एक विशेष जांच दल बिठा दिया है.

इस विशेष जांच दल की अध्यक्षता प्रसिद्घ न्यायमूर्ति बीपी जीवन रेड्डी करेंगे. यह जांच सर्वोच्च न्यायालय की देखरेख में होगी| न्यायाधीशों ने सभी सरकारी विभागों को निर्देश दिया है कि वे जांच में सहयोग करें. यह जांच दल विदेशों में जमा भारतीयों के काले धन की खोज करेगा और वापस लाने की युक्ति सुझाएगा| इस 13 सदस्यीय जांच दल में सरकार के लगभग सभी आवश्यक और महत्वपूर्ण विभागों के प्रतिनिधि होंगे| देखना यही है कि वे अपने विभागों के मंत्रियों का आदेश मानेंगे या न्यायमूर्ति रेड्डी का निर्देश. सर्वोच्च न्यायालय के इस सत्साहस के लिए राष्ट्र उसका ऋणी रहेगा. विदेशों में जमा काला धन वापस आ पाएगा या नहीं, यह तो भविष्य की बात है लेकिन आज सर्वोच्च न्यायालय ने इस सरकार को पूरी तरह निवर्सन कर दिया है. उसके निर्णय ने सिद्घ कर दिया है कि काले धन के बारे में इस सरकार की नीयत भी काली है| यह सिर्फ काले धन को ही नहीं छिपाना चाहती, यह उन लोगों के नामों पर भी पर्दा डाले रखना चाहती है, जो काले धन के असली मालिक हैं. हसन अली और तापुरिया के मामलों में सरकार की ढिलाई और आनाकानी की न्यायाधीशों ने जमकर खिंचाई की है. उन्होंने जो प्रश्न किए हैं, उनमें ही उनके जवाब भी छिपे हुए हैं.

न्यायाधीशों ने जानना चाहा है कि अदालत के निर्देश के बावजूद उन लोगों पर अभी तक ठोस कार्रवाई क्यों नहीं हुई ? इसका कारण क्या है ? बिना बताए ही सबको इसका कारण पता है. सबको पता है कि हसल अली के तालाब में बड़े-बड़े राजनीतिक मगरमच्छ पल रहे हैं. यदि उन मगरमच्छों पर हाथ डाल दिया गया तो पता नहीं कौन-कौन सरकारें धाराशायी हो जाएगी. अनेक राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय प्रामाणिक संस्थाओं ने काफी खोज-बीन के बाद यह निष्कर्ष निकाला है कि विदेशों में जमा काला धन ज्यादातर नेताओं और नौकरशाहों का है. यह उद्योगपतियों और व्यापारियों का नही है. उद्योगपति और व्यापारी तो बाकायदा उस पैसे को अपनी अक्ल और मेहनत के दम पर कमाते हैं और टैक्स बचाने या दुबारा निवेश के विदेशों में छिपा देते हैं लेकिन नेताओं और नौकरशाहों का काला धन तो शुद्घ रिश्वत और दलाली का पैसा होता है. उनका उपयोग उद्योग और व्यापार के लिए नहीं बल्कि देश को तबाह करने के लिए होता है. वह चुनावों में रिश्वत देने, तस्करी करने, आतंकवादी गतिविधियों को पोषित करने और विदेशों में रहकर अय्रयाशी करने के काम आता है. यह पैसा हमारे राष्ट्र को अंदर से खोखला करता है. सारी व्यवस्था को भ्रष्ट करता है. इसी के कारण देश में गरीबी, महंगाई और बेरोजगारी बढ़ती है| सर्वोच्च न्यायालय ने विदेशों में जमा इस काले धन को राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा बताया है. मोटे तौर पर माना जाता है कि अकेले स्विस बैंकों में भारत का लगभग 70 लाख करोड़ रूपया जमा है| काले धन को जमा करने की सुविधा दुनिया के अन्य देशों में भी है.

एक अनुमान के अनुसार यह कुल राशि चार सौ लाख करोड़ रूपया है| ठीक-ठीक आंकड़ा कौन बता सकता है. जब से भारत में कालाधन विरोधी आंदोलन चला है, काले धन के पंख लग गए हैं, वह एक बैंक से दूसरे बैंक और एक देश से दूसरे देश उड़ता चला जा रहा है. अफरा-तफरी मची हुई है. बड़े-बड़े नेताओं और नौकरशाहों के पसीने छूट रहे हैं. वे इस कोठी का माल, उस कोठी में डालने पर तुले हुए है| विकीलीक्स का कहना था कि दुनिया में सबसे ज्यादा काला धन अगर विदेशों में किसी का जमा है तो वह भारतीयों का है. सर्वोच्च न्यायालय ने कहा है कि सरकार उन सब खातेदारों के नाम प्रकट करे, जिनका पैसा लाइखटेंस्टाइन बैंक में जमा है. हो सकता है कि उनमें से कुछ का धन काला न हो. सरकार ने अब तक जितने भी बहाने बनाए हैं, इन नामों को छिपाने के, उन सबको सर्वोच्च न्यायालय ने रद्द किया है. उसने इस सरकार को आड़े हाथों लेते हुए कहा है कि इसी करतूतों के कारण भारत एक ‘मरियल राज्य’ बन गया है. इसने भारत को एक ‘विफल राज्य’ बना दिया है. किसी सरकार को इससे करारा तमाचा क्या लगाया जा सकता है.

सर्वोच्च न्यायालय ने अपने इस क्रांतिकारी निर्णय के द्वारा देश में चल रहे भ्रष्टाचार-विरोधी आंदोलन में नई जान फूंक दी है. इस निर्णय ने बाबा रामदेव के आंदोलन को वैधानिक जामा पहना दिया है. 4 जून को रामलीला मैदान में रावण-लीला मचाने वाली यह सरकार यदि रामदेव की बात मान लेती तो आज उसे यह दिन क्यों देखना पड़ता ? उसने भ्रष्टाचार की रक्षा के लिए अत्याचार किया लेकिन सर्वोच्च न्यायालय ने अब उसका अचार निकाल दिया है. सरकार पर न्यायालय का यह अविश्वास, संसद के अविश्वास प्रस्ताव से भी अधिक भंयकर है. राजनीतिक दलों और सांसदों के अपने स्वार्थ और पूर्वाग्रह हो सकते हैं लेकिन न्यायाधीशों के अविश्वास के पीछे कौन सा स्वार्थ हो सकता है ? न्यायाधीशों का अविश्वास किसी सरकार को नहीं गिरा सकता लेकिन उसकी इज्जत तो अपने आप ही गिर जाती है. ए.राजा और हसल अली के मामले में यह सरकार पहले अपंग हुई, अब यह अधमरी हो चुकी है. पता नहीं, अगले तीन साल में इसे क्या-क्या भुगतना है ? वह रामदेव और अन्ना जैसे आंदोलनकारियों के साथ छल-कपट तो कर सकती है लेकिन यह माननीय न्यायाधीशों का क्या कर लेगी ? जीवन रेड्रडी जैसे न्यायाधीश के नाम से ही भ्रष्टाचारियों को बुखार चढ़ने लगता है. यदि जीवन रेड्रडी विदेशों में जमा काले धन को वापस करवा सकें तो उनका नाम भारत की इक्कसवी सदी के महानायकों में शामिल हो जायेगा.

विदेशों में जमा 70 लाख करोड़ रूपए एक अर्थ यह भी है कि अगले दस साल तक भारत में किसी को कोई भी टैक्स देने की जरूरत नहीं है. काला धन मिटेगा तो भारत के चुनाव शुद्घ होंगे, राजनीतिक दलों की पारदर्शिता बढ़ेगी तथा बड़ी रिश्वतें और दलाली घटेंगी. आम आदमी को राहत मिलेगी. सर्वोच्च न्यायालय ने अपने निर्णय से सबल और संपन्न भारत का मार्ग खोल दिया है. यदि यह सरकार अब भी चूक गई तो इसको अपना कार्यकाल पूरा करना भारी पड़ेगा.

- डॉ वेद प्रताप वैदिक