हां, ये वही बिहार है !

कुछ वर्षों पूर्व तक बिहार का नाम आते ही लोगों के जेहन में टूटी-फूटी सड़कें, हिचकोले खाते साइकिल की रफ्तार से चलते (दौड़ते) डग्गामार वाहन, छतों पर बैठकर और दरवाजों व सीढ़ियों पर लटक कर यात्रा करती सवारियां, विद्युत आपूर्ति के अभाव में शाम से ही घने अंधकार के आगोश में समा जाने वाले गांवों व शहरों के दृश्य उभर आते थे। राजनेताओं व बाहुबलियों के संरक्षण में खुलेआम घूमते अपराधी और उद्योग धंधों के अभाव में बेरोजगार युवकों व श्रमशक्ति का अन्य प्रदेशों को पलायन यहां की विशिष्ट पहचान बनती जा रही थी। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में बिहार ऐसा बदला कि लोग न केवल उसे मॅाडल प्रदेश मानने लगें बल्कि अन्य जगहों पर उसके उदाहरण भी दिए जाने लगें। यहां तक कि बिहार को हिकारत की नजरों से देखने वाले तथाकथित ज्यादा विकसित प्रदेश आपने यहां चुनावों में बिहार जैसे परिवर्तन लाने की घोषणाएं व वादे करने लगें।

इनसब का श्रेय जाता है वर्तमान नितीश सरकार को जिसने लंबे समय बाद बिहार के लोगों को गर्व करने के कुछ मौके उपलब्ध कराएं। हालांकि प्रदेश की बेहतरी के लिए अभी काफी कुछ किया जाना बाकी है, लेकिन कम से कम आगाज तो हो ही गया। वैसे, वर्तमान सरकार ने जिस प्रकार आम जनता से जुड़़ी योजनाओं व परियोजनाओं पर विशेष ध्यान केंद्रित किया और प्राथमिकता के साथ उनपर अमल किया वैसा उदाहरण एक-दो प्रदेशों को छोड़ अन्य जगहों पर देखने को नहीं मिलेगा।हाल ही में बिहार के विकास की कड़ी में एक और अध्याय जुड़ गया। दरआसल, ग्रामीण विकास योजनाओं सहित महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (मनरेगा)के उत्कृष्ट क्रियान्वयन करने के लिए केंद्र सरकार द्वारा बिहार के नालंदा जिले का चयन किया गया है। मुख्यमंत्री नितीश कुमार के गृह जिले नालंदा में मनरेगा के तहत हुए कार्यों के लिए प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह स्वयं राजधानी में एक कार्यक्रम के दौरान वहां के जिलाधिकारी संजय कुमार अग्रवाल को सम्मानित करेंगे। राष्ट्रीय पुरस्कार के लिए चुने जाने पर खुशी जताते हुए अग्रवाल ने पुरस्कार को केवल व्यक्तिगत सम्मान न बताते हुए इसे पूरे बिहार का सम्मान बताया है। अग्रवाल के मुताबिक इस सम्मान में पूरी टीम का योगदान है, जिनकी मेहनत से जिला यहां तक पहुंच सका। बकौल अग्रवाल, "नालंदा में पिछले दो वर्षों से सूखे की स्थिति थी, जिस पर कई कार्य किए गए। जिले में बरसात के पानी के संचयन के लिए पिछले दो वर्ष में 800 से ज्यादा आहर और पईन बनाए गए या उनका जीर्णोद्धार किया गया। यही कारण है कि पिछले वर्ष नालंदा में कृषि के क्षेत्र में काफी प्रगति हुई, जिससे क्षेत्र से लोगों का पलायन रुका। उन्होंने कहा कि नालंदा के मॉडल को देखने के लिए आज देश के विभिन्न हिस्सों और विदेशों से भी लोग यहां आ रहे हैं। 

गौरतलब है कि नालंदा में मनरेगा में अनियमितताओं पर रोक लगाने के लिए भी कई कड़े कदम उठाए गए। इस सिलसिले में छह मुखिया और लोकसेवकों सहित १५ से ज्यादा लोगों के खिलाफ थाने में मामला दर्ज कराया गया। इसका प्रभाव अन्य पंचायतों पर भी पड़ा, जिसके परिणामस्वरूप कार्य सुचारु ढंग से चलने लगे हैं। इसके अतिरिक्त बिहार शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में भी आगे चल पड़ा है। उल्लेखनीय है कि नालंदा राष्ट्रीय पुरस्कार पाने वाला बिहार का पहला जिला है। इस पुरस्कार के लिए चयनित होने वाले अन्य जिलों में छत्तीसगढ़ का सरगुजा, महाराष्ट्र का नांदेड़,  आंध्र प्रदेश का विजयनगर और तमिलनाडु का कोयम्बटूर जिले शामिल हैं।

- अविनाश चंद्र