बेटियों को बचाने और पढ़ाने से लेकर प्रताड़ित और शर्मिंदा करने तक का सफर

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा वर्ष 2015 में ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ योजना की शुरूआत की गई थी। इस योजना का मुख्य उद्देश्य पक्षपाती लिंग चुयन की प्रक्रिया का उन्मूलन, बालिकाओं के अस्तित्व व सुरक्षा को सुनिश्चित करना और उनके लिए उचित शिक्षा की व्यवस्था करना था। इसके लिए 100 करोड़ रूपए के आरंभिक कोष का प्रावधान भी किया गया। शुरू में इस अभियान के फायदे भी देखने को मिले। सोशल मीडिया पर काफी ट्रेंड हुए ‘सेल्फी विथ डॉटर’ और इसे मिले व्यापक जनसमर्थन ने पिछड़े व ग्रामीण इलाकों की महिलाओं को भी विश्वास से ओत प्रोत किया। महिलाएं घरों से बाहर निकलने लगीं और स्वरोजगार के साथ साथ छोटी मोटी नौकरियां कर अपने पैरों पर खड़ा होने लगीं।

चूंकि देश में अब भी महिलाओं के लिए टीचिंग का कार्य सर्वाधिक उपयुक्त और सुरक्षित समझा जाता है इसलिए पढ़ी लिखी अधिकांश महिलाओं ने शिक्षण-प्रशिक्षण के क्षेत्र में योगदान देना शुरू किया। इसमें शहरी और ग्रामीण क्षेत्र में खुले छोटे-छोटे बजट स्कूल काफी सहायक सिद्ध हुए। स्कूलों को जहां छोटे बच्चों को ममतत्व के साथ पढ़ाने और देखभाल करने के लिए पर्याप्त संख्या में शिक्षिकाएं और प्रधानाध्यापिकाएं मिलने लगीं वहीं महिलाओं को भी आसानी से स्वावलंबन का जरिया मिलने लगा। बड़ी तादात में महिलाओं ने अपना स्वयं का स्कूल शुरू कर क्षेत्र में शिक्षा के प्रचार प्रसार का काम शुरू कर दिया। एक उम्मीद के मुताबिक देश में लगभग पांच लाख बड़े व छोटे निजी स्कूल हैं जिनमें लगभग 50 लाख महिला शिक्षक और कर्मचारी कार्यरत हैं।

मोदी सरकार व्यापक तौर पर इसका क्रेडिट ले पाती और 2019 के लोकसभा चुनावों में इसे भुना पाती इससे पहले ही केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (सीबीएसई) सहित राज्य सरकारों के अदूरदर्शी फैसलों ने इसमें पलीता लगा दिया। गुरुग्राम के रेयान इंटरनेशनल स्कूल में छात्र प्रद्युम्न के सनसनीखेज हत्याकांड मामले में मीडिया ट्रायल के दबाव और जन-संवेदना हासिल करने के नाम पर सीबीएसई और राज्य सरकारों द्वारा आनन फानन में तमाम ‘सेफ्टी गाइडलाइंस’ जारी कर दिए गए।

जिनमें स्कूलों के शैक्षणिक और गैर शैक्षणिक कर्मचारियों का पुलिस सत्यापन और चरित्र प्रमाण पत्र हासिल करने की अनिवार्यता सर्वाधिक विवादास्पद रही। सत्यापन के लिए पुलिस इन महिला शिक्षकों के घर जाने लगी या उन्हें थाने बुलाया जाने लगा। किसी महिला के घर विशेषकर ग्रामीण परिवेश में किसी महिला के घर पुलिस का आना अथवा महिला का थाने जाना चर्चा का विषय बन जाता है। इस माहौल में तमाम शिक्षिकाएं पढ़ाना छोड़ घर बैठना ज्यादा उचित समझने लगीं। इस ‘गैरजरूरी’ फैसले ने एक तरफ जहां महिला शिक्षकों को प्रताड़ित और शर्मिंदा करने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी वहीं उनकी प्रतिष्ठा का हनन भी किया।

इस घटना के बाद से शिक्षकों-प्रधानाध्यापकों के साथ छात्रों व उनके परिजनों के द्वारा हिंसा किए जाने व हत्या तक को अंजाम दिए जाने की घटना में भी तेजी देखने को मिलने लगी। लिंगानुपात व महिलाओं के खिलाफ हिंसा के मामले में अत्यंत संवेदनशील हरियाणा और यूपी में स्कूल परिसर के अंदर प्राधानाध्यापिका को गोली मारने जैसी घटनाएं बढ़ने लगीं। यहां तक कि राज्य सरकारों व स्थानीय प्रशासन की शह पर पुलिस को भी स्कूल संचालकों और प्रधानाध्यापिकाओं के खिलाफ कार्रवाई की अघोषित छूट मिल गई। स्कूल परिसर के अंदर या बाहर किसी भी प्रकार की घटना-दुर्घटना होने पर स्कूल संचालकों और प्रधानाध्यापकों (आमतौर पर महिलाएं) को जेल भेजने की घटना आम हो गई है। दिल्ली, महाराजगंज, फैजाबाद, इंदौर, हरियाणा आदि के स्कूलों की घटनाएं महज उदाहरण भर हैं। कई घटनाओं में स्थानीय दबंग व ‘पहुंच’ रखने वाले प्रतिस्पर्धी स्कूल संचालकों द्वारा पुलिस के साथ मिलीभगत कर दूसरे स्कूल संचालक को फंसाने जैसे आरोप भी सुनने को मिल रहे हैं।

दरअसल, एक बार यदि किसी स्कूल के संचालक और प्रधानाध्यपक को जेल भेज दिया जाए तो इलाके में उसकी बदनामी हो जाती है और अभिभावक अपने बच्चों को उस स्कूल से निकालना शुरू कर देते हैं जिससे स्कूल बंद हो जाता है और प्रतिस्पर्धी स्कूल का फायदा हो जाता है। स्कूल की फीस न चुकाने वालों ने भी इसका भरपूर फायदा उठाया है। स्कूल द्वारा फीस मांगने पर बच्चों को प्रताड़ित करने का आरोप लगाना अब फैशन बनता जा रहा है। हाल ही में बजट स्कूलों के अखिल भारतीय संगठन निसा द्वारा ऐसे कृत्यों और पूर्वाग्रही प्रशासनिक कार्रवाइयों के विरोध में देशभर में ‘ब्लैक डे’ मनाते हुए शिक्षक दिवस का बहिष्कार किया गया। केंद्र व राज्य सरकारों के संबंधित विभाग को मांगपत्र भी सौंपा गया। अच्छा हो यदि सरकार समय पर चेत जाए और शिक्षकों व स्कूल संचालकों की सुरक्षा सुनिश्चित करने, शिकायत की दशा में बिना जांच जेल भेजने व वास्तविक अपराधी के खिलाफ ही कार्रवाई करने, गलत शिकायत करने वालों के खिलाफ आपराधिक मामला दर्ज किए जाने जैसे कड़े कदम उठाए। ऐसा न हो कि एससी-एसटी बिल, आरक्षण आदि मुद्दों के साथ देशभर में अध्यापिकाओं, स्कूल संचालकों का असंतोष 2019 की मुहिम के राह में बड़ी खाई बन जाए।

टीचर्स पुलिस वेरिफिकेशन कब और कहां
• सितंबर 2017: सीबीएसई ने सर्क्युलर जारी कर संबद्ध स्कूलों के सभी शैक्षणिक व गैर शैक्षणिक कर्मचारियों का पुलिस सत्यापन अनिवार्य किया।
• सितंबर 2017: दिल्ली सरकार ने सभी गैर-शैक्षणिक कर्मचारियों का पुलिस सत्यापन कराना अनिवार्य किया।
• सितंबर 2017: हरियाणा सरकार ने स्कूलों के सभी शैक्षणिक व गैर शैक्षणिक कर्मचारियों का पुलिस सत्यापन अनिवार्य किया।
• नवंबर 2017: मुंबई में शैक्षणिक व गैर शैक्षणिक कर्मचारियों के लिए सक्षम अधिकारी द्वारा चरित्र प्रमाण-पत्र हासिल किया जाना अनिवार्य बनाया गया।
• जनवरी 2018: जम्मु में सभी निजी स्कूलों के शैक्षणिक व गैर शैक्षणिक कर्मचारियों का पुलिस सत्यापन अनिवार्य किया गया।

- आजादी.मी