प्रतिबंध समस्या का समाधान नहीं समस्या को बढ़ाने वाला कारक है (भाग एक)

दिल्ली में एकबार फिर से पॉलीथिन के प्रयोग व इसकी खरीद-बिक्री को पूरी तरह से प्रतिबंधित कर दिया गया है। पर्यावरण संरक्षण अधिनियम 15 के तहत प्रतिबंध की अनदेखी करने वालों पर 10 हजार से एक लाख रूपए तक का आर्थिक दंड अथवा सात वर्ष तक की सजा अथवा दोनों का प्रावधान किया गया है। इसके पूर्व वर्ष 2009 में भी दिल्ली में प्लास्टिक के प्रयोग पर रोक लगाया गया था। लेकिन उस समय 40 माइक्रोन से मोटे प्लास्टिक व उससे निर्मित वस्तुओं, कैरीबैग आदि को प्रतिबंध से मुक्त रखा गया था। हाल ही में राजधानी में गुटखे पर भी प्रतिबंध लगाया गया है। हालांकि गुटखा, प्लास्टिक आदि के स्वास्थ्य व पर्यावरण पर पड़ने वाले दुष्भावों के मद्देनजर इनपर प्रतिबंध लगाने वाला दिल्ली एक मात्र प्रदेश नहीं है। इसके पूर्व गुजरात, हरियाणा, लक्षद्वीप, मिजोरम आदि प्रदेशों में शराब व गुटखा आदि पर प्रतिबंध लगाया जा चुका है। प्रतिबंध के आदेशों का पालन न करने वालों के लिए दंड का भी प्रावधान है।

लेकिन क्या वास्तव में आप को यह लगता है कि जिन चीजों पर सरकार द्वारा प्रतिबंध लगाया जाता है वह वास्तव में उसके पीछे निहित उद्देश्यों की पूर्ति करता है? या फिर प्रतिबंध लगने के बावजूद समस्या ज्यों कि त्यों बरकरार रहती है और उसके दूसरे हानिकारक प्रभाव भी उभरने लगते हैं?

इस बात में तनिक भी संदेह नहीं कि प्लास्टिक पर्यावरण के लिए एक बड़ी समस्या बनकर उभरा है। मिट्टी में मिलने के कारण धरती की उर्वरा शक्ति पर प्रभाव तो पड़ा ही है दिल्ली-मुम्बई जैसे शहरों में थोड़ी सी ही बारिश में सड़कों पर जलभराव और जलप्लावन की सी स्थिति उत्पन्न हो जा रही है। इसके अतिरिक्त कूड़े और खाद्य पदार्थों को प्लास्टिक बैग में बांधकर फेंकने व इसे खाने के कारण इस खतरनाक पदार्थ के मवेशियों व दुधारू पशुओं के शरीर में जाने की भी घटनाएं लगातार सामने आ रही हैं। नीति निर्धारकों व पर्यावरणविदों के मुताबिक चूंकि सड़कों व कूड़ेदानों में पड़ी प्लास्टिक की थैलियां व कैरीबैग सीवरों व नालियों में फंसकर उन्हें जाम करने के लिए जिम्मेदार हैं इसलिए इस पर प्रतिबंध लगाना अत्यंत जरूरी है। चूंकि प्लास्टिक गलता नहीं है और इसे रिसाइकल करने की प्रक्रिया भी बहुत कारगर नहीं है इसलिए हाल के कुछ दशकों में दुनियाभर में इसके प्रयोग पर रोक लगाने जैसे कदम उठाए गए हैं।

इसी प्रकार, शराब, तंबाकू व अन्य मादक पदार्थों के दुष्प्रभावों को देखते हुए अनेक राज्यों में इनके सेवन, खरीद-फरोख्त व संग्रह पर प्रतिबंध लगाते हुए इसे अपराध की श्रेणी में रखा गया है। प्रतिबंध की अनदेखी करने वालों के लिए कड़े दंड का भी प्रावधान किया गया है। चूंकि शराब, तंबाकू व मादक पदार्थों के सेवन के दुष्परिणाम के रूप में कैसर, लीवर, किडनी आदि की जानलेवा बिमारियां होती हैं और प्रतिवर्ष बड़ी तादात में लोग असमय मृत्यु का शिकार हो जाते हैं इसलिए इन पर प्रतिबंध के फैसलों की खिलाफत नैतिक तौर पर कोई करना नहीं चाहता।

सैद्धांतिक रूप से शराब, तंबाकू, मादक पदार्थ आदि पर प्रतिबंध के फैसले बड़े कन्विंसिंग प्रतीत होते हैं और समाज के एक तबके (विशेषकर महिलाओं) द्वारा शासन-प्रशासन को तारीफ व सहानुभूति भी मिलती है। यह सहानुभूति कई मौकों पर वोट में भी तब्दील हो जाती है। दूसरी तरफ, समाज को इस कुरीति से मुक्त कराने को नैतिक जिम्मेदारी मानने वाले राजनैतिक दलों को प्रतिबंध ही सबसे आसान और प्रभावी जरिया नजर आता है। मान्यता भी यही है कि यदि किसी वस्तु के उपभोग एवं प्रयोग पर रोक लगाना है तो अंततः प्रतिबंध ही एकमात्र तरीका है।

अब, इन प्रतिबंधों के इतिहास पर गौर करें तो प्रतिबंधों के परिणाम इन्हें लागू करने के उद्देश्यों के ठीक उल्टे दिखाई पड़ते हैं। विदेशी चैनलों के प्रसारण पर प्रतिबंध के बावजूद सोवियत संघ के विघटन में विदेशी चैनलों का देखा जाना महत्वपूर्ण कारक बना। चीनी वस्तुओं पर प्रतिबंध के बावजूद भारतीय बाजार चीनी सामानों और खिलौनों से अटे पड़े हुए हैं। विलुप्ति के कगार पर पहुंच चुके जीवों के संरक्षण के लिए राष्ट्रीय उद्यानों में पर्यटन पर प्रतिबंध लगाने के फैसले लिए जाते हैं, लेकिन जानवरों के शिकार को फिर भी रोकने में कामयाबी नहीं मिलती है। पोर्नोग्राफी व पाइरेटेड सीडी पर प्रतिबंध है लेकिन देश भर में खुलेआम हर गली चौराहे पर पोर्न व पाइरेटेड सीडी दस-दस रूपए में उपलब्ध है। स्कूल व शैक्षणिक संस्थानों के आसपास तंबाकू व तंबाकू जनित पदार्थों की बिक्री व सेवन प्रतिबंधित है। बाल मजदूरी पर प्रतिबंध है। सार्वजनिक स्थानों पर धूम्रपान प्रतिबंधित है। सरकारी स्कूलों के अध्यापकों का प्रायवेट ट्यूशन लेने पर रोक है। कहने का तात्पर्य यह है कि देश में तमाम चीजों के करने या न करने पर प्रतिबंध है लेकिन यदि हम अपने चारों ओर निगाह डाले तो सभी प्रतिबंधित व गैरकानूनी गतिविधियों को न केवल बड़े सुचारू ढंग से संपन्न होता देख सकते हैं बल्कि जिस उद्देश्य के तहत उक्त गतिविधियों पर प्रतिबंध लगाया गया था उसके उल्टे प्रभाव का भी आंकलन कर सकते हैं।

जारी......

- अविनाश चंद्र