दिल्ली में ऑटो की समस्या और समाधान

ऑटो रिक्शा चलाकर रोजी-रोटी कमाने के लिए क्या चाहिए? ऑटो चलाने का ज्ञान! एक ऑटो! और स्थान विशेष की जानकारी! पर सरकार की गरीब विरोधी नीतियों के चलते दिल्ली में ऑटो रिक्शा चलाना इतना आसान नहीं है। क्योंकि दिल्ली में ऑटो चलाने के लिए दी जाने वाली परमिट की संख्या निश्चित है जो बाजार की जरूरतों की तुलना में बहुत कम है। अतः अगर कोई नया आदमी इस धंधे में उतरने के लिए पुराना परमिट खरीदना चाहे, तो उसे बेतहाशा कीमत अदा करनी पड़ती है। दूसरी ओर चूंकि बाजार की जरूरतों की पूर्ति के लिए और भी ऑटो चाहिए, अतः बड़ी संख्या में अवैध ऑटो सड़क पर आ गए हैं। ताजा स्थिति यह है कि प्रत्येक तीन में से एक ऑटो अवैध है!
 
उपर्युक्त तथ्यों से साफ है कि सरकार की नीति ऑटो की संख्या को सीमित करने में असफल ही नहीं है, बल्कि इसका उल्टा असर भी हुआ है। सरकारी अधिकारियों तथा पुलिसवालों को ऑटो वालों को सताने का एक बहाना मिल जाता है। उपर्युक्त स्थिति में सुधार की जरूरत को देखते हुए हम निम्नलिखित सुझाव रखते हैं। 
 
सुधार के सुझावः
 
* परमिट प्रणाली खत्म कीजिए
परमिट प्रणाली बेकार है तथा ऑटो की संख्या पर पाबंदी लगाने वाली कोई भी सीमा हटा ली जानी चाहिए। धंधे में नये चालकों के प्रवेश अथवा पुराने चालकों के धंधा छोड़ने पर कोई नियंत्रण नहीं लगाया जाना चाहिए। परिवहन विभाग को सिर्फ वाहन पंजीकरण की भूमिका तक खुद को सीमित कर लेनी चाहिए। आप कहेंगे कि इससे सड़क पर ऑटो की बाढ़ आ जाएगी। सड़क जाम व प्रदूषण की समस्या भयावह हो जाएगी। पर ऐसा नहीं है। नियंत्रण हटा लेने पर भी सड़क पर उतने ही ऑटो रहेंगे, जितने की जरूरत है। और यह ऑटो की कुल वर्तमान संख्या से अधिक अथवा कम नहीं होगी। उल्टे यह धंधा संवेदनशील हो जाएगा तथा बाजार की जरूरतों के अनुसार अपना आकार घटाने अथवा बढ़ाने में सक्षम हो जाएगा। साथ ही अवैधानिकता तथा उससे जुड़ी शोषण की समस्या भी स्वतः समाप्त हो जाएगी। ऑटो के मालिकों को ऑटो कहीं भी बेचने की पूरी छूट दी जानी चाहिए, ताकि उन्हें समयानुकूल वाजिब कीमत हासिल हो सके। 
सड़क जाम की समस्या से मुक्ति पाने के लिए ऑटो पर सड़क शुल्क लगाया जाना चाहिए - 'सड़क पर चलना है, तो कीमत अदा कीजिए'। 
 
* ब्राण्ड को उभरने दीजिए
भाड़े पर ऑटो चलाने वाली कंपनियों तथा उनके ब्राण्ड को उभरने दिया जाय। इससे विभिन्न ऑटो समूहों के बीच प्रतियोगिता पैदा होगी तथा वे ब्राण्ड की पहचान व यात्रियों के बीच अपनी साख जमाने के प्रति अग्रसर होंगे। इससे वे ऑटो को सुंदर व ठीक-ठाक हालत में रखेंगे। सड़क नियमों का स्वयं पालन करने को प्रेरित होंगे। ऑटो चालकों द्वारा नियमों का उल्लंघन करने पर ऑटो कंपनी को जिम्मेदार माना जाएगा। फलतः वे स्वयं कुशल चालक रखने व नियम पालन के प्रति सावधान रहेंगे।
 
* प्रदूषण नियंत्रण
'प्रदूषण फैलाने के लिए जुर्माना का सिद्धांत' लागू होना चाहिए। इसके लिए प्रदूषण शुल्क लगाया जा सकता है। प्रारंभिक पांच वर्षों के लिए एक समान शुल्क, तत्पश्चात वाहनों की उम्र बढ़ने के साथ प्रदूषण स्तर के अनुसार शुल्क बढ़ाया जाय। 
इस तरह ऑटो की संख्या पर नियंत्रण लगाने की बजाय सरकार व सरकारी विभाग अपनी दखलंदाजी की प्रवृति पर सीमा लगाए, तो ऑटो के धंधे, ऑटो चालकों व यात्रियों का ज्यादा भला होगा।
 
- आजादी.मी 
सीसीएस द्वारा प्रकाशित 'आर्थिक स्वतंत्रता का संघर्ष; रोजी-रोटी को सरकारी नियंत्रण से मुक्ति' से उद्धृत