एक तरफ जनरल तो दूसरी तरफ आडिटर जनरल

एक तरफ जनरल तो दूसरी तरफ आडिटर जनरल सरकार के नाक में दम किए हुए हैं। कुछ समय पहले सीएजी ने इस बार  बहुचर्चित 2 जी खोटाले से छह गुना बड़े कोयला ब्लाकों की नीलामी  न करने के घोटाले का भंडाफोड करके सरकार की कार्यक्षमता और नीयत  पर  फिर सवालिया निशान लगा दिया है और एक बार फिर  इस तथ्य को रेखांकित किया है कि किस तरह सरकारी कामकाज भ्रष्टाचार का पर्याय बनता जा रहा है।

सीएजी ने – परफार्मेंस आडिट आफ कोल ब्लाक एलोकेशन – में कहा है कि सरकार ने 2004 से 2009 के बीच 155 कोयला ब्लाकों को व्यापारिक कंपनियों को आबंटित करके उन्हें 10.67 लाख करोड का अनुचित लाभ पहुंचाया।इस तरह लाभ उठानेवाली कंपनियों में 100 निजी कंपनियां और कुछ सार्वजनिक क्षेत्र की इकाइयां हैं। सीएजी ने अपनी टिप्पणी में कहा है कि कोयला प्राकृतिक संसाधन होने के कारण उसे निजी कंपनियों को प्रतियोगी नीलामी में दिया जाना चाहिए ताकि व्यवस्ता में ज्यादा पारदर्शिता और वस्तुनिष्ठता लाई जा सके।----राज्य. का लाभ बांटने का हर फैसला फैसला पारदर्शी,स्पष्ट और सुपरिभाषित नीति के तहत होना चाहिए।

यह रपट जब प्रकाशित हुई तो सीएजी की तरफ से बयान आया था कि यह उसकी अंतिम रपट नहीं है वरन कुछ अनुमान थे इसके बाद से सत्तारूढ दल की तरफ से तरह –तरह की बाते होने लगी थी । कोयला मंत्री श्रीप्रकाश जायसवाल ने कहा था कि कि ये अनुमान काल्पनिक है तो वित्तमंत्री प्रणव मुखर्जी ने सीएजी के अनुमानों को हल्के ढंग से लेते हुए टिप्पणी की थी कि सरकार का स्पष्टीकरण मिलने के बाद आडिटर अपनी रपटों के मसौदों में 90 प्रतिशत तब्दीली कर देते हैं।एत तरह से इन बतों का जवाब देते हुए कि सीएजी विनोद राय ने कहा कि आखिरी रपट इस मसौदा रपट से बहुत ्लग नहीं होगी। उन्होंने इस बात कि आडिटर यूंही कोई अनुमान तैयार कर लेते हैं और बाद में उन्हे खारिज कर देते हैं। उन्होंने अपने आडिटरों का सशक्त ढंग से पक्ष लेते हुए कहा कि कि विश्व स्तर पर हमारे काम की तारीफ होती रही है।हमारे अफसर सुप्रशिक्षित है और उनकी बुनियाद इतनी मजबूत है कि वे ऐसी बुनियादी गलती कर ही नहीं सकते। हमारी सारी आडिट प्रक्रियाएं दो-तीन स्तरों पर चलती हैं इसलिए गलती की कोई गुंजाइश नहीं होती। 

राय के इस बयान का यह मतलब निकाला जा रहा है कि आखिरी रपट भी अनुमान या मसौदा रपट से ज्यादा अलग नहीं होगी।  सीएजी  कोल ब्लाक के घोटाले के मामले में अपने 10लाख  60 हजार करोड  के घपले के आंकडे पर डटी हुई है। इस कारण पहले ही तमाम  भ्रष्टाचार और घोटालों के आरोपों से घिरी यूपीए सरकार एक और मुश्किल में फंस गई है और  सरकार और सीएजी के बीच चल रहा शीतयुद्ध और तेज हो गया है।  यह तो एक हकीकत है कि यूपीए सरकार भ्रष्टाचार में गले-गले तक डूबी हुई है लेकिन अगर कोई उसे आईना दिखाता है तो उसे अपना दुश्मन मानने लगती है। इसलिए इन दिनों उसका नया दुश्मन है –सीएजी । सीएजी की हर नई रिपोर्ट सरकारी भ्रष्टाचार को उजागर करके उसे कटघरे में खड़ा कर देती है। सीएजी ने एक के बाद एक न जाने कितने घोटालों –टूजी, राष्ट्रमंडल खेलों में घोटाले , गोदावरी बेसिन में तेल की खोज  में भ्रष्टाचार, एयर इंडिया का कुप्रबंध,ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन की नाकामी,गोरक्शेव जहाज के मूल्य संबंधी विवाद, मनेरगा में धांधली आदि का पर्दाफाश किया । इस कारण सीएजी अब लगातार मीडिया की सुर्खियों में होती है। विपक्ष ने इन रपटों को अपना हथियार बनाकर सरकार को भ्रष्टाचार के मुद्दे पर घेरने की बहुत कारगर कोशिश की और वह कुछ मंत्रियों के इस्तीफे और कुछ को जेल भिजवाने  में कामयाब रहा।इसलिए  सीएजी की इस नई सक्रियता को लेकर सरकार परेशान है ।

अबतक सीएजी एक ऐसी संस्था थी जिसकी कोई खास पहचान नहीं थी । यदि टीएन चतुर्वेदी की बोफोर्स के बारे में रपट को छोड़ दे तो  उसकी रपटें धूल खाती रहती थीं।पिछले कुछ वर्षों में सीएजी की रपटों के अचानक चर्चा में आ जाने  और उसके कारण सत्ता के गलियारों में तहलका मचने का कारण यह है कि विनोद राय के आने के बाद सीएजी के काम करने के तरीके में जबरदस्त बदलाव आया है।उसकी प्राथमिकताएं भी बदली हैं। उन्होंने सबसे पहले अपने सहयोगियों को यह निर्देश दिया- बड़े भ्रष्टाचार के पीछे पड़ो। यह एक बहुत महत्वपूर्ण रणनीतिगत और  नई प्राथमिकता तय करनेवाला  परिवर्तन था। जब उनसे एक इंटरव्यू में इस निर्देश के बारे में पूछा गया तो उन्होंने इसका खंडन नहीं किया वरन उसको सही बताते हुए कहा – हमारे पास सीमित संख्या में आडिटर्स है पांच करोड़ के बजटवाले दस्तावेजों में हम ज्यादा से ज्यादा यात्रा खर्च और स्टाफ कार के दुरुपयोग को देख सकते हैं। मेरा अपने आडिटरों को यह निर्देश है कि एक रूपये के लिए अपना महत्वपूर्ण समय बर्बाद करने में हमारी दिलचस्पी नहीं है। इसके बजाय हम पचास हजार करोड़ के दुरुपयोग के दस्तावेजों का  आडिट करें। हम बड़े बजटवाले दस्तावेजों को अपनी प्राथमिकता बनाना चाहते हैं। कहना न होगा कि उनका यह तरीका बहुत कारगर साबित हुआ । राजनीतिक हल्कों में चर्चा है कि इस तरह वे सीएजी को एक महाबली संस्था बनाना चाहते हैं । इसके जवाब में राय कहते हैं कि उनका एसा कोई मिशन नहीं है।अगर इसमें किसी का कुछ दांव पर लगा है तो जनता का। जनता निश्चित ही यह जानना चाहेगी  कि उससे जो कर वसूला जाता है उसका सही उपयोग किया जाता है नहीं।

इसके लिए विनोद राय ने अपने आडिट के हथियार को और पैना बनाया है। पहले सीएजी केवल खर्च का आडिट करती थी ।विनोद राय का कहना कि आडिट की एक और शैली है परफार्मेंस आडिट और हम परफोर्मेंस आडिट करते हैं। अपनी परफोर्मेंस आडिट के जरिये उसने अपनी रपटों  में सरकार की नीतियों पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं । कोयला ब्लाकों में हुए भ्रष्टाचार पर सीएजी की रपट इस परफार्मेंस रपट का नायाब नमूना है।

सीएजी के इन तीखें तेवरों से सरकार का परेशान होना स्वाभाविक है।प्रधानमंत्री ने भी सीएजी को आड़े हाथों लिया है।प्रधानमंत्री ने पांच संपादकों के साथ अपनी बातचीत के दौरान कहा –अतीत में सीएजी ने कभी प्रेस कांन्रफेंस नहीं की जैसी इस सीएजी ने की थी। न कभी अतीत में सीएजी ने नीतिगत मामलों पर टिप्पणी की।  प्रधानमंत्री की इस आलोचना के बावजूद राय विचलित नहीं हुए वरन उन्होंने बेबाकी से कहा कि जून, 2006 के एक पत्र में वित्त मंत्रालय ने स्पष्ट किया है कि कार्य निष्पादन या परफार्मेंस  के आडिट का कैग को पूरा अधिकार है और उसे रिकार्ड तक पूरी पहुंच उपलब्ध कराई जानी चाहिए। अब यह चाहे 2जी स्पेक्ट्रम का मामला हो या फिर पेट्रोलियम क्षेत्र में मुनाफे में भागीदारी इनमें सार्वजनिक वस्तु को निजी क्षेत्र के भागीदार को उपलब्ध कराया गया है, ऐसे में इनके कामकाज की लेखापरीक्षा स्वाभाविक है। 

सत्तारूढ़ दल को राय से सबसे ज्यादा शिकायत 2जी घोटाले में नुक्सान के बारे में दिए गए 1.76 लाख करोड के आंकड़े से है।उसका मानना है कि ये आंकड़ा अतिरंजित है। वे 2जी मामले के प्रमुख आडिटर आरपी सिंह के इस बयान को हवाला दे रहे है कि इससे सरकारी खजाने को वास्तविक नुक्सान 2645 करोड़  का हुआ और सीएजी का 1.76 लाख करोड़ नुक्सान का आंकड़ा गणितीय अनुमान है।इस बयान के आधार पर तो कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह ने आरोपनुमा सवाल कर डाला क्या सीएजी का अपना कोई एजंड़ा है।दूसरी तरफ लोक लेखा समिति की बैठक में आरपी सिंह की गवाही के दौरान राय की उपस्थिति को लेकर कांग्रेस के सदस्यों ने खूब कोहराम मचाया।इसके जवाब में तो राय ने एक और सनसनीखेज खुलासा किया कि  आडिट के दौरान तो कई बार  4.19 लाख करोड़ के नुक्सान का अनुमान किया गया था। लोकलेखा समिति की एक बैठक में तो कांग्रेसी सदस्यों ने सारी सीमाए पार कर डाली और आरोप लगाए  कि सीएजी की रपटे असत्यों पर आधारित  और राजनीति से प्रेऱित हैं इसलिए सीएजी अपनी  सभी रपटों को संशोधित करे और उन्हें फिर से संसद में पेश किया जाए।  

सरकारी पक्ष की तरफ से सीएजी की ऐसी छीछालेदार पहले कभी नहीं हुई होगी। दूसरी तरफ विनोद राय भी अपनी  बात बेबाकी से कहने से नहीं चूकते। कुछ समय पहले हैदराबाद में  विनोद राय ने 26वें सरदार बल्लभ भाई पटेल मेमोरियल व्याख्यान में कहा  कि स्वतंत्रता के बाद सरकार की विश्वसनीयता अब सबसे निचले स्तर पर है। यहां तक कि नौकरशाही  पर भी लोगों का भरोसा नहीं है। आज हमारा देश ऎसे दौर से गुजर रहा है, जहां जनता का सरकार पर से विश्वास उठ चुकाहै। 

हाल ही छपी कुछ खबरों के मुताबिक सीएजी के पिटारे में कई ऐसी रपटे हैं जो सरकार को परेशान करनेवाली होंगीं।सीएजी पर सरकार और सत्तरूढ़ दल का रवैया काफी हैरान  करनेवाला है।वह अपने गरेबां में झांकने के बजाय सीएजी को कसूरवार ठहरा रही है।यदि सरकार के मंत्री भ्रष्टाचार में लिप्त हैं तो उन पर अंकुश लगाने के बजाय सीएजी को निशाना बनाया जा रहा है।इस तरह वह अपनी कुरूपता के लिए आईने को जिम्मेदार करार दे रही हैं।सीएजी तो आईना है जिसमें वही बिम्ब आएगा जैसे आप हैं।यदि सीएजी ईमानदारी से अपना काम कर रही है तो उस पर अतिरिक्त सक्रियता आरोप लगाकर उसे खारिज नहीं किया जा सकता।  वैसे सीएजी के  जुझारू तेवरों का समर्थन करनेवालों की दलील है कि चूंकि सरकार या कार्यपालिका अपने कर्तव्यों का सही निर्वहन नहीं कर रही इसलिए न्यायपालिका और सीएजी जैसी संस्थाओं को ज्यादा सक्रियता दिखानी पड़ रही है और  सरकार बनाम न्यायपालिका या सरकार बनाम सीएजी के बीच टकराव होता लग रहा है। लेकिन यह एक स्वस्थ टकराव है।सीएजी की बढ़ती  सामाजिक  सक्रियता सरकार को भी सक्रिय और चौकस रहने को मजबूर करेगी। 

- सतीश पेडणेकर