छात्रों को फेल नहीं, सतत मूल्यांकन करने से बनेगी बात

शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार के उद्देश्य से हाल ही में दिल्ली सरकार द्वारा ‘चुनौती 2018’ कार्यक्रम की घोषणा की गई। इस कार्यक्रम के तहत छठी से नौवीं कक्षा के छात्रों के सीखने की क्षमता का मूल्यांकन (लर्निंग असेसमेंट) कराने का कार्य किया गया। मूल्यांकन का परिणाम ठीक वैसा ही रहा जैसा कि अपेक्षित था। छठीं कक्षा के 74 फीसदी छात्र धारा प्रवाह हिंदी की किताब पढ़ने में और साधारण वाक्य लिखने भी असमर्थ पाए गये। हालांकि यह परिणाम कहीं से भी चौंकाने वाला नहीं साबित हुआ। अर्थात यह वह परिणाम था जिससे ज्यादा की अपेक्षा आमतौर पर सरकारी स्कूलों की शिक्षा की गुणवत्ता के आधार पर शायद ही कोई करता होगा। यदि कुछ स्कूलों के छात्रों का प्रदर्शन बेहतर है तो यह वहां के अध्यापकों के विशेष प्रयास अथवा छात्रों की असाधारण प्रतिभा का परिणाम अधिक और व्यवस्था की देन कम ही होती है। 

खैर, दिल्ली सरकार के इस प्रयास की तारीफ की जानी चाहिए कि इसने अपने स्कूलों में पढ़ने वाले छात्रों के लर्निंग आऊटकम के मूल्यांकन की साहस दिखायी। अन्यथा सरकारें ऐसे मामलों में लीपापोती कर अपने कर्तव्यों की इतिश्री करने के लिए अधिक जानी जाती हैं। वैसे छात्रों के सीखने की क्षमता के मूल्यांकन का फैसला दिल्ली सरकार के दिमाग की ऊपज हो ऐसा भी नहीं है। इस व्यवस्था का प्रावधान निशुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा की गारंटी देने वाले कानून अर्थात आरटीई में भी है। आरटीई के अनुसार छात्रों की वार्षिक परीक्षा लेने और फेल पास करने की बजाए समय समय पर मूल्यांकन करना आवश्यक है ताकि शुरू से ही बच्चों के कमजोर पक्ष का पता लगाया जा सके और उसके सुधार की दिशा में काम किया जा सके। किंतु इस प्रावधान का मतलब बिना किसी प्रयास के सभी छात्रों को अनिवार्य रूप से अगली कक्षा में प्रमोट करना मान लिया गया। निजी स्कूलों में फिर भी छात्रों के मूल्यांकन की कोई न कोई विधि प्रयोग में लाई जाती रही।

परिणाम यह हुआ कि सरकारी और निजी स्कूलों में पढ़ने वाले छात्रों के बीच सीखने की खाई गहरी होती गई। समस्या तब शुरू हुई जब छात्र नौवीं कक्षा में पहली बार वार्षिक परीक्षा से रूबरू हुए। परिणाम यह हुआ कि बड़ी तादात में छात्र नौवीं कक्षा में फेल होने लगें। कई स्कूलों में यह आंकड़ा 45-50 फीसदी तक पहुंच गया। जबकि निजी स्कूलों के छात्रों की स्थिति सरकारी स्कूलों के छात्रों की तुलना में काफी बेहतर रही। फिर भी नीति निर्माताओं का ध्यान असल समस्या की तरफ नहीं गया और वे बजाए शिक्षा की गुणवत्ता सुधारने के छात्रों को फेल करने प्रावधान की मांग करने लगे। दिल्ली, बिहार, यूपी, एमपी, हरियाणा सहित लगभग 15 राज्यों ने तो केंद्रीय मानव संसाधन मंत्रालय को पत्र लिख ‘नो-डिटेंशन’ व्यवस्था को समाप्त करने की मांग कर डाली। मानव संसाधन मंत्रालय ने भी आरटीई में संशोधन कर इस व्यवस्था को पांचवी कक्षा तक सीमित करने सहमति जताई और इस संदर्भ में आवश्यक कदम उठाने शुरु कर दिए।

इन सभी के बीच हाल ही में थिंकटैंक सेंटर फॉर सिविल सोसायटी द्वारा हाईकोर्ट में एक जनहित याचिका दायर की गई। याचिका में मांग की गई कि चुनौती 2018 कार्यक्रम की तर्ज पर सभी प्राथमिक कक्षाओं के छात्रों का भी मूल्यांकन किया जाए। हाईकोर्ट ने भी याचिका स्वीकार करते हुए दिल्ली के सभी नगर निगमों और शिक्षा निदेशालय को नोटिस जारी कर इस बाबत जवाब तलब किया। इन सभी के बीच यह तो स्पष्ट है कि सरकारों का दृष्टिकोण ‘मीठा गप्प और कड़वा थू’ का ही रहा है। आरटीई कानून के ऐसे प्रावधान जो सरकारों को अपने हित में लगे उन्हें तमाम पक्षों के विरोध के बावजूद ने केवल स्वीकार किया गया बल्कि कड़ाई से उनका अनुपालन भी कराया गया। जबकि ऐसे प्रावधान जो सरकारी जवाबदेही तय करते हैं उनकी लगातार अनदेखी की गई बावजूद यद्पि कि शिक्षा के क्षेत्र के अन्य पक्षों द्वारा लगातार ऐसी मांग की जाती रही।

- अविनाश चंद्र

संपादक; आजादी.मी