आम आदमी और विकास

विख्यात सामाजिक कार्यकर्ता अरुणा राय ने कांग्रेस एवं संप्रग अध्यक्ष सोनिया गांधी की नेतृत्व वाली राष्ट्रीय सलाहकार परिषद छोड़कर राजनीतिक रूप से भी हलचल पैदा की है। वह इस परिषद में इसलिए काम करने को तैयार नहीं हैं, क्योंकि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने मनरेगा मजदूरों को न्यूनतम मजदूरी की दर से वेतन दिए जाने की अनुशंसा को अस्वीकार कर दिया। ऐसा लगता है कि मनमोहन सरकार के प्रति उनकी नाराजगी कुछ ज्यादा ही है, क्योंकि राष्ट्रीय सलाहकार परिषद से मुक्त होने के बाद उन्होंने केंद्रीय सत्ता पर यह आरोप भी मढ़ा कि वह आम लोगों को नजरअंदाज कर आर्थिक वृद्धि हासिल करने पर तुली है और उसका रवैया पूरी तरह से बाजारवादी एवं पूंजीवादी हो गया है।

उनके पास यह सब कहने के पीछे कुछ आधार हो सकते हैं, लेकिन उनके विचारों से सहमत होना कठिन है। इसमें संदेह नहीं कि केंद्र सरकार कई मोर्चो पर नाकाम रही है, लेकिन उसे बाजारवादी एवं पूंजीवादी कहकर लांछित करने का कोई मतलब नहीं। यह नई-अनोखी बात नहीं कि हमारे देश के अधिकांश सामाजिक कार्यकर्ताओं और दुनिया भर के वामपंथी बुद्धिजीवियों को बाजार और पूंजीवाद से चिढ़ है। इस पर आश्चर्य नहीं कि अरुणा राय ने यह पाया कि केंद्र सरकार आम लोगों की अनदेखी कर आर्थिक सुधार और विकास हासिल करने में जुटी हुई है। बेहतर होता कि वह इस पर प्रकाश डालतीं कि उद्योगीकरण की अनदेखी कर विकास कैसे किया जा सकता है? भारत सरीखे देश के लिए यह आवश्यक ही नहीं, बल्कि अनिवार्य है कि वह उद्योगीकरण की रफ्तार को धीमी न पड़ने दे। इस रफ्तार के धीमे पड़ने का मतलब है, आम आदमी की समस्याओं में और वृद्धि होना। नि:संदेह इनमें मजदूर और ग्रामीण भी शामिल हैं।

अब यह किसी से छिपा नहीं कि आर्थिक विकास की धीमी रफ्तार के कैसे दुष्परिणाम सामने आते हैं? सामाजिक कार्यकर्ताओं की विकास के मौजूदा तौर-तरीकों के बारे में चाहे जो राय हो, तीव्र उद्योगीकरण समय की मांग है। इस संदर्भ में इसकी अनदेखी नहीं की जा सकती कि खेती अथवा ग्रामीण अर्थव्यवस्था के सहारे देश को विकसित राष्ट्र बनाने के लक्ष्य को हासिल करना कहीं अधिक कठिन है। ग्रामीणों, मजदूरों, निर्धनों-वंचितों के हितों की चिंता करने और विकास को गति देने में कोई विरोधाभास नहीं है, लेकिन आज कुछ ऐसा माहौल बना दिया गया है कि विकास इन सब वर्गो की उपेक्षा और बदहाली का कारण बनता है। यह निष्कर्ष सही नहीं। इससे इन्कार नहीं किया जा सकता कि मनरेगा सरीखी योजनाएं निर्धन-वंचित तबकों के लिए उपयोगी साबित हुई हैं, लेकिन उन्हें विकास का पर्याय नहीं कहा जा सकता। इस तरह की योजनाएं निर्धन-वंचित तबकों को आत्मनिर्भर बनाने में सहायक नहीं हैं।

औद्योगिक विकास के तौर-तरीकों पर तो बहस हो सकती है, लेकिन उद्योग-व्यापार को आम आदमी के विरोध में खड़ा करना निर्थक है। अच्छा होगा कि अरुणा राय और उनके सहयोगी इस पर चिंतन-मनन करें कि बाजार और पूंजीवाद ऐसा स्वरूप कैसे हासिल करे जिससे आम आदमी के हितों का कहीं अधिक संरक्षण और संवर्धन हो? इस संदर्भ में उनके विचार कहीं अधिक उपयोगी हो सकते हैं-न केवल सरकार के लिए, बल्कि संसद के लिए भी। अगर वह सरकार के साथ-साथ संसद से भी नाराज हैं तो इसके लिए उन्हें दोष नहीं दिया जा सकता, क्योंकि जिस तरह केंद्र सरकार उम्मीदों पर खरी नहीं उतरी उसी तरह संसद भी।विख्यात सामाजिक कार्यकर्ता अरुणा राय ने कांग्रेस एवं संप्रग अध्यक्ष सोनिया गांधी की नेतृत्व वाली राष्ट्रीय सलाहकार परिषद छोड़कर राजनीतिक रूप से भी हलचल पैदा की है। वह इस परिषद में इसलिए काम करने को तैयार नहीं हैं, क्योंकि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने मनरेगा मजदूरों को न्यूनतम मजदूरी की दर से वेतन दिए जाने की अनुशंसा को अस्वीकार कर दिया। ऐसा लगता है कि मनमोहन सरकार के प्रति उनकी नाराजगी कुछ ज्यादा ही है, क्योंकि राष्ट्रीय सलाहकार परिषद से मुक्त होने के बाद उन्होंने केंद्रीय सत्ता पर यह आरोप भी मढ़ा कि वह आम लोगों को नजरअंदाज कर आर्थिक वृद्धि हासिल करने पर तुली है और उसका रवैया पूरी तरह से बाजारवादी एवं पूंजीवादी हो गया है।

उनके पास यह सब कहने के पीछे कुछ आधार हो सकते हैं, लेकिन उनके विचारों से सहमत होना कठिन है। इसमें संदेह नहीं कि केंद्र सरकार कई मोर्चो पर नाकाम रही है, लेकिन उसे बाजारवादी एवं पूंजीवादी कहकर लांछित करने का कोई मतलब नहीं। यह नई-अनोखी बात नहीं कि हमारे देश के अधिकांश सामाजिक कार्यकर्ताओं और दुनिया भर के वामपंथी बुद्धिजीवियों को बाजार और पूंजीवाद से चिढ़ है। इस पर आश्चर्य नहीं कि अरुणा राय ने यह पाया कि केंद्र सरकार आम लोगों की अनदेखी कर आर्थिक सुधार और विकास हासिल करने में जुटी हुई है। बेहतर होता कि वह इस पर प्रकाश डालतीं कि उद्योगीकरण की अनदेखी कर विकास कैसे किया जा सकता है? भारत सरीखे देश के लिए यह आवश्यक ही नहीं, बल्कि अनिवार्य है कि वह उद्योगीकरण की रफ्तार को धीमी न पड़ने दे। इस रफ्तार के धीमे पड़ने का मतलब है, आम आदमी की समस्याओं में और वृद्धि होना। नि:संदेह इनमें मजदूर और ग्रामीण भी शामिल हैं।

अब यह किसी से छिपा नहीं कि आर्थिक विकास की धीमी रफ्तार के कैसे दुष्परिणाम सामने आते हैं? सामाजिक कार्यकर्ताओं की विकास के मौजूदा तौर-तरीकों के बारे में चाहे जो राय हो, तीव्र उद्योगीकरण समय की मांग है। इस संदर्भ में इसकी अनदेखी नहीं की जा सकती कि खेती अथवा ग्रामीण अर्थव्यवस्था के सहारे देश को विकसित राष्ट्र बनाने के लक्ष्य को हासिल करना कहीं अधिक कठिन है। ग्रामीणों, मजदूरों, निर्धनों-वंचितों के हितों की चिंता करने और विकास को गति देने में कोई विरोधाभास नहीं है, लेकिन आज कुछ ऐसा माहौल बना दिया गया है कि विकास इन सब वर्गो की उपेक्षा और बदहाली का कारण बनता है। यह निष्कर्ष सही नहीं। इससे इन्कार नहीं किया जा सकता कि मनरेगा सरीखी योजनाएं निर्धन-वंचित तबकों के लिए उपयोगी साबित हुई हैं, लेकिन उन्हें विकास का पर्याय नहीं कहा जा सकता। इस तरह की योजनाएं निर्धन-वंचित तबकों को आत्मनिर्भर बनाने में सहायक नहीं हैं। औद्योगिक विकास के तौर-तरीकों पर तो बहस हो सकती है, लेकिन उद्योग-व्यापार को आम आदमी के विरोध में खड़ा करना निर्थक है। अच्छा होगा कि अरुणा राय और उनके सहयोगी इस पर चिंतन-मनन करें कि बाजार और पूंजीवाद ऐसा स्वरूप कैसे हासिल करे जिससे आम आदमी के हितों का कहीं अधिक संरक्षण और संवर्धन हो? इस संदर्भ में उनके विचार कहीं अधिक उपयोगी हो सकते हैं-न केवल सरकार के लिए, बल्कि संसद के लिए भी। अगर वह सरकार के साथ-साथ संसद से भी नाराज हैं तो इसके लिए उन्हें दोष नहीं दिया जा सकता, क्योंकि जिस तरह केंद्र सरकार उम्मीदों पर खरी नहीं उतरी उसी तरह संसद भी।

 

साभारः दैनिक जागरण