भारत में जान बूझ कर पैदा की जा रही है मंदी जैसी स्थिति

राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर मंदी की चर्चा एक बार फिर जोर पकड़ रही है। आर्थिक विकास के दर का अध्ययन करने वाली तमाम संस्थाएं दुनियाभर में मंदी को आसन्न मान रहीं हैं। प्रतिक्रिया स्वरूप सबसे पहले अमेरिका जैसे देश ने अपनी अर्थव्यवस्था को मंदी से अप्रभावित रखने और व्यवसायियों को फौरी राहत देने के तौर पर संरक्षणवाद का लबादा ओढ़ना शुरू कर दिया है। पहले से ही कर्ज के संकट में घिरे यूरोप और उसके बाद जापान, चीन और भारत में आर्थिक विकास की धीमी पड़ती रफ्तार, मंदी के अंदेशे को हवा देने के लिए काफी है।

यद्यपि आर्थिक विकास की दर अलग अलग देशों में अलग अलग परिस्थितयों से तय होती है फिर भी वैश्विक गांव में परिवर्तित हो चुकी दुनिया के एक दूसरे देशों की आर्थिक स्थिति से अप्रभावित रहना आसान नहीं। लेकिन यह असंभव भी नहीं है। खासकर भारत के मामले में। पूर्व में भी ऐसा देखने को मिल चुका है जब वर्तमान दशक के पूर्वार्ध में दुनिया जब आर्थिक महामंदी से जूझ रही थी देश विकास के पथ पर अग्रसर हो रहा था और टाटा सहित यहां की अन्य कंपनियां विदेशी कंपनियों का अधिग्रहण कर रहीं थीं। फिर आखिर ऐसा क्या हो गया कि देश विकास के हाईवे से फिसलकर उबड़ खाबड़ पगडंडियों पर जा पहुंचा। नौ फीसद से अधिक की दर से विकास कर रहा देश 5.5 फीसद (वर्ष 2013-14 के लिए अनुमानित) की रफ्तार हासिल करने में भी हांफने लगा। दरअसल, वोटबैंक की राजनीति करने और किसी प्रकार सत्ता हथियाने की मानसिकता रखने वाले राजनैतिक दलों और उनके प्रतिनिधियों द्वारा बेवजह किया जाने वाला विदेशी निवेश का विरोध इस समस्या का सबसे बड़ा कारण है। केंद्र सरकार द्वारा यह स्पष्ट किए जाने के बावजूद कि आर्थिक विकास की गति को जारी रखने के लिए जिस पूंजी की आवश्यकता है उसका सरकार के पास अभाव है और विदेशी निवेश ही इसका एकमात्र समाधान है, विपक्ष सहित अन्य राजनैतिक दल इसका विरोध कर रहे हैं। मजे की बात यह है कि सदन में प्रमुख विपक्षी पार्टी भाजपा द्वारा भी पूर्व में अपने कार्यकाल के दौरान एफडीआई के लिए राजी होने जैसी खबर भी आती रहती है। यही हाल अन्य विपक्षी पार्टियों का भी है। ममता बनर्जी की तृणमूल पार्टी को छोड़ दें तो सभी पार्टियां एफडीआई के मुद्दे पर अबतक किसी स्टैंड पर नहीं पहुंच सकी हैं और ‘वेट एंड वाच’ के फार्मुले पर काम करती दिख रहीं है।

तो फिर, यदि कहा जाए कि भारत में मंदी की स्थिति जानबूझ कर पैदा की जाए तो गलत नहीं होगा। विकसित देश जहां विकास की संभावनाएं और प्राकृतिक संसाधनों के दोहन के मौके अब काफी कम हैं वहां की स्थिति तो समझ में आती है लेकिन भारत जैसे देश में जहां विकास की अकूत संभावनाएं हैं, वहां ऐसी स्थिति समझ के परे है। यह तब है जब हम दुनिया के कुछ थोडे़ से देशों में से हैं जहां किसी भी तरह के संसाधन की कोई कमी नहीं है और विकास चाहे जितना कर लिया जाए, उसकी जरूरत अगले कम से कम 50 सालों तक तो खत्म होगी नहीं। उदाहरण के लिए, हमारे देश में हर सिर को छत मिले, इसके लिए ही 6 करोड़ इकाई से ज्यादा मकान बनाए जाने की जरूरत है। मतलब यह कि अगर रियल एस्टेट लगातार 25 फीसदी की दर से भी विकास करे तो अगले 45 सालों तक उसके लिए भरपूर स्कोप है। यही हाल इंफ्रास्ट्रक्चर के क्षेत्र में हैं।

माना कि भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा सड़क नेटवर्क वाला देश है, लेकिन हमारे यहां अभी भी 52,000 से ज्यादा गांव या तो कच्ची सड़कों से जुड़े हैं या सड़कें हैं ही नहीं, या फिर सड़कों के नाम पर एक काम चलाऊ संपर्क व्यवस्था है। इसका मतलब यह है कि अगर हमारे यहां आधारभूत सुविधाओं के चलते सड़क का निर्माण अगले 20 सालों तक 20 फीसद सालाना की बढ़ोत्तरी की दर से विकास जारी रहे तो भी लगातार 20 सालों तक जरूरत बनी रहेगी। इसी प्रकार, उर्जा, शिक्षा, स्वास्थ्य या यूं कहें कि कोई ऐसा क्षेत्रा नहीं है जहां भारत में अगले 50 सालों तक विकास और खपत की गुंजाइश न हो। क्या इससे ज्यादा उर्वर दुनिया का कोई बाजार हो सकता है? सवाल है कि फिर भी हम गरीब क्यों हैं? सवाल है फिर भी हम विकास में अपनी उचित भागीदारी क्यों नहीं सुनिश्चित कर पाते? हमने अपने आपको विकास का सकारात्मक भागीदार बनाने के लिए क्या किया है? इसका जवाब सिर्फ एक है और वह यह कि यदि हमारे पास उक्त क्षेत्रों में निवेश के लिए पर्याप्त धन नहीं है तो विदेशी निवेश का इस्तेमाल क्यों नहीं। आखिर नब्बे के दशक के उत्तरार्ध और वर्तमान दशक के पूर्वार्ध में हमारी प्रगति में वैश्विकरण का ही तो हाथ रहा है। सोचिए..।

- अविनाश चंद्र