धारा 377 से इसलिए मुक्त होना होगा

हम भारतीय दुख-परेशानी, अन्याय और संघर्षों से खुद को अलिप्त रखने में  बहुत माहिर हैं। हम ऐसे जिंदगी जीते हैं जैसे देश की बड़ी समस्याओं का वजूद ही नहीं है। मैं कोई फैसला नहीं दे रहा हूं। इतनी तकलीफों और असमानता वाले देश में इनसे निपटने का एकमात्र यही तरीका है। 
 
दूसरी बात, जिसमें हम सिद्धहस्त हैं वह है ऐसी किसी चीज पर विचार-विमर्श न करना जो समाज में वर्जित हो या इसमें सेक्स संबंधी कोई दृष्टिकोण हो। भारतीयों के लिए सेक्स का तो कोई अस्तित्व ही नहीं है और इसीलिए इससे जुड़ा कोई मुद्‌दा भी नहीं है। यही वजह है कि महिलाओं के खिलाफ अपराधों को लेकर अब तक हमारे यहां तर्कपूर्ण, जानकारी परक और विवेकपूर्ण बहस नहीं हुई है और हममें से कई लोग तो सेक्स एजुकेशन को भयंकर चीज मानते हैं। हालांकि, हम सेक्स के बारे में उतना ही सोचते हैं, जितने कि अन्य राष्ट्र।
 
इस सारे नकार और पाखंड के तहत हमने एक घोर अन्याय को स्वीकार कर लिया है। लाखों भारतीयों से जुड़ा यह मुद्‌दा हमारे देश को सबसे पिछड़े, प्रतिगामी शासन में शामिल कर देता है। यह मुद्‌दा है समलैंगिकों के अधिकार का यानी वह कुख्यात धारा 377, जो समलैंगिकता का अपराधीकरण करती है। बावजूद इसके कि पिछले दशक में ढेर सारे वैज्ञानिक सबूतों ने समलैंगिकता के अस्तित्व को प्राकृतिक सिद्ध किया है। 
 
दुनियाभर की बात करें तो यह कुल आबादी का 8 फीसदी है (यह आंकड़ा इस ओर इशारा करता है कि यह वाकई प्राकृतिक घटना है, कोई सांस्कृतिक या सामजगत तथ्य नहीं।) इसका अर्थ है 10 करोड़ भारतीय समलैंगिक हो सकते हैं, लेकिन वे इस तथ्य को छिपाने के लिए मजबूर हैं। हम उन्हें अपराधी बना देते हैं और ऐसा बर्ताव करते हैं, जैसे उनकी चिंताएं हमारे लिए अप्रासंगिक हैं। मेरे लिए तो यह सामूहिक पाप से कम नहीं है।
 
समलैंगिकता एक जटिल मसला है। इसमें कई धार्मिक, नैतिक, राजनीतिक और कानूनी दृष्टिकोण शामिल हैं और इसलिए भारत जैसे देश में इस पर विचार-विमर्श में बड़ी कठिनाई आती है। हालांकि, आपकी चाहे जो राय हो, एक चीज एकदम स्पष्ट  है- इनमें से किसी भी दृष्टिकोण से समलैंगिकता को अपराध नहीं ठहराया जा सकता। वैज्ञानिक सबूत बताते हैं कि समलैंगिकता प्रकृति में मौजूद है। कई धर्मों के विभिन्न पंथ इसे स्वीकार करते हैं या इसके प्रति तटस्थ हैं। हिंदू धर्म में कई व्याख्याएं हैं, लेकिन इसमें सकारात्मक से लेकर उदासीन और विरोधी रुख तक पाए जाते हैं। ऋग्वेद कहता है, ‘प्रकृति एवं विकृति’ (विकृति/विविधता ही कुल-मिलाकर प्रकृति है या जो अ-प्राकृतिक दिखाई देता है, वह भी प्राकृतिक है)। नैतिक रूप से आप दलील दे सकते हैं कि महिला-पुरुष आकर्षण के अलावा शेष सब अनैतिक है। क्या किसी की स्वतंत्र-इच्छा का हरण अनैतिक नहीं है? क्या सारे वैज्ञानिक सूबतों की उपेक्षा कर देना अनैतिक नहीं है? समलैंगिक समुदाय के दृष्टिकोण को सुने बगैर इसे विकृति कहना अनैतिक नहीं है? क्या किसी समलैंगिक व्यक्ति को विपरीत सेक्स वाले के साथ विवाह के लिए बाध्य करना और नकली जिंदगी जीने पर मजबूर करना अनैतिक नहीं है? क्या सिर्फ अल्पसंख्या में होने के कारण समलैंगिक आंदोलन को कुचलना अनैतिक नहीं है?
 
समलैंगिकता के खिलाफ नैतिक दलील यह है कि बच्चे इसे ‘वैकल्पिक जीवनशैली’  मानकर  इस ओर आकर्षित होंगे। वैज्ञानिक सबूत इसके खिलाफ हैं। समलैंगिक होना संक्रामक नहीं है या फैशन की कोई चीज नहीं है, किंतु यदि आप विज्ञान की उपेक्षा भी करें (जो भारतीयों के लिए अपने बच्चों को विज्ञान का छात्र बनाने के बाद दूसरी पसंदीदा चीज है।) तो यह समझना ही होगा :
 
किसी चीज को अपराध के दायरे से मुक्त करने का मतलब उसे बढ़ावा देना नहीं होता। समलैंगिकों के अधिकार स्वीकारने का अर्थ, पक्षपात के शिकार समुदाय के प्रति संवेदनशील होना है। समलैंगिक समुदाय को भी समझना होगा कि हम ऐसे रूढ़िवादी समाज में रह रहे हैं, जिसमें बदलाव की जरूरत है, लेकिन बदलाव में वक्त लगता है। समलैंगिक अधिकारों की दिशा में कोई भी सफलता सड़कों पर पश्चिम प्रेरित गे-परेड के रूप में नहीं दिखनी चाहिए या ऐसा कुछ नहीं होना चाहिए,जो समलैंगिकता को फैशन के रूप में पेश करे। यदि हम रूढ़िवादी समाज को उकसाएंगे तो वह अपनी खोल में और सिमट जाएगा।
 
राजनीतिक रूप से समलैंगिक अधिकार पेचीदा दांव है। देश में बहुत सारे रूढ़िवादी मतदाता हैं, जो भाजपा को वोट देते हैं। उन्हें विचलित करना कोई बेहतर राजनीतिक गणित नहीं है, इसीलिए भाजपा के कई वरिष्ठ नेता समलैंगिकता को अपराध बनाने के खिलाफ हैं, लेकिन विरोधियों द्वारा मुद्‌दा भुनाने के डर से वे सार्वजनिक रूप से ऐसा कह नहीं सकते। हालांकि, भाजपा के इस असुरक्षा भाव से मैं इत्तफाक नहीं रखता। रूढ़िवादी मतदाता भाजपा के सबसे वफादार मतदाता हैं। हो सकता है कि उनमें से एक तबका रुष्ट हो जाए, लेकिन फिलहाल तो वोट देने के लिए उसके पास कोई और विकल्प नहीं है। यदि सरकार अपनी पहल का ज्यादा शोर-गुल न मचाए (समलैंगिक समुदाय और मीडिया भी पुरानी सोच वाले तबके के प्रति संवेदनशीलता व संयम दिखाए) तो धारा 377 को वापस लिया जा सकता है। इसके साथ हम वैधता के अंतिम  बिंदु पर आते हैं। धारा 377 कोई  भारतीय कानून नहीं, ब्रिटिश कानून की विरासत है। यही कानून, इसी संख्या की धारा के साथ ब्रिटिश साम्राज्य के 40 उपनिवेशों में लागू था। ज्यादातर ने इसे खत्म कर दिया है या इसमें सुधारकर समलैंगिकता को अपराध के दायरे से मुक्त कर दिया है। हम इसे इस तरह पकड़े हुए जैसे यह भारतीय सांस्कृतिक विरासत का हिस्सा हो जबकि यह विक्टोरियाई भूतकाल के अवैज्ञानिक अवशेष के सिवाय कुछ भी नहीं है।
 
बेशक, अंतिम सवाल यह है। स्वार्थी, गैर-समलैंगिक और आर्थिक विकास चाहने वाले भारतीय को इसकी परवाह क्यों करनी चाहिए? हमें करनी चाहिए, क्योंकि वे देश जहां अल्पसंख्यकों के अधिकारों की रक्षा की जाती है, जहां नैतिक दृष्टिकोण अधिक आधुनिक व उदार है और बदलाव श्रेष्ठतम वैश्विक दस्तूर और वैज्ञानिक खोजों को व्यक्त करते हैं, वहां आमदनी में वृद्धि के संदर्भ में अच्छा प्रदर्शन करने का रुझान होता है। ज्यादातर विकसित व स्वतंत्र देश समलैंगिकता को स्वीकार करते हैं, जो उन्हें करना चाहिए। यदि हम किसी दिन उनमें से एक होना चाहते हैं तो हमें ऐसा व्यवहार करना शुरू कर देना चाहिए कि हम अाधुनिक दुनिया से हैं। अल्पसंख्यकों के लिए सबल कानून, समाज में न्याय का सबूत है। यह बताता है कि शक्तिहीन लोगों की भी सुनी जाती है, उन्हें संरक्षण दिया जाता है। न्याय के साथ निवेशकों का भरोसा हासिल होता है, जिसका नतीजा उच्च आर्थिक वृद्धि में होता है। इसलिए समलैंगिक हैं अथवा नहीं, हमें यह करना ही होगा। हमें धारा 377 को हटाना ही होगा। हमें दुनिया में आगे बढ़ने की जरूरत है।
 
 
- चेतन भगत, अंग्रेजी के प्रसिद्ध युवा उपन्यासकार
साभारः दैनिक भास्कर