स्कूलों में अभिभावकों का साक्षात्कार

    शहरों के निजी स्कूलों में अभिभावकों का साक्षात्कार, उस पर होने वाला हंगामा और कोर्ट की फटकार संबंधी बातें आए दिन सामने आती रहती हैं। निश्चित ही यह एक विचारणीय मसला है। इस पर अविलंब रोक लगनी चाहिए। कोर्ट से विद्यालयों को मिली फटकार से यही पता चलता है कि सरकार इस परंपरा पर रोक लगाने की कोशिश कर रही है। पर क्या स्कूल सचमुच अभिभावकों का साक्षात्कार लेना बंद कर देंगे? वेश्यावृत्ति भारत के सभी छोटे बड़े शहरों में एक संगठित अपराध की तरह चल रहा है। ड्रग्स का समूचे देश में एक जाल फैलता जा रहा है। गुटखे धड़ल्ले से सरेआम बिक रहे हैं। पोर्न साहित्य और सीडी खुले आम बेचे जा रहे हैं। हर वो काम हो रहा है, जिसे सरकार ने अवैध ठहरा रखा है या जिस पर रोक है।
    फिर इस सरकारी रोकथाम का उपयोग क्या है? जब इसे होना ही है, तो यह सरकारी आडंबर क्यों? वस्तुत: यह अंदर की बात है, जिसका सरकार में आने वालों को ही पता चल पाता है। अगर ऐसी रोकथाम करने वाले कानून न हों, तो सरकारी अधिकारियों को रिश्वत कैसे मिलेगी! ऐसे कानून पुलिस वालों को ताकत देते हैं कि किसी भी दुकान से 2-4 सामान उठाकर निकल लें। दुकानदार कुछ नहीं कहता, क्योंकि उन्हें परिवार चलाने के लिए दुकान चलानी है। पुलिस की ताकत वस्तुत: उसके डंडे या बंदूक में नहीं होती, बल्कि कानून ही उसे उठाईगिरी का अधिकार देते हैं। ये ही वे कानून हैं, जिनके बल पर प्रशासन के चतुर्थ श्रेणी के कर्मचारियों द्वारा वसूली गई रिश्वत कमीशन दर कमीशन शासन के सर्वोच्च शिखर तक पहुँचती है। लोकतंत्र तो सिर्फ दिखावा भर है। ब्रिटिश शोषण तंत्र और उठाईगिरी वस्तुत: अब भी जारी है।
    अभिभावक साक्षात्कार नहीं देंगे, तो आखिर बच्चे का दाखिला कहाँ कराएंगे? आखिर सब्जी मार्केट तो है नहीं कि इस में नहीं तो उस स्कूल में दाखिला करा लेंगे। यहाँ स्कूलों की संख्या उंगलियों पर गिनने लायक है और अभिभावकों का रेला है। यहाँ मार्केट उलटा है। स्कूल चलाने वाले ही अपनी चलाते हैं। माल जो बढ़िया होगा, दाखिला उसी का होगा। उन्हें पता है कि अभिभावकों के पास दूसरा कोई चारा नहीं है।
    संविधान में बेशक शिक्षा को अव्यावसायिक श्रेणी में रखा गया हो। पर व्यवसाय तो चल रहा है। अपने सभी व्यावसायिक फार्मूले के साथ चल रहा है। व्यवसाय तो शाश्वत सत्य है। यह संसार के कारोबार में उसी तरह समाया है, जैसे जीवन में साँसें। इसे कानून बनाकर कोई अलग नहीं कर सकता। परिवार में पाँच बेटियों के बाद हुए बेटे को अधिक प्यार मिलता है, तो इसलिए कि वह संख्या में कम है। और बेटियाँ ढेरों हैं, इसलिए उसका कोई महत्व नहीं। घर की मुर्गी भी दाल बराबर होती है, पर जब दाल महंगी हो जाती है, तो वह भी अपना महत्व बता जाती है। सत्य को स्वीकार लेना ही बेहतर है।
    चाहे अभिभावकों के साक्षात्कार का मामला हो, या स्कूल कॉलेजों के डोनेशन की ऊँची दर या फिर प्रवेश परीक्षा हो। इनसे एक बात का निश्चित पता चलता है कि स्कूल कॉलेजों की संख्या कम है और विद्यार्थी और अभिभावक रूपी ग्राहक अधिक। इसलिए अभिभावक लाचार हैं और विद्यालयों का एकाधिकार है। और इसलिए यहाँ विद्यार्थी विद्यालयों का चुनाव करने के लिए स्वतंत्र नहीं हैं, बल्कि विद्यालय ही विद्यार्थियों में से क्रीम चुनने का प्रयास करते हैं। विद्यालय को पता है कि सौ लोगों को अयोग्य ठहराने के बाद भी हजार अभिभावक अपनी बारी के इंतजार में मोटी रकम लेकर खड़े हैं। इसलिए साक्षात्कार चलता रहेगा। यह कोर्ट की फटकार से बंद नहीं होगा। इसे बंद करने का सिर्फ एक तरीका है। और वह है मांग के अनुरूप पूर्ति की जाए यानी, विद्यालयों की संख्या बढ़ाई जाए।
    विद्यालयों को साक्षात्कार लेने पर सरकार की डाँट पड़ती है, पर इसके लिए मूलत: यही सरकार दोषी है। सरकार का पहला दोष यह है कि इसने शिक्षा को अव्यावसायिक श्रेणी में डाल रखा है। दूसरा सरकार ने स्कूल खोलने के लिए आवश्यकता प्रमाणपत्र लेने की व्यवस्था बना रखी है। मान्यता लेने की पद्धति भी दोषपूर्ण है। ये वे कारण हैं, जो उद्यमियों को स्कूल में निवेश करने से रोकते हैं। और स्कूल खोलने के काम को महंगा बना देते हैं। वस्तुत: अपने यहाँ एक ओर जहाँ पढ़ने वालों की संख्या विशाल है, वहीं प्रशिक्षित बेगारों की संख्या भी विकराल है। ये पढ़े-लिखे बेरोजगार जहाँ विद्यार्थियों को शिक्षा दे सकते हैं, वहीं विद्यार्थी और अभिभावक इन्हें रोजगार दे सकते हैं। ये दोनों एक दूसरे के पूरक हैं।
    सरकार को इनके सहज संबंध के बीच बाधा नहीं बननी चाहिए। बजाए रोजगार कार्यक्रम पर अरबों-खरबों खर्चने के सरकार शिक्षा में निजी निवेश को प्रोत्साहित करे। शिक्षा को उद्योग और व्यवसाय का दर्जा दे। तथा इस क्षेत्र का पूर्ण उदारीकरण करे। ताकी गिने-चुने स्कूलों की मोनोपॉली खत्म हो। विभिन्न निजी स्कूलों के बीच आपसी प्रतिस्पर्धा पैदा की जाए, ताकि शिक्षा का स्तर ऊँचा उठे तथा घर-घर शिक्षा के प्रकाश से चमचमा उठे।

इकोनॉमी इंडिया (नवम्बर 2006)
संजय कुमार साह