सरकारी दखलंदाजी से किराया हुआ महंगा

    यूँ तो अपना मकान हर किसी का सपना होता है। पर अपना मकान होने तक का सफर अधिकतर लोगों को किराये के मकान में रह कर ही तय करना पड़ता है। ऐसे में हर किसी को एक सस्ते मकान की तलाश रहती है। पर आलम यह है कि दिल्ली ही नहीं किसी भी महानगर में आज मकान किराये की दर आसमान छू रही है। परिणाम यह होता है कि अपने मकान का सपना साकार करने का सफर कुछ और ज्यादा लंबा हो जाता है। पर हम लोग यह नहीं सोचते कि आखिर किराया इतना अधिक क्यों है? दूसरे कई सामान की कीमत जब लगातार घटती जा रही है। तो मकानों का किराया ही क्यों बढ़े? इलेक्ट्रॉनिक सामानों जैसे टीवी, फ्रिज, मोबाइल फोन इत्यादि की कीमत लगातार घट रही है। तो ऐसा क्या खास है कि मकान का किराया लगातार बढ़ता ही जा रहा है।
    दिल्ली में ऊर्जा मंत्रालय में नौकरी कर रहे आलोक यमुना पार के पश्चिमी विनोद नगर में रहते हैं। उनके कमरे का किराया 1500 रुपये है, जो उनकी आय का पाँचवाँ हिस्सा है। वे बताते हैं कि इस इलाके में पिछले छह माह से बदबूदार नाले जैसा सड़ा हुआ काला पानी आ रहा है। जिसके कारण वहाँ रहना काफी मुश्किल हो रहा है। परंतु इस दर पर कहीं भी इससे अच्छा कमरा नहीं मिल सकता। आलोक अपनी आय का इतना बड़ा हिस्सा खर्च कर भी ऐसे इलाके में रहने को विवश हैं, जो वस्तुत: रहने के लायक है ही नहीं। इस हिसाब से सहज ही समझा जा सकता है कि पॉश इलाके में किराये की दर कितनी ऊँची होगी। आखिर क्या कारण हो सकता है महंगे किराये का? आलोक आबादी के बढ़ते बोझ को इसका कारण बताते हैं। देश भर से लोग दिल्ली आ रहे हैं। इसके कारण जमीन और दूसरी सारी चीजों की कीमतें बढ़ रही हैं। आलोक की सोच को खारिज तो नहीं किया जा सकता क्योंकि हम में से अधिकतर लोग आलोक की तरह ही सोचते हैं। हम खुद को गुनाहगार मानने के अभ्यस्त हो चले हैं। सवाल है कि क्या हमें दिल्ली से वापस चला जाना चाहिए? जीवन की जरूरतों की खोज में दुनिया भर में सदियों से लोग यहाँ-वहाँ भटकते रहे हैं। हम इसी प्रक्रिया की एक कड़ी हैं। तो आज लोगों का महानगरों मे आना गलत क्यों हो सकता है? वास्तव में आम जनता इस तरह की मान्यता कभी नहीं बनाती। इस तरह की मान्यता सरकारी मशीनरी द्वारा बढ़ा-चढ़ा कर पेश की जाती है। और उसे जनता के गले उतारने पर पूरा सरकारी धन खर्च किया जाता है। कारण यह है कि महानगरों में आबादी बढ़ने से समस्या सिर्फ अधिकारियों को ही होती है। इसलिए वे चाहते हैं कि जनसंख्या स्थिर रहे, ताकी उनका काम न बढ़े। अर्थात् उनकी सोच यह है कि सभ्यता और संस्कृति अपनी नियति से न चले, बल्कि उनको पूछ-पूछ कर आगे बढ़े। किसी भी अधिकारी की तनख्वाह और नौकरी स्थायी कर दीजिए, फिर उनके ऐसे ही आरामतलब विचार हो जाएंगे। जबकि मेहनत करने वाले उद्यमियों की सोच सरकारी बाबुओं जैसी नहीं होती। जनसंख्या बढ़ना उनके लिए सुखद समाचार है क्योंकि इससे बाजार बढ़ता है। इसलिए काम का स्कोप भी बढ़ता है। हम सरकार को अपनी समस्याओं के हल के लिए चुनते हैं जब‌कि सरकार हमें ही समस्या मान लेती है और हमें ही निपटाने में लग जाती है। तो आइए आज देखते हैं कि किराए के मोर्चे पर सरकार ने हमारे सीने पर कैसे-कैसे तीर मारे हैं। उदाहरण दिल्ली का लेते हैं।
    ज्ञात हो कि यहाँ दिल्ली किराया नियंत्रण कानून 1958 से लागू है। दिल्ली में किराया बढ़ने का एक महत्वपूर्ण कारण यह किराया नियंत्रण कानून भी है, जिसे वास्तव में किराए की दरों को वाजिब बनाए रखने के लिए गढ़ा गया था। राजनीतिक, आर्थिक और कानूनी विषयों पर विचार करने वाली वैचारिक संस्था सेंटर फॉर सिविल सोसाइटी इस कानून के प्रभाव को लेकर खुश नहीं है। संस्था बताती है कि दिल्ली के कुछ पुराने रिहाइशी इलाकों में अधिकतर मकानों का किराया निर्धारित है। इस कारण संभव है कि वहाँ लाखों रुपये कमाने वाला व्यावसायी किराया के रूप में सौ रुपये ही देता हो। सेंटर के अध्यक्ष और अर्थशास्त्री पार्थ जे. शाह कहते हैं कि मकान मालिकों के बारे में लोग सोचते हैं कि वह मालदार होगा। पर हकीकत में वह पाई-पाई के लिए मोहताज हो सकता है। पॉश इलाके में उसकी लाखों की संपत्ति हो सकती है, पर किराये के रूप में उसे कुछ मामूली रकम ही मिलती हो। उतने से शायद उसका गुजारा भी ना चले। वह किराया बढ़ा नहीं सकता, क्योंकि उसका किराया नियंत्रित है। उसकी वही पूंजी अगर किसी अन्य व्यवसाय में लगी होती, तो वह शायद काफी कमा रहा होता। कम पैसा मिलने के बावजूद वे किरायेदार को निकालने में पूरी तरह असमर्थ हैं। इस कारण ऐसी संपत्तियों का आधुनिकीकरण और विकास नहीं हो पाता है। चूंकि पुराने किरायेदार जगह खाली नहीं करते, इसलिए उन मकानों को तोड़कर कोई नया बड़ा निर्माण नहीं किया जा सकता। ऐसे किराया नियंत्रित इलाके और मकानों की हालत काफी जर्जर है। शहर के विकास के साथ जैसे अन्य जगहों पर भव्य निर्माण हुए, वैसा यहाँ भी हो सकता था। पर इस कानून ने ऐसे निर्माण की संभावना को ही खत्म कर दिया है। घर का नवीनीकरण और उसका विकास करने में सक्षम लोग भी हाथ लगाना नहीं चाहते। एक सच यह भी है कि यह कानून सिर्फ उन्हीं परिसरों पर लागू होता है, जिनका किराया 3,500 रुपये या इससे कम है। अत: इस कानून के दायरे से बचने के लिए नये मकान का किराया हर हालत में इससे अधिक रखा जाता है। इस प्रकार इस कानून ने न सिर्फ किराए के घरों की किल्लत पैदा की है, बल्कि जो नये घर बने, उसका किराया भी कुछ अधिक रखे जाने की प्रवृत्ति पैदा की।
    किराया बढ़ाने का दूसरा बड़ा गुनाहगार है डीडीए। डीडीए यानी, दिल्ली डिस्ट्रक्शन अथॉरिटी (एक केंद्रीय राज्य मंत्री ने इसकी भूमिका को देखते हुए इसे यही नाम दिया था)। यह देखती है कि जमीन का कैसे विकास किया जाए। उसने मकानों के निर्माण के लिए जमीन अपने हाथ में ले रखी है। पर उतनी गति से बना नहीं रही, जितनी गति से इसकी जरूरत बढ़ रही है।
    तीसरा मसला मकानों की ऊँचाई को लेकर है। दिल्ली में जगह जगह मकानों की ऊँचाई सीमित है। कहीं दो मंजिल से अधिक नहीं बना सकते, तो कहीं तीन मंजिल से अधिक नहीं। अधिकांश जगह यह रोक बेमानी है। चूँकि सरकारी अधिकारियों के सोचने की क्षमता सीमित है। इसलिए वे मकानों की ऊँचाई और सभ्यता के विकास को भी सीमित कर देना चाहते हैं। वास्तव में विज्ञान और तकनीक का इतना विकास हो चुका है कि जमीन तो क्या समुद्र और नदियों में भी विशाल महल खड़े किये जा सकते हैं। फिर जमीन की क्षमता जैसे तर्क देना बेमानी है। अनर्गल सरकारी नियम आम आदमी को तो रोकता है पर उसी जगह विशाल अक्षरधाम मंदिर बनने से नहीं रोक पाता (हाल ही दिल्ली में यमुना किनारे पांडव नगर इलाके में यह मंदिर बना है, कहते हैं यह निर्माण अवैध है)।
    अगर जमीन कमजोर है या भूकंप का इतना बड़ा खतरा है, तो अरबों रुपये लगाकर अक्षरधाम मंदिर बनाने वाले लोग कोई बेवकूफ नहीं होंगे। जो आदमी करोड़ों की पूंजी लगाएगा और वर्षों तक उसका लाभ भी उठाना चाहेगा, वह निश्चय ही उस तकनीक को खुद ढूंढ लाएगा, जो उसके मकानों का उतना वर्ष खड़ा रहना सुनिश्चित करेगा। ताजमहल को चूँकि सैकड़ों वर्षों तक कायम रखना था। इसलिए जमीन कमजोर होने के बाद भी उसके तल में ऐसी व्यवस्था की गयी कि वह 1400 वर्षों तक अक्षुण्ण खड़ा रहे। एक पूंजीपति इसी प्रकार सोचता है। अगर सरकारी अधिकारी भी यह समझ पाते, तो दिल्ली के अधिकतर अविकसित इलाकों में बड़ी-बड़ी अट्टालिकाएँ खड़ी होतीं। और निश्चय ही मकानों की उतनी कमी नहीं होती, जितनी सरकारी सिरफिरी हरकतों से पैदा हो गई है।
    चौथा बड़ा गुनाहगार है बस्तियों को अवैध बनाए रखने की सरकारी प्रवृत्ति पिछले 2 जून की खबर है कि केंद्र दिल्ली में 1400 अनधिकृत बस्तियों को नियमित करने जा रहा है। अगर ये बस्तियाँ आज नियमित हो सकती हैं, तो कल तक ये अनधिकृत क्यों थीं? कारण साफ है कि सरकारी अधिकारी सोए हुए थे। उन्हें पता ही नहीं चला कि बस्तियाँ कब पैदा हो गईं। अभी भी सरकारी नक्शे में ऐसी कई जगह खाली दिखाई गई हैं, जो वास्तव में खाली नहीं हैं। वहाँ घनी आबादी बस चुकी हैं। सही कहें तो शहर काफी फैल चुका है, पर यदि सरकारी अधिकारी उसे मान लेंगे, तो उन्हें उन जगहों पर बुनियादी सुविधाओं की व्यवस्था भी करनी होगी। पर चूँकि वेतन सुनिश्चित है, इसलिए काम करने की क्या जरूरत? मेहनत से बचने का सबसे आसान तरीका यही है कि बस्तियों को ही अवैध कर दो। क्या विकसित होती सभ्यता की जरूरत के मुताबिक सरकारी अधिकारियों को अपनी क्षमता का विकास नहीं करना चाहिए? या फिर, क्या सभ्यता को ही निकम्मे सरकारी अधिकारियों की क्षमता की सीमा में सीमित करना होगा? सजा निकम्मे अधिकारियों को मिलना चाहिए। पर बात उल्टी होती है। विकसित होती सभ्यता को सरकारी अधिकारियों की सीमा में सीमित करने के लिए मकानों-दुकानों को सील किया जाता है। बन चुके भवनों को तोड़ दिया जाता है। जो सभ्यता ऐसी निकम्मी और सिरफिरी सरकार चुनेगी, उसे खामियाजा तो भुगतना ही होगा। कॉलोनियों को अवैध बनाने की प्रवृत्ति ने भी कॉलोनियों का विकास रोका है और मकानों की किल्लत पैदा की है। लाखों वर्षों से मनुष्य बस्ती बनाते आ रहे हैं। उन्हें 50 साल की सरकार से यह पूछने की जरूरत नहीं कि कहाँ रहें और कहां नहीं। यह जिम्मेदारी सरकारी मशीनरी की है कि वे अकर्मण्यता त्यागें और अपने पास पूरी सूचना रखें कि कहाँ-कहाँ लोग रहने जा रहे हैं और वहाँ पहले से ही सुविधाएँ पहुँचा देने की कोशिश करें। सरकारी मशीनरी का काम हमें रोकने का नहीं होना चाहिए। बल्कि उन्हें सुविधा और सही सूचना पहुँचाने के लिए तत्पर रहना चाहिए। वैज्ञानिक अनुसंधानों और खोज खबरों का मुस्तैदी से प्रसार करना चाहिए, ताकि लोग तथ्यपरक सूचना के आलोक में सही निर्णय ले सकें। और सबसे पहले तो हाथ पर हाथ धर कर बैठे रहना या कान में तेल डाल कर साने की आदत छोड़ देना चाहिए। वे सोते रहते हैं और जब जागते हैं, तो हाथ में हथौड़ा लेकर जनता के किये-कराये पर पानी फेरने को निकल पड़ते हैं।
    लोग मकान बनाने में सक्षम हैं, पर कानून और व्यवस्था उन्हें निवेश करने से रोकती है। इन्हीं कारणों से दिल्ली में किराया काफी महंगा हो गया है। जनहित को ध्यान में रखते हुए और किराया सस्ता करने हेतु अविलंब ऐसे अनर्गल नियम-कानूनों को समाप्त किया जाना चाहिए। इन सब उपायों से दिल्ली और दूसरे महानगरों में मकानों की कमी नहीं रहेगी और किराया खुद-ब-खुद सस्ता हो जाएगा।

इकोनॉमी इंडिया (जून/जुलाई 2006)
संजय कुमार साह