शिक्षा को रोजगारपरक नहीं, रोजगार का जरिया बनाएँ

पढ़े-लिखे बेरोजगारों की विशाल फौज को देखकर लोग अनायास ही कह देते हैं कि शिक्षा को 'रोजगार परक' बनाया जाना चाहिए। उनका तात्पर्य यह होता है कि जिन क्षेत्रों में रोजगार की अधिक संभावाएँ हैं, उनसे संबंधित शिक्षा को बढ़ावा दिया जाना चाहिए। देश के अधिकांश महाविद्यालयों में शिक्षा के नाम पर भाषा, साहित्य, इतिहास, राजनीति, समाजशास्त्र, विज्ञान, आदि विषय ही पढ़ाए जाते हैं। और इन विषयों की डिग्री लेने से किसी को कोई नौकरी मिलेगी, इसका कोई भरोसा नहीं। अत: ऐसे विषयों की पढ़ाई एवं उन पर होने वाले सरकारी खर्च के औचित्य पर प्रश्न उठना लाजिमी है। आखिर शिक्षा को रोजगारपरक कैसे बनाया जाए? ऐसा क्या किया जाए, जिससे शिक्षा का रोजगार से सीधा नाता जुड़ जाए?
    इसका एक मार्ग है। शिक्षा को रोजगारपरक बनाने के विषय में सोचना बंद करें और खुद शिक्षा को रोजगार का एक जरिया बना दें। सुन कर कुछ अजीबो-गरीब लग सकता है। पर सच्चाई ही कुछ ऐसी है। हमारे देश में शिक्षा क्षेत्र में व्यवसाय का प्रवेश निषिद्ध है। आप या हम लाभ कमाने वाला स्कूल कानूनी तौर पर नहीं चला सकते। इसलिए हमारी शिक्षा आजतक रोजगारपरक नहीं बन पाई है। एक बार व्यवसायियों को शिक्षा का व्यवसाय कर लाभ कमाने की अनुमति दे दी जाए। फिर देखिए। वे खुद ऐसी शिक्षा लेकर आएंगे, जो आपको व्यवसाय दिला पाने में सक्षम होगी। क्योंकि व्यवसायियों को लाभ तभी होगा, जब उसके स्कूल में बच्चे पढेंगे। और एक खुली प्रतियोगिता वाले माहौल में बच्चे उसी स्कूल में पढ़ेंगे, जो उन्हें रोजगार दिलाने का आश्वासन देगा। एक बार जब यह प्रक्रिया शुरू होगी, तब हम नागरिक नहीं, बल्कि स्कूल चलाने वाले उद्यमी यह सोचेंगे कि कैसे शिक्षा को रोजगारपरक बनाया जाए। यहाँ ऐसा नहीं है कि इस प्रतियोगिता में संस्कार जैसे तत्व शिक्षा से गायब हो जाएंगे। जिस प्रकार आज का विद्यार्थी और उसके अभिभावक रोजगारपरक शिक्षा चाहते हैं। उसी प्रकार वे संस्कारपरक शिक्षा भी चाहते हैं। इसलिए शिक्षा को रोजगारपरक बनाने की दौड़ में स्कूल उद्यमी संस्कार नहीं भूलेंगे। कोई अभिभावक अपने बच्चों को उस विद्यालय में भी नहीं भेजेगा, जहाँ जीवन मूल्य और सही संस्कार नहीं दिए जाते।
    आज शिक्षा देना सरकार का काम है। या इस प्रकार कहें कि हमने यह काम सरकार को दे रखा है। सरकार स्कूल को फंड देती है। और जो समझ में आता है, पढ़ाती है। शिक्षक एवं हेड मास्टरों को स्थायी वेतन मिलता है। अभिभावकों के पास बच्चों को सरकारी स्कूल छोड़कर कहीं और पढ़ाने का विकल्प नहीं है। वे प्राइवेट शिक्षा चाहे कहीं से दिला लें, पर परीक्षा के समय उन्हें सरकारी विद्यालय में ही आना पड़ता है। इसका नतीजा यह होता है कि न तो शिक्षकों में अच्छा पढ़ाने का जुनून है, न ही हेडमास्टरों में स्कूल के बेहतर संचालन की कोई अभिरुचि है। मास्टर या हेडमास्टर को वेतन मिलता रहे, इसके लिए सिर्फ ऊपर के अधिकारियों का खुश होना जरूरी है, नीचे के लोगों से कोई मतलब नहीं। यही नहीं, राष्ट्रीय अथवा राज्य स्तर पर पाठयक्रम निर्धारित करने वाली समिति में से भी किसी की अभिभावकों के प्रति कोई जिम्मेदारी नहीं। विद्यार्थी और अभिभावक उन्हें अपने हिसाब से पढ़ाने के लिए मजबूर नहीं कर सकते। इसलिए पाठयक्रम बनाने वालों को इस बात की कत्ताई चिंता नहीं की शिक्षा रोजगारपरक हो। उनकी पूरी मोनोपॉली है, इसलिए वे माथापच्ची नहीं करते। जरा सोचिए कि अभिभावकों को इतना ताकतवर कैसे बनाया जा सकता है कि पढ़ाने वाला उनकी इच्छा का पूरा ध्यान रखे! और उनके हिसाब से शिक्षा को रोजगारपरक एवं संस्कारपरक बनाने के लिए मुस्तैद रहे।
    नि:संदेह निजी दुकान चलाने वाले ही अपने ग्राहक का सम्मान करते हैं। क्योंकि उनकी आमदनी का घट-बढ़ ग्राहकों पर ही निर्भर करता है। शिक्षा क्षेत्र में काम करने वाली दिल्ली की वैचारिक संस्था सेंटर फॉर सिविल सोसाइटी शिक्षा में अभिभावकों के मनोनुकूल क्रांतिकारी सुधार के लिए शिक्षा क्षेत्र में रोजगार का मार्ग खोलने की बात करती है। यही नहीं वह अपने राष्ट्रव्यापी स्कूल चयन अभियान में सीधे विद्यार्थियों या अभिभावकों के हाथ में पैसा देकर उसे अपने हिसाब से श्रेष्ठ विद्यालय चुनने के लिए सशक्त करने का प्रयास भी करती है।
    यहाँ यह भी समझने की जरूरत है कि बेरोजगारी की मार झेलते इस देश में शिक्षा खुद रोजगार का एक बड़ा जरिया है। आस-पास के विद्यार्थी संसार में चल रही गतिविधियों पर ध्यान दीजिए, तो दिमाग का फ्यूज बल्ब यकायक जल उठेगा। गाँव हो या शहर, टयूशन पढ़ाकर अपनी जीविका, जेब खर्च अथवा पढ़ाई का खर्चा निकालने वाले प्राइवेट गुरु हर जगह देखे जा सकते हैं। गौर करने वाली बात यह है कि सरकारी स्कूल-कॉलेज में पढ़ाई हो या न हो, ये टयूशन पढ़ाने वाले गुरुजी बड़े जतन से पढ़ाते हैं और अभिभावक तथा उनके बच्चों को भी इन प्राइवेट गुरुओं पर पूरा भरोसा है। क्यों न शिक्षा व्यवस्था में इन प्राइवेट गुरुओं को पर्याप्त जगह दी जाए एवं उन पर भरोसा करते हुए उनकी भूमिका को और भी बढ़ाया जाए? ये प्राइवेट गुरुजी जहाँ गुणवत्तापूर्ण शिक्षा देते हैं, वहीं बजट पर कोई बोझ भी नहीं बढ़ाते। साथ ही शिक्षा को जर्जर एवं बदहाल सरकारी विद्यालयों की चारदिवारी से बाहर निकालकर गाँव-गाँव, गली-गली एवं एक-एक घर में ले जाने में भी इन प्राइवेट गुरुओं की बड़ी भूमिका है।
    सेंटर फॉर सिविल सोसाइटी के प्रेसीडेंट एवं अर्थशास्त्री पार्थ जे. शाह इन प्राइवेट गुरुजी को सिस्टम का हिस्सा बनाने के लिए कुछ रचनात्मक सलाह देते हैं। दसवीं अथवा किसी भी प्रकार की बोर्ड परीक्षा में सरकारी विद्यालय के माध्यम से ही बैठने की बाध्यता समाप्त की जा सकती है। विद्यार्थियों को अगर स्वतंत्र रूप से बोर्ड परीक्षा में शामिल होने की अनुमति हो, तो इन प्राइवेट गुरुओं की भूमिका अपने आप बढ़ जाएगी, और पढ़े-लिखे बेराजगारों को रोजगार का एक नया जरिया मिल जाएगा। यही नहीं अगर निजी स्कूलों के खुलने की राह में खड़े तमाम सरकारी अड़चन हटा दिया जाएँ, तो ये प्राइवेट गुरु ही कल उद्यमी बन जाएंगे। और छोटे-बड़े अनेक स्कूल लेकर आ जाएंगे। उनके संगठित होकर पढ़ाने से शिक्षा में कई नये प्रयोगों की संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता है।
    शिक्षा रोजगारपरक हो, यह तो नि:संदेह आवश्यक है। पर यह काम सरकार ठीक प्रकार से कर सकती है या फिर शिक्षा देने वाले निजी उद्यमी? सरकारी शिक्षा में बदलते समय और बदलती जरूरतों के अनुसार खुद को बदलने की अधिक क्षमता होगी या फिर निजी शिक्षा में? साथ ही शिक्षित बेरोजगारों को रोजगार का एक जरिया देने में समर्थ इस क्षेत्र के द्वार बंद रखे जाएँ या फिर इसे रोजगार का जरिया बनाकर नये प्रयोग एवं नयी संभावनाओं के मार्ग प्रशस्त किये जाएँ? इन प्रश्नों पर आज सरकार द्वारा रटाये तरीके से अलग हटकर थोड़ा रचनात्मक अंदाज में सोचने की जरूरत है।

मानवाधिकार टाइम्स (18-24 मार्च, 2007)
संजय कुमार साह