जो व्यवस्था बेरोजगारी पनपने देती है

    देश आज जिन चुनौतियों से जूझ रहा है, बेरोजगारी उनमें से एक है, इसलिए रोजगार योजनाओं पर करोड़ों रुपये खर्च किए जाते हैं। इस वर्ष का बजट पेश करते हुए वित्त मंत्री पी. चिदंबरम ने कहा है कि सरकार का लक्ष्य विभिन्न योजनाओं के तहत गरीबी खत्म करना और रोजगार के अवसर पैदा करना है। लेकिन यदि हम सरकार के काम-काज के तरीकों पर गौर करें तो पाएंगे कि स्वयं सरकार बेरोजगारी की समस्या के लिए बहुत हद तक जिम्मेदार है। इस सच्चाई को जानने-समझने के लिए बहुत दूर जाने की जरूरत नहीं है। रोजगार के लिए पहला कदम बढ़ाने के साथ ही हमें इसका आभास हो जाता है। यदि कोई गरीब और निरक्षर व्यक्ति रोजगार के लिए रिक्शा चलाना चाहे तो उसे मात्र एक रिक्शा खरीदने व उसे चलाना सीखने की जरूरत है और उसे रोजगार मिल जाएगा। पर क्या यह सचमुच इतना आसान है?
    'दिल्ली नगर निगम साइकिल रिक्शा बायलॉज, 1960' के अनुसार, दिल्ली में रिक्शा चलाने के लिए रिक्शा मालिक-चालक लाइसेंस होना जरूरी है। बायलॉज के अनुसार, रिक्शे का मालिक ही रिक्शा चालक हो सकता है। विधवाओं और विकलांगों के अलावा किसी को एक से अधिक लाइसेंस नहीं दिए जा सकते। उसे किसी दूसरे के नाम हस्तांतरित भी नहीं किया जा सकता। साथ ही, रिक्शों की संख्या सीमित करने के उद्देश्य से वर्ष 1998 में नगर निगम ने लाइसेंस की संख्या अधिकतम 99,000 निर्धारित कर दी।
    लेकिन वास्तविकता यह है कि फिलहाल दिल्ली में लगभग सात लाख रिक्शे चल रहे हैं। पर नगर निगम की अधिकतम 99,000 लाइसेंस देने की सीमा के कारण लगभग छह लाख रिक्शे अवैध हो गए हैं और पुलिस को यह अधिकार मिल गया है कि वह उनकी धड़पकड़ करे। बिना लाइसेंस वाले रिक्शों को पकड़ने के पश्चात उसे छोड़ने के लिए रिश्वत ली जाती है। दिल्ली के अधिकांश रिक्शा चालक हरियाणा, उत्तर प्रदेश, बिहार और बंगाल से अस्थायी तौर पर रोजगार की खोज में आए हुए लोग हैं। उनका परिवार गाँव में ही रहता है। वे फसल के मौसम में वापस गांव चले जाते हैं। उस समय उन्हें वहां रोजगार मिल जाता है। फिर बेरोजगारी का मौसम आने पर वे दिल्ली या दूसरे महानगर चले जाते हैं। दिल्ली में ये स्थायी तौर पर नहीं रहते, इसलिए लाइसेंस नहीं लेते, बल्कि रिक्शा माफियाओं से किराए पर लेकर रिक्शा चलाने में ही इन्हें सुविधा होती है। इस प्रकार, पुलिस को शोषण का एक और हथियार मिल जाता है। नगर निगम के अधिकारी रिक्शा माफियाओं को ही लाइसेंस देना चाहते हैं। इन माफियाओं के पास दस से लेकर 200 रिक्शे तक होते हैं। किसी-किसी के पास हजार रिक्शे भी होते हैं। रिक्शा चालक उन्हें बीस रुपये प्रतिदिन के हिसाब से छह सौ रुपये प्रतिमाह किराया देते हैं, जो एक नए रिक्शे की कीमत का बीस प्रतिशत और पुराने का पचास प्रतिशत है। लेकिन लाइसेंसी अनिवार्यता के कारण रिक्शा चालक अपना रिक्शा खरीदकर इस शोषण के चक्र से बाहर नहीं निकल सकते।
    सवाल यह पैदा होता है कि रिक्शों की संख्या पर नियंत्रण लगाने की जरूरत ही क्या है। दिल्ली में निर्धारित सीमा से सात गुणा अधिक रिक्शे चल क्यों रहे हैं? क्या सरकारी सीमा जनता की घटती-बढ़ती जरूरतों से मेल खाती है? लोगों को सस्ती और प्रदूषणरहित परिवहन सेवा उपलब्ध कराने वाले इन रिक्शों की संख्या को सीमित करने और लाखों लोगों को उनकी जीविका से बेदखल करने का क्या अर्थ है? रिक्शा चालकों द्वारा लाखों रोजगार पैदा किए जा सकते हैं, लेकिन वर्तमान कानून ने इसे अवैध बनाकर गरीबों के कमाने के हक पर ताला लगा दिया है। जब एक ही रिक्शा को तीन आदमी अलग-अलग समय में खींच कर अपनी जीविका चला सकते हैं, तो फिर उसे एक ही चालक तक सीमित रखने का क्या तुक है?
    एक ओर, सरकार रोजगार के नाम पर अनेक योजनाएं चलाती है, तो दूसरी ओर, गरीबों को ईमानदारी से कमाने से रोकती है। आम तौर पर लोग अपने रोजगार को धीरे-धीरे फैलाते हैं और अपनी आय बढ़ाते हैं। एक व्यक्ति एक से अधिक कार रख सकता है, पर एक रिक्शा चालक को एक से अधिक रिक्शा खरीदने का अधिकार नहीं है। क्यों? एक समझदार नागरिक भला ऐसे व्यवसाय में क्यों हाथ डालेगा, जिसे फैलाना गैरकानूनी है? एक चालक, एक रिक्शा का नियम सिर्फ गरीब को ही मेहनत करके आगे बढ़ने से रोकता है, कानून तोड़ने वाले माफियाओं को सैकड़ों रिक्शे रखने से नहीं रोक पाता। क्या मेहनतकश रिक्शा चालकों को भी एक से अधिक रिक्शा चलाकर समृद्ध बनने का अधिकार नहीं होना चाहिए?
    स्पष्ट है कि दिल्ली नगर निगम का रिक्शा कानून गरीब-विरोधी कानून है।यह गरीबों को एक रोजगार चुनने और उसे फैलाकर अपनी आय बढ़ाने से रोकता है। क्यों न इस कानून को हटाकर रोजगार का मार्ग प्रशस्त किया जाए? गरीबी हटाओ का नारा देने वाली पार्टियां व गरीबों का मसीहा बनने वाले नेता इस विषय में क्या सोचते हैं?

अमर उजाला (30 अप्रैल 2005)
संजय कुमार साह