जनता का हथियार

    दिल्ली सहित देश के 7 राज्यों में सूचना का अधिकार अधिनियम लागू हो चुका है। इस अधिनियम के अनुसार हर नागरिक को यह अधिकार है कि वह सरकार से उसकी किसी भी गतिविधि, प्रावधान, योजना, आदि से संबंधित कोई सूचना मांग सकता है। प्रशासनिक सुधार की दिशा में यह एक अच्छा कदम है। स्वीडन में पिछले 200 सालों से भी अधिक समय (1776 ई­) से यह अधिनियम लागू है और वहाँ भ्रष्टाचार लगभग नहीं के बराबर है।
    अभी बहुत कम लोगों को इस अधिनियम की जानकारी है, फिर भी कई लोगों और नागरिक समूहों ने इसका उपयोग कर प्रशासनिक भ्रष्टाचार को उजागर किया है और समय रहते इस पर काबू पाया है। इस संबंध में दो उदाहरण गौरतलब हैं। जब दिल्ली में प्रदूषण फैलाने वाले उद्योगों को बंद किया जा रहा था, तब प्रेमचंद जैन की फैक्टरी भी बंद कर दी गई। लेकिन दिल्ली विद्युत बोर्ड उसे न्यूनतम शुल्क के आधार पर लगातार बिल भेज रहा था। जबकि इस संबंध में स्पष्ट प्रावधान था कि ऐसे किसी मामले में कोई बिल नहीं भेजा जा सकता है। जैन ने कार्यालय के कई चक्कर लगाए, पर किसी के कान पर जूँ नहीं रेंगी। अंतत: उन्होंने सूचना का अधिकार अधिनियम के तहत यह जानना चाहा कि उन्हें किस अधिकारी से शिकायत करनी चाहिए। 15 दिनों के अंदर उनकी समस्या सुलझा दी गई।
    दूसरा उदाहरण दो साल पहले की बात है। दिल्ली के बहुत से लोगों ने गरीबी रेखा से नीचे वाले राशन कार्ड के लिए आवेदन किया था। काफी समय बीत गया। उन्हें न तो राशन कार्ड मिला न यह बताया गया कि कार्ड मिलेगा भी या नहीं। उन्होंने राशन कार्यालय के कई चक्कर लगाए। अधिकारीगण टालमटोल करते रहे। इस संबंध में सूचना का अधिकार अधिनियम के तहत सुंदर नगरी नई सीमापुरी के लाभार्थियों की सूची देखी गई तो पता चला कि कई लोगों के कार्ड महीनों पहले बन चुके थे और वे वहाँ के स्थानीय दुकानदारों के कब्जे में थे जो उनके नाम पर राशन उठा रहे थे। खाद्य विभाग के सर्वोच्च अधिकारियों के हस्तक्षेप के बाद कार्ड के असली हकदारों को उनका कार्ड लौटाया गया।
    इस तरह यह अधिनियम नागरिकों को यह सुविधा देता है कि वे सरकार की गतिविधियों और सरकार द्वारा दिये गये ठेकों पर कड़ी नजर रख सकें। आप किसी परियोजना में हुए सरकारी खर्च अथवा किसी विभाग द्वारा विशेष अवधि में किसी खास क्षेत्र में किये गए काम का हिसाब मांग सकते हैं। फिर सरकार द्वारा प्रदत्ता ऑंकड़ों का जन सुनवाई प्रक्रिया के तहत वास्तविक विकास कार्यों से मिलान कर यह पता लगा सकते हैं कि उनमें से वस्तुत: कितनी राशि खर्च हुई।
    हालांकि अधिनियम प्रशासनिक सुधार की दिशा में एक महत्तवपूण कदम है फिर भी इसमें कुछ बड़ी खामियाँ रह गई हैं। जैसे कोई स्वतंत्र प्रणाली नहीं बनाई गई जहां मामलों की अपील की जा सके। सरकार ने कार्य को अंजाम देने और लापरवाही के लिए शिकायत सुनने और सजा देने की भूमिका सब अपने हाथ में रख ली है, जिसकी वजह से अधिकारियों पर अपना काम जिम्मेदारीपूर्वक करने का कोई दबाव नहीं है। साथ ही जन शिकायत आयोग के आदेश का पालन न करने पर सजा का स्पष्ट प्रावधान भी नहीं है।
    इस अधिनियम के तहत सूचना हासिल करने के लिए काफी शुल्क अदा करना होता है। गरीब न तो अकेले इतना शुल्क अदा कर सकता है और न वे साधारणत: इतना संगठित रहते हैं कि मिल कर शुल्क अदा करें। अधिनियम में कुछ दूसरी भी खामियाँ हैं, जिन्हें दूर किए जाने की जरूरत है। इसके लिए निम्नलिखित सुधार किए जा सकते हैं:
    एक, अधिनियम में कुछ आवश्यक सूचनाओं की सूची बनायी गयी है, जिसे हर विभाग नियमित रूप से प्रकाशित करेगा। इसमें बजट, कार्मिक, योजनाएँ और कार्यक्रम, वेतन और मजदूरी, टेंडर और ठेका, आदि अन्य विषय भी जोड़े जाने चाहिए। उपर्युक्त सुझावों के मद्देनजर इस अधिनियम का नाम सूचना का अधिकार अधिनियम से बदल कर 'सूचना के प्रकाशन कार् कत्ताव्य अधिनियम' किया जाना चाहिए। इसी के तहत दिल्ली नगर निगम और लोक निर्माण विभाग और किसी भी सरकारी एजेंसी द्वारा दिये गये सभी ठेका दस्तावेजों को चुनिंदा पुस्तकालयों और निकटस्थ सरकारी विद्यालयों में रखा जाना चाहिए और संबंधित क्षेत्र के रेजीडेंट वेलफेयर एसोसिएशनों को भी दिया जाना चाहिए। टेंडरों और ठेकों को विभाग की वेबसाइट पर भी रखा जाना चाहिए। संबंधित कार्यों की प्रगति रिपोर्ट का नियमित नवीनीकरण किया जाना चाहिए।
    दो, सूचना डिजिटल रूप में भी सुलभ कराई जानी चाहिए। तीन, आवेदन और प्रतिलिपि शुल्क कम किया जाना चाहिए। यह मानना गलत है कि कम कीमत रखने पर सूचना हासिल करने वालों का ताँता लग जाएगा क्योंकि सूचना हासिल करने के लिए पूरी प्रक्रिया में पैसा और समय बहुत खर्च होता है। चार, अपील के लिए एक स्वतंत्र द्विस्तरीय प्रणाली स्थापित की जानी चाहिए। अपील प्राधिकारी को रिकार्ड मांगने और सरकारी अधिकारी को समन भेजने, दंडित करने जैसे न्यायिक अधिकार होने चाहिए। विशेष कर दंड से संबंधित नियम छह में कुछ ऐसे सुधार करने की जरूरत है, जिनसे दंड सिर्फ सक्षम अधिकारी पर ही नहीं बल्कि उन सभी अधिकारियों पर भी लगाये जा सकें, जो या तो अधिनियम का उल्लंघन करते हैं या नियम के उल्लंधन के लिए किसी भी प्रकार से जिम्मेदार हैं।

जनसत्ता (12 मार्च, 2004)
संजय कुमार साह