गैरमान्यता प्राप्त स्कूलों को क्यों करें बंद

    आजकल जनहित के मुद्दों पर अदालत के काफी आदेश आ रहे हैं। दिल्ली हाईकोर्ट का नया आदेश है कि 'गैर मान्यता प्राप्त स्कूलों को निश्चित रूप से बंद करना होगा, अगर यहां पर स्कूल चलाने की शर्तों का पालन नहीं हो रहा हो'। कोर्ट ने कहा है कि इस प्रकार के स्कूलों में बच्चों की सुरक्षा के इंतजामात काफी मायने रखते हैं। दरअसल अधिवक्ता अशोक अग्रवाल ने वर्ष 2005 में सरिता विहार के एक स्कूल में आग लगने के बाद इस संबंध में हाईकोर्ट के समक्ष एक याचिका दायर की थी। उस स्कूल के ऊपर वाली मंजिल पर गैस से संबंधित काम होता था। कोर्ट ने ऐसे स्कूलों पर कार्रवाई के लिए एक तीन सदस्यीय निगरानी समिति का गठन किया है।
    अधिवक्ता महोदय की दलील है कि तमिलनाडु और कश्मीर के स्कूलों में दुर्घटना के बाद वहाँ सभी गैर मान्यता प्राप्त स्कूलों को बंद कर दिया गया। इसका अर्थ है कि वे दिल्ली में भी कुछ ऐसी ही कार्रवाई चाहते हैं। पर रुकिये जनाब! कोई भी कदम उठाने से पहले उसका आगा-पीछा एक बार सोच लेना अच्छा रहता है। कानून मानना हम सबकी जिम्मेदारी जरूर है। पर कानून की भी जिम्मेदारी है कि वह सही और व्यावहारिक हो। दिल्ली में दुकानों को सील करवाने वाला कानून भी एक कानून था। और अगर सील खुलवाने वाला कोई कानून बनता है, तो वह भी एक कानून होगा। दोनों में से एक ही कानून सही होगा। और दूसरा गलत होगा। कानून का क्या है, कुछ भी बना दो! संविधान में हुए नब्बे से अधिक संशोधन यही बताते हैं कि कानूनों एवं सरकारी नीतियों में भी कुछ खामियाँ हो सकती हैं। इसलिए बजाए लकीर का फकीर बनने के हमें कभी-कभी कानून से परे किसी और तरह से भी सोचना चाहिए। यूँ कहें कि आउट ऑफ बॉक्स भी सोचना चाहिए।
    अधिवक्ता महोदय के तर्क के अनुसार दिल्ली में भी तमिलनाडु और कश्मीर की तरह सारे गैरमान्यता प्राप्त स्कूलों को बंद कर दिया जाना चाहिए। गौरतलब है कि दिल्ली नगर निगम ने 2000 गैर मान्यता प्राप्त स्कूलों की सूची कोर्ट को सौंपी है। और याचिकाकर्ता के मुताबिक दिल्ली शहर में इस प्रकार के दस हजार स्कूल हैं। अब सोचने वाली बात यह है कि इन स्कूलों में कितने बच्चे पढ़ते होंगे। और स्कूल बंद होने के बाद उनका क्या होगा। सोचने वाली दूसरी बात यह है कि ये बच्चे इन गैरमान्यता वाले स्कूलों में क्यों पढ़ते हैं, जबकि सरकार ने इन बच्चों के लिए तथाकथित सभी सुरक्षा मानदंडों पर खड़ा उतरने वाले स्कूल बना रखे हैं? निश्चित रूप से बच्चों की सुरक्षा को लेकर जितना अशोक अग्रवाल चिंतित हैं, उससे कहीं ज्यादा चिंता बच्चों के माता-पिता को होगी। सोचने वाली तीसरी बात यह है कि गैरमान्यता प्राप्त स्कूल कैसे सामने आ गए। यह कोई सरकारी स्कूल तो हैं नहीं कि बगैर विद्यार्थी के भी सरकारी फंड पर चलते रहेंगे। ज्ञात हो कि सर्वशिक्षा अभियान की घोर असफलता के बाद खुलासा हुआ कि देश भर में कई ऐसे स्कूल हैं, जहाँ शिक्षक ही नहीं हैं। और कई ऐसे स्कूल हैं, जहाँ एक भी विद्यार्थी नहीं है। बगैर विद्यार्थी एवं बगैर शिक्षक के बल पर सरकारी स्कूल तो इसलिए चलते रहते हैं कि उन्हें सरकार से फंड मिलता रहता है। और सरकारी कार्यप्रणाली में भ्रष्टाचार के सारे दरवाजे खुले रख छोड़े गए हैं। पर अशोक अग्रवाल ही ऐसे गैरमान्यता वाले स्कूलों की कल्पना कर सकते हैं, जहाँ विद्यार्थी या शिक्षक नहीं होंगे। यहाँ मेरा विशेष अनुरोध है कि मेरी भावनाओं को मानहानि का मुद्दा न बनाया जाए।
    जैसे कुछ लोगों को बच्चों की सुरक्षा की चिंता है, उसी प्रकार मुझे या मुझ जैसे कुछ लोगों को बच्चों की शिक्षा की चिंता है। अगर ये गैरमान्यता प्राप्त स्कूल चल रहे हैं, तो उसका मतलब ही यही है कि सरकार वहाँ पढ़ने वाले बच्चों की शिक्षा की व्यवस्था कर पाने में असफल रही है और अभिभावकों को सरकारी स्कूलों से अधिक भरोसा इन गैरमान्यता प्राप्त स्कूलों पर है। अशोक अग्रवाल ही बताते हैं कि दिल्ली में ऐसे दस हजार स्कूल चल रहे हैं। जरा सोचिए! ऐसे स्कूलों को बंद करवाकर आप बच्चों की सुरक्षा कर रहे हैं या उन्हें शिक्षा से वंचित कर रहे हैं? याचिकाकर्ता के तर्क से चला जाए, तो दिल्ली में सभी सड़कों को तोड़ कर परिवहन व्यवस्था ठप कर देनी चाहिए, क्योंकि उन पर दुर्घटना में किसी की जान चली जाती है। पर नहीं, हम परिवहन व्यवस्था में सुधार कर उसे दुर्घटना मुक्त बनाने की सोचते हैं। जरा रुक कर सोचने की जरूरत है कि सभी गैरमान्यता प्राप्त स्कूलों को बंद करने का भष्मासुरी फार्मूला कितना सही है।
    दिल्ली की वैचारिक संस्था सेंटर फॉर सिविल सोसाइटी के शिक्षा केंद्र से जुड़ी नेहा कहती हैं कि दिल्ली में हाल यह है कि 5वीं कक्षा में पढ़ने वाले सरकारी स्कूलों के बहुत सारे बच्चे पढ़ना लिखना तक नहीं जानते। जबकि उसी स्तर के निजी स्कूलों के बच्चों का प्रदर्शन अपेक्षाकृत बहुत बढ़िया है। निजी गैरमान्यता प्राप्त स्कूल बहुत कम संसाधनों पर मुश्किल से चल रहे होते हैं, फिर भी अच्छा परफॉरमेंस देते हैं। इसका कारण प्रतियोगिता की भावना है। अगर बाजार में निजी स्कूलों की मांग है, तो उसके पीछे कारण है और उसकी आपूर्ति भी जरूरी है। अभिभावक कभी भी अपने बच्चों का बुरा नहीं सोचते। नेहा कहती है कि दुर्घटना तो कहीं भी हो सकती है। सरकारी स्कूलों में भी छत गिरने के बहुत से उदाहरण मिल जाएंगे। गैरमान्यता प्राप्त स्कूलों में सुरक्षा बढ़ाने के लिए मैं किसी भी नये रेगुलेशन का समर्थन नहीं करूंगी। नया रेगुलेशन निजी स्कूलों के खुलने की राह में बाधा ही खड़ी करेगा। इससे मांग के अनुरूप आपूर्ति नहीं हो पाएगी। जिससे प्रतियोगिता के अभाव में बाकी स्कूलों में बेहतर पढ़ाई, कम शुल्क और बेहतर परिस्थितियाँ बनाने की प्रेरणा समाप्त हो जाएगी। हमें रेगुलेशन और नियंत्रणों से मुक्ति की ओर बढ़ना चाहिए। ताकि बाजार में प्रतियोगिता बढ़े। ऐसे प्रतियोगी माहौल में अगर किसी स्कूल में कोई दुर्घटना होती है, तो उस स्कूल की बदनामी ही होगी। इसका सबसे ज्यादा नुक्सान स्कूल चलाने वाले को ही होगा।
    याचिकाकर्ता और इस प्रसंग से जुड़े सभी पक्षों को एक बार नेहा की बात पर भी गौर करना चाहिए।

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आलेख निम्न लिखित अन्य स्थानों पर भी युवराज फीचर के सहयोग से प्रकाशित हुआ।

  • दिग्विजय, दिल्ली, 28 फरवरी 2007;
  • रोशनी दर्शन, दिल्ली 28 फरवरी 2007;
  • दैनिक हिंद जनपथ, पंचकुला एवं सोलन, 21 फर 2007;
  • सेक्युलर भारत, दिल्ली 5 मार्च 2007;
  • भारत पुत्र हिंदी साप्ताहिक, दिल्ली 19-25 फरवरी 2007;
  • दैनिक तरुण देश, भीलवाड़ा
  • सच कहूँ, सरसा, 19 फरवरी 2007
  • शाह टाइम्स, दिल्ली 20 मार्च 2007 यहां मीडिया फीचर्स आफ इंडिया ने ''गैर मान्यता प्राप्त स्कूलों पर गाज'' शीर्षक से भेजा था।
वीर प्रताप, जालंधर (17 फरवरी 2007)
संजय कुमार साह