खपत समानता का नकारात्मक पहलू - जॉन वी.सी. नेय

क्यों बातें बेहतर होने पर ज्यादा खराब लगने लगती हैं?

अर्थशास्त्र के पेशे में इस बात को लेकर कोई शक नहीं है कि आय असमानता को लेकर आम सोच दिशाहीन करने वाली है। साथ ही इस बात के भी पक्के प्रमाण हैं कि अब तक जिन रुझानों का अध्ययन किया गया है, वे वास्तविक असमानता में इजाफे को कुछ ज्यादा ही बढ़ा-चढ़ाकर बताते हैं। विल (विलकिंसन) ने इस क्षेत्र में इनमें ज्यादा महत्वपूर्ण ताजा जानकारियों को संक्षेप में अच्छी तरह से पेश किया है। वह यह कह सकते थे कि जब घर बनाम व्यक्ति (लोग आजकल अकेले रहने के लिहाज से ज्यादा सक्षम/इच्छुक हैं, जिससे औसत में गिरावट हो सकती है) की तुलना करने पर तो असमानता और अधिक गुमराह करने वाली हो सकती है या फिर ज्यादा आप्रवास (कम आय वाले अप्रवासी हो सकता है कि स्थानीय लोगों की आय में इजाफे का आभास दें, लेकिन हो सकता है कि वे आय के वितरण को बढ़ाकर मापे गए औसत को और कम कर दें) मामले को उलझा सकता है या फिर कर पूर्व आय पर ध्यान केंद्रित करने से-परिभाषा के लिहाज से-पुनर्वितरण के लिए बनाई गई प्रगामी (progressive) कर नीति के फायदे नहीं दिखा सकते।

फिर भी, इस बात के प्रमाण मौजूद हैं कि पिछले 30-40 सालों में आय असमानता में इजाफा हुआ है। और निश्चित तौर पर यह सोच भी मौजूद है कि आय में ज्यादा असमान इजाफा हुआ है। आंकड़े भले ही यह कहते हों कि यह इजाफा कम है, लेकिन इससे लगता नहीं कि सार्वजनिक नीतियों पर होने वाली बहस में इस मुद्दे के गर्म होने पर कोई फर्क पड़ा है। इससे यह समझ आता है कि असमानता पर होने वाली बहस महज असमानता को लेकर नहीं है, बल्कि न्याय की धारणाओं पर भी है और इस बात पर भी कि किस तरह के सामाजिक परिणामों की तारीफ की जाए और किनकी आलोचना। हमारी असहमति के स्रोत को तलाशने का काम उस वक्त और अधिक उलझ जाता है जब हम गलत व्याख्या वाली बात को ही प्रमाण मानने लगते हैं या उन नीतियों से चिपके रहना चाहते हैं, जिनकी हम वकालत करते रहे हैं। विल जहां पर विभिन्न सामाजिक संस्थाओं के न्याय और अन्याय को 'असली' मुद्दा मानने की हमसे अपेक्षा कर रहे हैं, मैं एक अलग ही विचार की बात करना चाहूंगा जो आर्थिक असमानता को लेकर सैद्धांतिक और अनुभवजन्य विचारों से जन्मा है।

पिछली दो सदियों में ज्यादा समानता की आकांक्षा दरअसल पूरी दुनिया में लोकतंत्र के प्रसार और लोकतांत्रिक प्रवृत्ति का ही परिणाम है। तोकेविले (tocqueville) पहले ऐसे व्यक्ति थे, जिन्होंने इस बात को पहचाना कि लोकतांत्रिक अमेरिका के लिए समानता का भाव कितनी अहम बात है। उन्होंने कहा था, अमेरिकी 'स्वतंत्रता में असमानता से ज्यादा गुलामी में समान रहेंगे।' लेकिन विडंबना ही कही जाएगी इस औद्योगिक युग में जिस आर्थिक विकास ने खपत में भौतिक समानता को बढ़ावा दिया है और इस विकास के साथ मिली संपूर्ण कल्याण और तुलनात्मक समानता की उम्मीद, वही आर्थिक विकास असमानता के अनुभव को और बुरी स्थिति तक ले जाएगा, फिर आंकड़े भले ही कुछ भी दर्शा रहे हों। और यह इसकी वजह है प्रतिष्ठा और हैसियत का सामान। इस मूल विचार को समझने के लिए लोगों द्वारा इस्तेमाल किए जाने वाले सामान और सेवा के विभिन्न वर्गों का विचार करें। तर्क की खातिर मान लीजिए कि प्रौद्योगिकी में सुधार और कौशल में वृद्धि के कारण अधिकांश उत्पादों का फिर से उत्पादन किया (reproducible) जा सकता है। खाने-पीने की सामग्री, कपड़े, कार, उपकरण, खिलौने इस वर्ग में आते हैं। आज एमआरआई मशीन या लक्जरी स्पोर्ट्स कारें जितनी महंगी हैं, हम ऐसी दुनिया की कल्पना कर सकते हैं जहां इस तरह का सामान (या उनके नजदीकी विकल्प) इतने सस्ते हो जाएंगे कि हर कोई उसे खरीदने की क्षमता रख सकेगा। इसके ठीक विपरीत-उदाहरण के लिए, सबसे लोकप्रिय आवास का स्थान या झील का सबसे मनोहारी दृश्य-जिसे प्रौद्योगिकी या बेहतर अर्थव्यवस्था के साथ नहीं बढ़ाया (multiply) जा सकता। ऐसे में पारिभाषिक तौर पर तो पूरी दुनिया में पहले जिक्र किए गए सामान की उपलब्धता में सुधार, पूर्ण समानता की स्थिति तक भी, का भी मतलब यही रहेगा कि आसानी से दोबारा न बनाए जा सकने वाले उत्पाद लोगों के दिलोदिमाग पर छाए रहेंगे। जब नमक और मसाले महंगे होते थे तो इन तक पहुंच से ही लोग आपसी अंतर का अहसास दिलाता था। आज नमक इतना सस्ता है कि कोई बजट की तुलना करते वक्त इसके बारे में सोचता तक नहीं है। जैसे-जैसे ज्यादा सामान और सेवाएं-बात फिर टीवी सेट की हो, एमपी-3 प्लेयर की या कम्प्यूटर या तीन बार बायपास सर्जरी की-आसानी से उपलब्ध होंगे, तो पारिभाषिक तौर पर तो वह सामान और सेवाएं आपसी जलन और असमानता वाली होंगी जो बढ़ते कौशल से असंबद्ध हों। इस तरह से हमारी असमानता की भावना, भौतिक वस्तुओं में असमानता में कमी के साथ वास्तव में बढ़ेगी। कुछ वस्तुएं लगभग स्थिर हैं-आज दुनिया में कई सारे पिकासो हैं। कुछ अन्य को भी नियत किया जा सकता है क्योंकि ये तुलनात्मक स्थान वाली होती हैं-पारिभाषिक तौर पर सर्वश्रेष्ठ 10 यूनिवर्सिटी या 10 सर्वश्रेष्ठ आवासीय स्थान हो सकते हैं। इनमें से कुछ-जैसे किसी शहर में सबसे पसंदीदा स्थान-पसंदीदा शहर और लोगों की पहुंच के स्तर के लिहाज से बदल सकते हैं। लेकिन बाद की वस्तु ऐसे तरीकों से बदलेगी जो बेहतर उत्पादकता के काफी नजदीक हों। और बढ़ती दौलत पहुंच को आसान नहीं बनाएगी। वाकई, यह सच है कि ज्यादा आय के कारण लोग बेहतर स्थानों के लिए दावे कर सकते हैं, लेकिन हमें यह जानकर हताशा होगी कि अगर हर कोई हमारी ही गति से समृद्ध हो रहा है तो किसी सामान को लेकर हमारी उपभोग की उम्मीद हमारी वास्तविक सोच से भिन्न होगी। लोगों के अमीर होने के साथ ही उन सामानों की कीमत में भी इजाफा होगा जिसके लिए मानवीय श्रम की दरकार है। क्योंकि लोग ज्यादा समृद्ध हैं कहने का दूसरा मतलब तो यही है कि मानवीय श्रम ज्यादा कीमती हो गया है।

इन समूची बातों का यही निष्कर्ष है कि हमारी आर्थिक स्थिति जितनी बेहतर होगी, हम ऐसे सामानों के उपभोग पर ज्यादा खर्च करके ध्यान देने लगेंगे, जो आर्थिक और प्रौद्योगिकीय पर कम निर्भर हैं।

आवास एक रोचक मामला है क्योंकि यह बेहतर प्रौद्योगिकी से बनाया जा सकने वाला भौतिक सामान है और उत्पादकता के लाभ से असंबद्ध स्थान विशेष से जुड़ा हुआ भी है। कल्पना कीजिए कि लोग जब किसी मकान को महंगा कहते हैं तो उनका क्या आशय होता है। वे आमतौर पर भौतिक आकार-प्रकार के महंगे होने की बात नहीं करते। सैनफ्रांसिस्को या न्यूयॉर्क के अच्छे इलाके में तीन बेडरुम का मकान, निश्चित तौर पर ग्रामीण इडाहो या टेनेसी में मौजूद इतने ही बड़े घर से महंगा होगा। इस प्रकार मकान महंगे हैं क्योंकि कुछ स्थानों पर मकान की जबर्दस्त मांग है। कुछ स्थानों को लेकर दीवानगी मिथ्या भरी हो सकती है। कुछ स्थान प्रतिष्ठा का विषय हो सकते हैं। लेकिन अधिकतर मामलों में कीमत का निर्धारण इस बात से होता है दूसरे लोग क्या चाहते हैं। आमतौर पर लोग वहां ज्यादा रहना चाहते हैं, जहां नौकरियां ज्यादा हों। साथ ही आप ऐसा पड़ौस चाहते हैं जो आपके मान्य सामाजिक प्रवृत्तियों और उपयुक्त आय स्तर से मेल खाता हो। क्या स्थानीय स्कूली प्रणाली अच्छी है? यह स्कूल में मौजूद सुविधाओं, साधनों से ज्यादा इस बात पर निर्भर करता है कि वहां के विद्यार्थी कैसे हैं। सुविधा और साधन ज्यादा महत्वपूर्ण नहीं है, क्योंकि ये तो हर अच्छी स्कूल में मौजूद रहेंगे। लेकिन अच्छे घरों से आने वाले समृद्ध बच्चे, कई रोगों से ग्रस्त कम आय वाले घरों के बच्चे बेहतर विद्यार्थी साबित होते हैं। एक अच्छे मकान के लिए ज्यादा पैसा देने वाले को कम आय वाले इलाकों से आए उत्साहहीन विद्यार्थियों वाली स्कूल आकर्षित नहीं करेगी।

ये खपत के अंतर हैं। लेकिन अभौतिक (non-material) असमानता की समस्या भुगतान योजना में भी दिखाई देंगी। शीर्ष स्थान पर वेतन में बढ़ती असमानता का कारण कुछ हद तक कंपनी के प्रमुख को स्थान संबंधी या अन्य अभौतिक सुविधाओं में कमी का प्रशंसनीय लक्ष्य है। प्रबंधन द्वारा दी जाने वाली एक सुविधा में पिछले कुछ अर्से में भारी कमी आई है, कार्यकाल को लेकर सुरक्षा और प्रतिस्पर्धा से आजादी। पहले के वक्त में या कम खुली अर्थव्यवस्थाओं में, आज के प्रमुख विकसित देशों की तुलना में महत्वपूर्ण कंपनियों और राजनीतिक नौकरशाही तक पहुंच ज्यादा प्रतिबंधित थी। प्रतिस्पर्धा को सीमित करने की क्षमता का संबंध मातहत काम करने वालों से आय में ज्यादा अंतर और कंपनी के फंड के निजी खर्चों के लिए ज्यादा इस्तेमाल से भी था। अर्थशास्त्री जॉन हिक्स ने कहा था कि सभी एकाधिकार लाभों में सर्वश्रेष्ठ एक शांत जीवन है। एकाधिकारों में कमी और सुरक्षित स्थानों को बढ़ते खतरे के साथ ही कंपनियों के पास अब सर्वश्रेष्ठ कर्मचारियों को उत्साहित करने के लिए देने को ज्यादा से ज्यादा धन है। वे सर्वश्रेष्ठ कर्मचारी जिनके लिए पहले की तुलना में न केवल नौकरी बल्कि आवास और नागरिकता बदलना तक ज्यादा आसान है। रोजगार और स्थान को लेकर जितनी ज्यादा सामाजिक रुकावटें होंगी, आधिकारिक मौद्रिक भुगतान उतने ही कम होंगे। कामकाज के स्थान पर सामाजिक समानता पर जितना ज्यादा जोर होगा-या कम से कम दिखावा-संभ्रांत लोग आर्थिक लिहाज से ज्यादा मुआवजा मांगेंगे। ज्यादा सुरक्षित और लंबी अवधि की नौकरियों में -बाकी सभी बातों में जब समानता हो-अस्थायी और जोखिम भरे कामों की तुलना में कम ही वेतन होगा।

ये स्थान को लेकर जंग के अच्छे और अनपेक्षित परिणाम हैं। क्योंकि लोगों के समृद्ध होते जाने के साथ ही स्थान संबंधी और अन्य स्थिर सामान हासिल करना ज्यादा मुश्किल हो जाता है। जो लोग प्रतिष्ठा को लेकर कुछ ज्यादा ही संवेदनशील हैं उन्हें ये उत्पाद हासिल करने के लिए ज्यादा काम करना होगा, जो अंततः हम सभी के लिए फायदे का सौदा होगा। अपनी पसंदीदा जगह पर मकान खरीदने या अपनी पसंद का ताजातरीन खिलौना पाने के लिए ज्यादा घंटे काम करना होगा। ये सभी आय पर स्वैच्छिक प्रगामी कर (voluntary progressive tax) की तरह काम करता है। खासतौर पर बाद वाले मामले में-वे लोग जिन्होंने उस वक्त फ्लैट स्क्रीन टीवी सेट खरीदने के लिए जी-तोड़ मेहनत की जब वे कम थे और 10 हजार डॉलर में मिलते थे, हमारे लिए इसी तरह के और पहले की तुलना में दस गुना तक सस्ते सेट मुहैया कराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

इसके विपरीत, स्थान को लेकर प्रतिस्पर्धा को सीमित कर दिए जाने से प्रतिष्ठा की लड़ाई को एक नया ही आयाम मिल जाता है, जो हर आम आदमी की पहुंच से काफी दूर हो जाता है। कल्पना कीजिए सोवियत संघ जैसे देशों में, जहां मुद्रा और बाजार की भूमिका का आधिकारिक तौर पर दमन किया गया, सरकार से संबंधों और 'सामाजिक तौर पर मान्य' पेशों के लिए प्रतिस्पर्धा गलाकाट हो गई। चेस मास्टर या बैले डांसर बनने की होड़ लग गई, क्योंकि ये पेशे ख्याति के साथ-साथ बेहद प्रतिबंधित सामान जैसे विशेष आयात की राह को भी आसान बना देते थे।

शायद अन्य टिप्पणीकारों द्वारा उठाए जाने वाले मुद्दों में कुछ असमान तौर पर वितरित असमानताओं का जिक्र-जैसे रंग-रुप, बुद्धिमानी, योग्यता और व्यक्तित्व-शायद उतनी सामाजिक ईर्ष्या या निंदा, अपयश (opprobrium) का कारण न बने, जितना कि कड़ी मेहनत या घाघ तरीकों से आय या संपत्ति में आने वाला अंतर। ये अंतर डॉलर की आय में नापी गई असमानता जितने ही या उससे ज्यादा बड़े हैं, लेकिन फिर भी इनका कोई जिक्र नहीं होता और असमानता पर बहस में इन पर कोई खास ध्यान भी नहीं देता। कुछ मर्तबा आय में ये अंतर अक्षय निधि (endowment) का ही परिणाम है। यह बिरला ही है कि नीतियां सीधे उन्हीं लोगों पर कर थोपने के लिए बनाई जाती हैं जिनके साथ कुदरत ने अन्याय किया है। उन लोगों की तुलना में जिन्होंने अपनी लाभ की स्थिति से पुख्ता नगदी जमा कर ली है।

लेकिन मुझे उपलब्ध सीमित जगह में मैं अपने मुख्य बिंदू को दोहराने पर आमादा हूं। भौतिक असमानता पर किसी की सोच चाहे जो हो, यह तय है कि हम विकास के जरिये ज्यादा लोगों को उपलब्धता दिलाने में जितना ज्यादा कामयाब होंगे, हमारा ध्यान उन मामलों में ऐसे अंतरों या खुद को अलग साबित करने पर होगा जो बदलना मुश्किल हो या जिसमें बराबरी हासिल नहीं की जा सकती हो। जो अंततः और अधिक हताशा का कारण बनता है, क्योंकि हम इन असमानताओं के भौतिक अर्थ को ही इसमें निहित अंतर मान लेते हैं।

 


जॉन वी.सी. नेय ने मर्केटस सेंटर में राजनीतिक अर्थशास्त्र में फ्रेडरिक बास्तियात चेयर पर विराजमान हैं और जॉर्ज मेसन यूनिवर्सिटी में अर्थशास्त्र के प्रोफेसर हैं। वे यूरोप के आर्थिक इतिहास और नये संस्थानों के अर्थशास्त्र के विशेषज्ञ हैं। उन्होंने फ्रांस में फर्म के आकार से लेकर ब्रिटिश फिस्कल स्टेट और चैंपियनशिप चेस, जनसांख्यिकी, अंधविश्वास में सोवियत षड़यंत्र, विकासशील देशों के सुधार कार्यक्रमों की समस्याओं तक का गहराई से अध्ययन किया है। वह वार, वाइन एंड टेक्सेसः द पॉलिटिकल इकानॉमी ऑफ एंग्लो फ्रेंच ट्रेड 1869-1900 (प्रिंसटन, 2007) के लेखक और जॉन ड्रोबाक के फ्रंटियर्स इन द न्यू इंस्टीट्यूशनल इकानॉमिक्स (अकादमिक प्रेस, 1997) के सह-लेखक हैं। उन्होंने नॉर्थवेस्टर्न यूनिवर्सिटी से अर्थशास्त्र में एम.ए. और पी.एचडी. की और केलटेक से भौतिक शास्त्र में बी.एस. किया था।