कश्मीर और अरुंधती की राय

मशहूर लेखिका और बुकर प्राइज़ विजेता अरुंधती रॉय का हाल ही में श्रीनगर में कश्मीर के ऊपर दिया हुआ बयान काफी विवादस्पद साबित हुआ. नाराज़ लोगों नें उन्हें देशद्रोह के अपराध में दण्डित करने की पुरजोर वकालत की. अरुंधती का विवादों में पड़ना कोई नयी बात नहीं है. देश से जुडे कई संवेदनशील मुद्दों पर अपने क्रन्तिकारी विचारों को प्रगट कर वो पहले भी घेरे में आ चुकी हैं.

ताज़ा विवाद में उन्होंने श्रीनगर में आयोजित कश्मीर की आज़ादी सम्बन्धी एक सेमिनार में कहा कि "कश्मीर कभी भी भारत का अभिन्न हिस्सा नहीं रहा. ये एक ऐतिहासिक तथ्य है. यहाँ तक कि भारत सरकार ने भी इस बात को माना है". भारतीय सेना और देश में फैले कारपोरेटवाद कि भी उन्होने निंदा की. भारत कि अस्मिता से जुडे कश्मीर मुद्दे पर ऐसी विवादास्पद टिप्पणी करने के बाद अरुंधती को काफी भर्त्सना का सामना करना पड़ा और बाद में उन्होने अपना पक्ष रखते हुए एक बयान भी जारी किया.

हालांकि ये सही है कि भारतीय प्रजातांत्रिक व्यवस्था में हर किसी को अभिव्यक्ति कि स्वतंत्रता का अधिकार है और अरुंधती ने जो कहा वो उन का व्यक्तिगत मत था. पर किसी का भी ये कहना की कश्मीर भारत का हिस्सा नहीं रहा है, सर्वथा गलत बात है. सिर्फ इसलिए कि कश्मीर 'disputed’ (विवादित) क्षेत्र है, इस का मतलब यह नहीं है की भारत का अधिकार वहाँ से कम हो जाता है. अभी तक किसी भी सत्य का फैसला नहीं हुआ है. कश्मीर एक ऐतिहासिक समस्या है और इस का निराकरण एक जटिल प्रक्रिया है. पर बिना सोचे समझे भारत को दोषी ठहराना और वो भी एक भारतीय द्वारा कुछ पचता नहीं है.

लेकिन अगर हम अरुंधती के बयान पर उन्हे कटघरे में लेकर कोई सजा देते हैं, तो वो भी हमें शोभा नहीं देगा. वैसे भी देशद्रोह (sedition) सरीखे आरोप पहले के ज़माने में ज्यादा मायने रखते थे. आज देश के सामने उतनी बड़ी समस्याएं नहीं हैं जिनके चलते हमें देश टूटने का खतरा हो. सय्यद अली शाह गिलानी और अरुंधती रॉय जैसे लोग जितना चाहे बोल लें पर जो तथ्य अपनी जगह कायम हैं, वो वही रहेंगे. भारत की अखंडता आज एक निर्विवाद सत्य है और उसे अपनी सहिष्णुता का परिचय देते हुए अरुंधती को सज़ा से दूर रखना चाहिए वरना हम पर तालिबानीकरण का आरोप लग सकता है.

कश्मीर में भारतीय सेना विशेष पॉवर एक्ट के खिलाफ भी काफी समय से बातें चल रही हैं. कश्मीर में आतंकवाद के खिलाफ सेना की भूमिका नकारी नहीं जा सकती पर यदि आज के परिपेक्ष्य में देखें तो हम वहाँ सेना के बिना भी काम चला सकते हैं. जिस तरह और राज्यों में, वहाँ की पुलिस कानून व्यवस्था की देखभाल करती है, उसी तरह कश्मीर में भी पुलिस को ये ज़िम्मेदारी सौपी जा सकती है. सरकार को चाहिए कि कश्मीर में सेना की मौजूदगी धीमे धीमे कम कर के स्थानीय पुलिस को वहाँ तैनात करे. इस से कश्मीर वासियों को भी दिलासा मिलेगा और अलगाववादी ताकतें भी ढीली पड़ेंगी. साथ ही साथ वहाँ लोकल बिजनेस और पर्यटन को भी बढ़ाने के उपाय ढूँढने चाहियें. कश्मीर में एक समय पर फलता फूलता पर्यटन उद्योग था. बदली परिस्थितियों में कश्मीर से पर्यटन के साथ और भी रोज़गार के साधन घटने लगे. आज समय है कि 'कांफिडेंस बिल्डिंग मेज़र' (विश्वास दिलाने वाले कदम) ला कर हम एक सामान्य कश्मीर वासी की रोज़मर्रा की ज़िन्दगी में सुधार लायें. चूंकि आर्थिक विकास के बिना कश्मीर में शांति की बहाली असंभव है.

- स्निग्धा द्विवेदी