असंगठित क्षेत्र की सामाजिक सुरक्षा

    नये कानूनों के निर्माण की खातिर संसद में विचार हेतु जिन विधेयकों को लाए जाने की कोशिश की जा रही है, उनमें से एक असंगठित क्षेत्र मजदूर विधेयक भी है। इस विधेयक की रूपरेखा असंगठित मजदूरों को सामाजिक सुरक्षा उपलब्ध कराने के उद्देश्य से तैयार की गई है। अभी तक मजदूरों के कल्याण के लिए जो कानून अस्तित्व में हैं, वह काफी नहीं है। उनकी परिधि में सामान्यत: संगठित क्षेत्र के मजदूर ही आ पाते हैं, परिणामस्वरूप असंगठित क्षेत्र के मजदूरों को इसका कोई फायदा नहीं मिल पाता है। दूसरे श्रम आयोग की रिपोर्ट के अनुसार जो भी मजदूर वर्तमान सामाजिक सुरक्षा कानूनों (जैसे ई.एस.आई.एस., प्रोविडेंट फंड, ग्रैच्यूटी व मातृत्व लाभ, आदि) से वंचित हैं, उन्हें असंगठित क्षेत्र का मानना चाहिए। असंगठित क्षेत्र मजदूरों की राष्ट्रीय अभियान समिति के अनुसार इस समय देश में असंगठित मजदूरों की कुल संख्या लगभग 37 करोड़ है, जो कुल मजदूरों की संख्या का 93 प्रतिशत है। देश के सर्वाधिक दीन-हीन व गरीब-गुरबे लोग इसी वर्ग से आते हैं। ये सकल घरेलू उत्पाद में 65 प्रतिशत का योगदान करते हैं तथा राष्ट्रीय बचत में इनका योगदान 45 प्रतिशत है।
    संख्या के लिहाज से यह वर्ग एक बहुत बड़ा वोट बैंक है। इसलिए यह बड़े आश्चर्य की बात है कि इनकी सामाजिक सुरक्षा के लिए देश में अब तक कोई कानून नहीं है। मजदूरों की सामाजिक सुरक्षा के लिए पहले से बने कानून सिर्फ संगठित क्षेत्र के मजदूरों पर लागू होते हैं। यद्यपि असंगठित क्षेत्र की कुछ श्रेणियों के लिए कुछ कानून देश के अलग-अलग हिस्सों में पहले से मौजूद हैं, जैसे महाराष्ट्र का मथारी वर्कर्स कानून, डॉक वर्कर्स कानून, रोजगार गारंटी कानून, तमिलनाडु सोशल सेक्यूरिटी कानून, 1996 में बना केंद्रीय निर्माण मजदूर कानून आदि। पर ये कानून असंगठित क्षेत्र के अधिकांश मजदूरों को सुरक्षा देने के लिए पर्याप्त नहीं हैं। 'कल्याण कोश व कल्याण बोर्ड' की स्कीमें असंगठित क्षेत्र की कुछ श्रेणियों तक व कुछ राज्यों तक ही सीमित हैं। परिणामस्वरूप अधिकतर असंगठित मजदूर इन कानूनी प्रावधानों तथा अन्य विभिन्न योजनाओं का फायदा नहीं उठा पाते हैं।
    मजदूरों की सुरक्षा के बारे में श्रम आयोग ने कहा कि इसका अर्थ है रोजगार की सुरक्षा, न्यूनतम या न्यायसंगत मजदूरी तय करना, इसकी जानकारी मजदूरों तक पहुंचाना, किसी अवैध कटौती के बिना मजदूरों को इसकी उपलब्धि सुनिश्चित करना और कार्यस्थल पर ऐसी व्यवस्था स्थापित करना जिससे न्यूनतम मजदूरी और कार्य स्थितियों संबंधी कानून क्रियान्वित हो सके। मजदूरों की भलाई या सुरक्षा के कार्य में चिकित्सा सेवाएं, चोट लगने पर मुआवजा, बीमा, प्रोविडेंट फंड, पेंशन लाभ भी शामिल हैं।
    असंगठित मजदूरों के क्षेत्र में विविध तरह के कार्य और व्यवसाय होने के कारण उनकी सुरक्षा के लिए कोई एक छातानुमा कानून बनाना सरल कार्य नहीं है। इनमें से कुछ महत्तवपूर्ण कार्य निम्न हैं— कृषि मजदूर, वन मजदूर, मछली कामगार, रिक्शा चालक, रेहड़ी पटरी पर सामान बेचने वाले, अपने घर में तरह-तरह के काम करने वाले मजदूर या कारीगर, दूसरों के घर में काम कर रहे घरेलू कामगार, निर्माण मजदूर, सफाईकर्मी, कूड़ा बीनने वाले, दुकानों व व्यापार स्थलों में काम करने वाले मजदूर आदि। इन विविध तरह के कार्यों के लिए एक कानून से सुरक्षा देने में कठिनाई तो है, पर इसके बावजूद इन सब कार्यों के लिए कम से कम कुछ सुरक्षा देने वाला एक छातानुमा कानून बनाना आवश्यक है। यदि ऐसा कानून नहीं होगा, तो फिर बहुत से विविध कार्यों के लिए अलग-अलग कानून बनाने होंगे, जिसमें काफी लंबा समय लग जाएगा।
    श्रम मंत्रालय की विभिन्न रिपोर्टों मजदूरों को सुरक्षा देने के लिए एक समग्र कानून बनाने की बात उठाती रही हैं। अंतत: दूसरे श्रम आयोग को यह जिम्मेदारी सौंपी गई कि वह असंगठित मजदूरों के लिए छातानुमा कानून का प्रारूप तैयार करे।
    श्रम आयोग के अनुसार असंगठित क्षेत्र के लिए बनाए जाने वाले कानून के उद्देश्यों में मजदूरों के लिए पहचान पत्र, न्यूनतम आर्थिक सुरक्षा, न्यूनतम सामाजिक सुरक्षा, गरीबी दूर करने में मदद करना, बाल मजदूरी समाप्त करना और बच्चों का बेहतर भविष्य बनाना, मजदूरों के सदस्य आधारित संगठन बनाने को प्रोत्साहन तथा निर्णय प्रक्रिया में असंगठित मजदूरों के संगठन के माध्यम से मजदूरों का प्रतिनिधित्व सुनिश्चित होना चाहिए।
    श्रम आयोग ने स्वास्थ्य सेवा, मातृत्व सुरक्षा और छोटे बच्चों की देख-रेख, प्रोविडेंट फंड का लाभ, परिवार संबंधी लाभ, आवास, पेयजल व सफाई स्थितियों संबंधी लाभ, रोजगार के दौरान लगी चोट के मुआवजे संबंधी लाभ, अवकाश प्राप्ति व इसके बाद के लाभ (ग्रेच्यूटी, पेंशन, परिवार की पेंशन), आय अर्जन की समाप्ति या आय अर्जन की क्षमता न रहने की स्थिति में कुछ सुरक्षा, मजदूरों की शिक्षा व कुशलता बढ़ाने की स्कीमें, बाल मजदूरी हटाने की स्कीमें, बंधक मजदूरी हटाने की स्कीम व अन्यायपूर्ण श्रम संबंध हटाने के प्रयास जैसे मुद्दों को असंगठित मजदूरों की सामाजिक स्थिति में शामिल करने की सिफारिश की है।
    असंगठित मजदूर विषय से संबंधित अनेक व्यक्तियों से विचार-विमर्श और इस विषय पर गठित एक अध्ययन दल के सुझावों पर सोच-विचार के बाद राष्ट्रीय श्रम आयोग ने असंगठित मजदूरों के लिए छतरीनुमा कानून का प्रारूप सुझाया है, तथा अपनी रिपोर्ट में इस कानून के अनेक प्रावधानों की सिफारिश की है।
    राष्ट्रीय श्रम आयोग की रिपोर्ट जारी होने के बाद केन्द्रीय श्रम मंत्रालय ने नवंबर 2002 में असंगठित क्षेत्र के मजदूरों पर एक राष्ट्रीय सेमिनार आयोजित किया। इस सेमिनार ने कानूनी पक्षों पर एक तकनीकी दल नियुक्त किया। तकनीकी दल के सुझावों में कहा गया है कि कृषि मजदूरों और असंगठित क्षेत्र के मजदूरों के लिए कानून बनाते वक्त रोजगार नियमन, जहां भी संभव हो न्यूनतम आय की गारंटी व विभिन्न स्कीमों को तैयार करने व लागू करने में मजदूरों की भागीदारी पर विशेष ध्यान देना चाहिए। केन्द्र सरकार की भूमिका नेतृत्व व समन्वय की है। सामान्यत: स्कीम राज्य व केन्द्रशासित क्षेत्र के स्तर पर कार्यान्वित होनी चाहिए। आर्थिक संसाधन जुटाने में, इनके वितरण में, विभिन्न राज्य बोर्डों के माध्यम से इनका ऑडिट करवाने में केन्द्रीय सरकार की महत्तवपूर्ण भूमिका है। न्यूनतम मजदूरी की व्यवस्था कानून में होनी चाहिए। राष्ट्रीय स्तर पर एक न्यूनतम मजदूरी तय होनी चाहिए ताकि किसी भी राज्य की न्यूनतम मजदूरी इससे नीचे नहीं जा सके।
    तकनीकी दल ने कहा कि यह कानून पहले से मौजूद अन्य कानूनों जैसे कि ट्रेड यूनियन अधिनियम, मजदूरों के मुआवजे का अधिनियम, समान पारिश्रमिक अधिनियम इत्यादि के साथ लागू होगा। अत: इन कानूनों में जो प्रावधान पहले से मौजूद हैं, उन्हें नए प्रस्तावित कानून में दोहराने की जरूरत नहीं है। साथ ही सामाजिक सुरक्षा विशेषकर स्वास्थ्य, मातृत्व लाभ, अपंगता व वृद्धावस्था के लाभ के लिए सार्वजनिक सहायता की आवश्यकता हो तो वह भी उपलब्ध होनी चाहिए। ई.एस.आइ. व प्रोविडेंट फंड की वर्तमान स्कीमों का विस्तार असंगठित क्षेत्र तक होना चाहिए। स्वरोजगार में लगे व्यक्तियों के लिए अन्य तरह की व्यवस्था करनी होगी। असंगठित क्षेत्र कुल श्रम शक्ति का एक बड़ा हिस्सा है, अत: केन्द्र व राज्य सरकारों की आय के एक निश्चित हिस्से को इन मजदूरों की सामाजिक सुरक्षा के लिए उपलब्ध करवाना आवश्यक है। एक ऐसी व्यवस्था स्थापित करनी होगी, जिसमें मजदूरों के भुगतान निश्चित तौर पर हो जाएं पर रोजगारदाताओं के लिए बहुत से फार्म, रजिस्टर, आदि औपचारिकताओं का बोझ न बढ़े।
    राजग सरकार के दिनों में केन्द्रीय श्रम मंत्रालय ने असंगठित क्षेत्र मजदूर के लिए कानून के कई ड्राफ्ट विचार हेतु जारी किए थे। पर मजदूर संगठनों को इनमें कई महत्वपूर्ण कमियां नजर आ रहीं थीं। इन वजहों से असंगठित मजदूरों की मांगों को असरदार व सुनियोजित ढंग से आगे बढ़ाने के लिए कई सामाजिक कार्यकर्ताओं, श्रम संगठनों के कार्यकर्ताओं और कानूनविदों ने एक नई समिति बनाई—-असंगठित क्षेत्र के मजदूरों की राष्ट्रीय अभियान समिति। इससे विभिन्न असंगठित मजदूरों के प्रतिनिधियों को एक सामान्य मंच मिला। इस समिति की मांगों में है- रोजगार एवं वेतन का नियमितीकरण, सामाजिक सुरक्षा- ई.एस.आइ., पी.एफ.सी. पेंशन, प्राकृतिक संसाधनों पर अधिकार, यौन हिंसा पर शिकायत कमेटी, न्यूनतम मजदूरी स्तर। समिति के अनुसार असंगठित क्षेत्र के मजदूर सकल घरेलू उत्पाद (जी.डी.पी.) का 65 प्रतिशत योगदान करते हैं। अत: कम-से-कम 3 प्रतिशत राज्य और केन्द्रीय राजस्व उनकी सामाजिक सुरक्षा के लिए निर्धारित किया जाए। असंगठित क्षेत्र के मजदूरों की भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए ऊपर से नीचे तक बोर्ड के त्रिपक्षीय ढांचे की व्यवस्था की जाए। जो भी बोर्ड बनाए जाएं, उनमें हर स्तर पर महिलाओं का कम से कम एक तिहाई प्रतिनिधित्व होना चाहिए। इस तरह समिति के कई सुझाव हैं।
    यहाँ यह ध्यान रखना होगा कि असंगठित क्षेत्र की कुछ श्रेणियों के मजदूरों के लिए कुछ कानून पहले से मौजूद हैं। अत: नये कानून में यह प्रावधान होना चाहिए कि जहां पहले से इस कानून से बेहतर लाभ मजदूरों को मिले हुए हैं, उन्हें जारी रहना चाहिए। कुछ विशेषज्ञों का विचार है कि कृषि मजदूरों के लिए अलग कानून बनना चाहिए। यदि यह सुझाव मान लिया गया, तो दो कानूनों की जरूरत होगी।
    इधर 23 नवंबर 2005 को भारतीय सामाजिक संस्थान में असंगठित मजदूरों की राष्ट्रीय अभियान समिति के द्वारा आयोजित सेमिनार में देश के विभिन्न भागों से विभिन्न संगठनों से आए प्रतिनिधियों ने इस संबंध में आंदोलन को आगे बढ़ाने के लिए अनेक सुझाव रखे। असंगठित क्षेत्र में 32 सालों से काम कर रही संस्था सेवा की प्रतिनिधि शालिनी ने कहा कि काम का अधिकार और सामाजिक सुरक्षा दो अलग मुद्दा है। दोनों को साथ लेकर नहीं चल सकते। काम के अधिकार के चक्कर में सामाजिक सुरक्षा भी नहीं ले पाएंगे। हमें सामाजिक सुरक्षा पर अपना ध्यान केंद्रित करना चाहिए। गाँवों से पलायन कर शहरों में आए मजदूरों को विशिष्ट पहचान संख्या उन्हें सामाजिक सुरक्षा हासिल कर पाने में काफी मदद करेगी। सिस्टर सिसिलिया ने सुझाव दिया कि महिलाओं के लिए पेंशन की उम्र 40 वर्ष होनी चाहिए। तथा न्यूनतम मजदूरी को जीविका मजदूरी (लिविंग वेज) कहा जाना चाहिए। अशोक अग्रवाल ने कहा कि अभी सरकार को इम्यूनिटी दी गई है, पर कहीं कोई एकाउंटेबिलिटी नहीं है। विधेयक के अंदर अधिकारियों को जवाबदेह बनाने की व्यवस्था हो और जवाबदेही पूरी न करने पर सजा का स्पष्ट प्रावधान हो।
    यहाँ गौर करने की बात यह है कि एक ओर इंस्पेक्टर राज खत्म करने, अनावश्यक नियमों को समाप्त करने जैसे कदम उठाने की बात की जा रही है। वहाँ असंगठित मजदूरों के लिए नये नियम बनाने की बात करना कितना तर्कसंगत है? 1991 के आर्थिक उदारीकरण से कई क्षेत्रों को काफी लाभ हुआ और फलत: इसी नीति को आगे बढ़ाते हुए नित नये-नये क्षेत्रों को नियमों के बंधन से खोलने की प्रक्रिया जारी है।
    ऐसे में गरीबों को जीविका प्रदान करने वाले रोजगारों को नियम-कानूनों से बांधकर क्या हम गरीबों के लिए और मुसीबत खड़ी करने नहीं जा रहे हैं? इसलिए असंगठित क्षेत्र के लिए कानून बनाते वक्त इतना ध्यान जरूर रखा जाना चाहिए कि नया कानून भ्रष्टाचार और गरीबों के शोषण का औजार न बन जाए। उम्मीद की जानी चाहिए कि सभी पक्ष जल्द ही एक सर्वसम्मत निष्कर्ष पर पहुँचेंगे और गरीबों का तकदीर बदल सके ऐसा एक ठोस विधेयक लेकर आएंगे।

इकोनॉमी इंडिया (नवंबर, 2005)
संजय कुमार साह