क्या नये कृषि विधेयक संघवाद के खिलाफ हैं?

भारत में संघवाद के स्वरुप को लेकर अकसर बहस होती रहती है। संघवाद का मतलब एक ऐसी राजनीतिक व्यवस्था से है जहां केंद्र और राज्यों के बीच शक्तियों का स्पष्ट सीमांकन और बंटवारा किया गया है। जहां भारत में संघवाद की कुछ विशेषताएं हैं, इसमें कुछ एकात्मक गुण  भी हैं। भारत में संघवाद को लेकर हमेशा से ही बहस होती रही है। नवीनतम बहस हाल में कानून का रुप लेने वाले कृषि अधिनियमों से जुड़ी है।

देश की संसद ने हाल में तीन कृषि अधिनियम पारित किए। कृषक उपज व्‍यापार और वाणिज्‍य (संवर्धन और सरलीकरण) अधिनियम, 2020 कृषि उपज बाजार समिति (एपीएमसी) के परिसरों के बाहर कृषि व्यापार की मंजूरी देता है। कृषक (सशक्‍तिकरण व संरक्षण) क़ीमत आश्‍वासन और कृषि सेवा पर क़रार अधिनियम, 2020 अनुबंधित कृषि के लिए एक संरचना का निर्माण करता है। आवश्यक वस्तु (संशोधन) अधिनियम, 2020 मूल अधिनियम में उल्लेखित आवश्यक वस्तुओं की सूची से कुछ वस्तुओं को हटाता है और सरकार के हस्तक्षेप को सीमित करता है।

इन अधिनियमों को लेकर मिली-जुली प्रतिक्रियाएं आयी हैं। जहां कुछ ने कृषि उद्योग के उदारीकरण की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम बताते हुए इनका स्वागत किया है, कई कारणों के इनका विरोध भी हुआ है, जैसे कि किसानों को बाजारों की अनिश्चितता के हवाले छोड़ना। लेखकों और विद्वानों ने यह कहते हुए इसकी आलोचना की है कि ये विधेयक संघवाद के सिद्धांत के खिलाफ हैं।

हालांकि भारतीय संविधान व्यापक रुप से एकात्मक है और केंद्र सरकार को ज्यादातर शक्तियां देता है, संविधान निर्माताओं ने सहयोग करने वाले संघवाद की परिकल्पना की थी। भारतीय संविधान ने राज्य सरकारों और केंद्र सरकार की शक्तियों के सीमांकन के लिए राज्य सूची, संघ सूची और समवर्ती सूची का निर्माण किया। कृषि और कृषि बाजार राज्य विषय हैं और केंद्र इन क्षेत्रों को नियंत्रित करने वाले ये कानून नहीं बना सकता। लेकिन केंद्र की दलील है कि ये विधेयक व्यापार और वाणिज्य से संबंधित हैं जो समवर्ती सूची का हिस्सा हैं और संसद के दायरे में आते हैं।

सैद्धांतिक तौर पर संघवाद सहायक कार्य के सिद्धांत के आधार पर शक्तियों के विकेंद्रीकरण की वकालत करता है। इसका साफ तौर पर यह मतलब है कि नीति निर्माण की शक्तियां जितना संभव हो, उतने निचले स्तर पर होनी चाहिए। कृषक उपज व्‍यापार और वाणिज्‍य (संवर्धन और सरलीकरण) विधेयक, 2020 और कृषक (सशक्‍तिकरण व संरक्षण) क़ीमत आश्‍वासन और कृषि सेवा पर क़रार विधेयक, 2020 किसानों और खरीदारों को राज्य द्वारा विनियमित एपीएमसी के बाहर अनुबंध करने का अधिकार देते हैं। शक्तियों का हस्तांतरण सबसे निचले स्तर यानी कि लोगों के स्तर के लिए है और इससे संघवाद के सिद्धांत का उल्लंघन नहीं होता। आवश्यक वस्तु (संशोधन) अधिनियम, 2020 एक केंद्रीय विधेयक है, इसलिए संसद के पास इसमें संशोधन करने का अधिकार है। ये तीनों अधिनियम संविधान के अनुच्छेद 19 (1) (छ) के तहत व्यापार करने की स्वतंत्रता का मौलिक अधिकार सुनिश्चित करते हैं और इस तरह संसद को इन कानूनों का निर्माण करने का अधिकार मिलता है।

आवश्यक वस्तु (संशोधन) अधिनियम, 2020 में कहा गया है कि केंद्र इस अधिनियम के तहत अधिसूचित आवश्यक वस्तुओं के भंडारण की सीमा तय करने के लिए अपनी विवेकाधीन शक्तियों का अक्सर और बेतरतीब ढंग तरीके से इस्तेमाल नहीं कर सकता है। केंद्र सरकार का अपनी शक्ति का त्याग करना संघवाद के सिद्धांत के खिलाफ नहीं जाता।

हालांकि केंद्र सरकार ने जिस तरीके से इन विधेयकों को पहले अध्यादेशों के रुप में पेश किया और फिर संसद में पारित कराया, उससे कई सवाल उठते हैं। राज्यों के साथ विचार-विमर्श नहीं किया गया और विधेयकों पर संसद में विस्तृत चर्चा नहीं हुई। लोकतांत्रिक प्रक्रिया के पहलुओं का इस तरह से अनादर किया जाना, हमारे लिए चिंता का विषय होना चाहिए। हालांकि इन कानूनों में शामिल चीजों को लेकर लंबे समय से बहस चल रही है। ये कानून किसानों की आय दोगुनी करने से जुड़ी अशोक दलवई समिति, आर्थिक सर्वेक्षण रिपोर्ट और विभिन्न अर्थशास्त्रियों की सिफारिशों को आंशिक रुप से लागू करते हैं।

संघवाद की व्यक्तिपरक संरचना मौजूदा चर्चा को खत्म करने के लिहाज से इसे जटिल बनाती है। लेकिन इसे आसान बनाने के लिए हम कह सकते हैं कि संघवाद का सिद्धांत कहता है कि शक्ति सबसे निचले संभव प्राधिकरण के पास होनी चाहिए। ये विधेयक सरकार के नियंत्रण को कम करते हैं और किसानों के लिए विकल्प बढ़ाकर उन्हें सशक्त करते हुए अपना काम आसान करते हैं। इसके बाद हम यह कह सकते हैं कि ये कानून भारत की संघीय विशेषताओं को प्रभावित नहीं करते।

-  प्रशांत नारंग (लेखक थिंकटैंक सेंटर फॉर सिविल सोसायटी में एसोसियेट डायरेक्टर हैं)