ओसामा की मौत से अरब विद्रोह का हो सकता है अंत!

मैंने ओसामा बिन लादेन की मौत का जश्न नहीं मनाया। किसी विचार को खत्म करने से कहीं ज्यादा आसान है, किसी व्यक्ति को मार देना। ओसामा की मौत के बाद भी उसके जेहाद की विचारधारा जिंदा रहेगी।

वो 9/11 का मास्टरमाइंड था और जेहाद की दुनिया का सबसे बड़ा चेहरा बन चुका था। हालांकि लंबे वक्त से वो जेहादी गतिविधियों से सीधे तौर पर नहीं जुड़ा था, लेकिन इस बीच उसने अलकायदा के विरोधी मुस्लिमों की हत्या करवाने का घृणित काम किया था।

इस सबके बावजूद ओसामा एक नये तरह के जेहाद के प्रति लोगों का आकर्षण पैदा करने में कामयाब रहा। आत्मघाती हमला या आम लोगों की हत्या, दोनों इस्लाम की परंपरा में अपराध थे, लेकिन ये जेहाद के उन शानदार तरीकों में शरीक हो गए, जिनका इस्तेमाल इस्लाम के लक्ष्यों को हासिल करने में किया जाने लगा और जिसे जन्नत पहुंचने का जरिया बना दिया गया।

अमेरिका के दास-प्रथा विरोधी नेता जॉन ब्राउन ने 1859 में दासों के विद्रोह की अगुआई की थी और इसके लिए उन्हें फांसी की सजा दी गई थी। हालांकि दास प्रथा को खत्म करने के उनके विचार की विजय हुई। इससे प्रेरित होकर अमेरिका के गृह युद्ध में एक गीत चल पड़ा था, ‘‘जॉन ब्राउन का शरीर तो कब्र में रहेगा, लेकिन उनकी आत्मा का विस्तार होता रहेगा।’’ कुछ ऐसा ही ओसामा के साथ भी होगा।

ओसामा की मौत के बाद अमेरिका इस बात के लिए प्रोत्साहित होगा कि वो अफगानिस्तान से फौरन अपने सैनिक वापस बुला ले, तालिबान के साथ समझौता कर ले और अमेरिका की बजाय भारत के आतंकी खतरों को नजरंदाज करे। इससे अमेरिका के सुर में सुर मिलाने और भारत के खिलाफ आतंकवादियों का इस्तेमाल करने वाले पाकिस्तान की दोतरफा नीतियों को बल मिलेगा। इस तरह की दोतरफा नीतियों से पाकिस्तान के अंदर हिंसा का सबसे बुरा दौर आ सकता है, उदारवादी मुस्लिमों की जगह कट्टरपंथियों का दबदबा बढ़ सकता है। भारत में 26/11 जैसे और भी हमले हो सकते हैं, कश्मीर में हिंसा बढ़ सकती है और घरेलू जेहादी गुटों को बाहरी मदद में इजाफा हो सकता है। हमें कांधार अपहरण कांड की तरह की कुछ और घटनाओं का सामना करना पड़ सकता है।

इस खतरे से निजाद पाने के लिए आक्रामक हिन्दू चाहते हैं कि अमेरिका की तरह पाकिस्तान के आतंकी ठिकानों पर हमले किए जाएं। इन हमलों में 26/11 के मास्टरमाइंड लश्कर आतंकी हाफिज सईद जैसे लोगों का निशाना बनाया जा सकता है, लेकिन ये तरीका कारगर नहीं हो पाएगा। आप इजरायल द्वारा की गई हत्याओं की नाकामी से इसे भली भांति समझ सकते हैं। इजरायल राजनीतिक हत्याओं के मामले में दुनिया में नंबर वन है और आरएसएस उसकी खुलकर तारीफ करता है।

इजरायली सैन्य विश्लेषक रोनेन बर्गमैन, इस सिलसिले में 1992 की घटना का जिक्र करते हैं, जब इजरायल ने हिजबुल्ला के संस्थापक अब्बास मुसावी की हत्या कर दी थी। इससे हिजबुल्ला कमजोर होने की बजाय, गुस्से की आग में जलने लगा और ब्यूनस आयर्स में इजरायली दूतावास पर हमला कर इसका बदला लिया, जिसमें 29 लोग मारे गए थे। मुसावी के बाद कमान संभालने वाले हसन नसराल्ला ने ईरान से मिल रहे हथियारों के बल पर हिजबुल्ला का दायरा और बढ़ा लिया। इस ताकत के बल पर उसने 2006 में इजरायल के विरुद्ध अंतहीन जंग छेड़ दी। इजराइल ने लेबनान में काफी तबाही मचाई लेकिन आखिर उसे पीछे हटना पड़ा। इस तरह मुसावी के दौर से कहीं ज्यादा बुरा परिणाम इजरायल के हाथ लगा।

2004 में इजरायल ने हमास की कमर तोड़ने के इरादे से उसके नेता शेख अहमद यासिन की हत्या कर दी, लेकिन इसके उलट, हमास और ज्यादा मजूबत एवं आक्रामक हो गया। यासिन कट्टर सुन्नी था और शिया ईरान का प्रबल विरोधी था, लेकिन उसकी मौत के बाद हमास ने खुशी-खुशी ईरान के साथ हाथ मिला लिया और ईरान ने इजरायल की उम्मीदों के उलट हमास को जमकर हथियारों की आपूर्ति की। इसलिए भले ही भारत के सामने जेहादियों का खतरा बढ़ता जा रहा है, लेकिन इजरायल से सबक लें तो हत्या कोई हल नहीं है- ये दिखने में भले ही रोमांचक, लगे लेकिन अंततः ये आपके दुश्मन को ही मजबूत करता है। मूलभूत रूप से कट्टर इस्लाम को निष्प्रभावी करने का काम उदारवादी इस्लाम ही कर सकता है, कोई बाहरी शक्ती नहीं। हम इसे पसंद करें या नापसंद, हम इसका कोई सैन्य हल नहीं थोप सकते।

आशावादी इससे असहमत हो सकते हैं। उनका दावा है कि जेहाद की विचारधारा को काफी पहले अरब विद्रोह से शिकस्त मिल चुकी है। मिस्र, ट्यूनीशिया और लीबिया के धर्म निरपेक्ष स्वाधीनता आंदोलनों ने सांप्रदायिक ताकतों की जगह ले ली है। मुझे इस सच्चाई को कबूल करने में खुशी होगी लेकिन इतिहास इसकी तस्दीक नहीं करता।

कई उदारवादियों ने (मुझ सहित) 1979 में ईरान के विद्रोह की तारीफ की थी, जिसने शाह को गद्दी से उतार फेंका था। अफसोस कि इसका नतीजा लोकतंत्र की बजाय हत्यारे दमनकारी धार्मिक शासन के रूप में सामने आया।

1991 में अल्जीरिया में जब पहली बार स्वतंत्र चुनाव हुए तो उदारवादियों ने लोकतंत्र को लेकर नई उम्मीदें पाल लीं। लेकिन पहले दौर में एक इस्लामिक पार्टी चुनाव जीत गई। इसके बाद अमेरिकी मदद से लोकतंत्र की जगह सैन्य शासन को ही आगे जारी रखा गया। फिलस्तीन में चुनाव के बाद धर्मनिरपेक्ष पीएलओ को हराकर कट्टरपंथी इस्लामिक पार्टी हमास सत्ता में आ गई।

मध्य पूर्व एशिया में क्यों बार-बार इस्लामिक पार्टियां चुनाव जीतकर सत्ता में आ जाती हैं? क्योंकि स्थानीय तानाशाह धर्मनिरपेक्ष विरोधी समूहों को दबा सकते हैं, लेकिन मस्जिदों पर उनका कोई जोर नहीं चल पाता। इस तरह से मस्जिद स्वाभाविक रूप से प्रतिरोध के केंद्र बन जाते हैं। इस तरह जब लोगों को चुनाव का विकल्प मिलता है तब इस्लामिक पार्टियां (मुस्लिम भाईचारे की भावना के तहत) सबसे ज्यादा संगठित रूप से सामने आती हैं और उनकी जीत पक्की हो जाती है। मिस्र में मार्च महीने में संवैधानिक सुधारों के लिए हुए मत संग्रह में विरोधी नेता अल बरदेई (जो कि धर्मनिरपेक्ष पार्टियों के मजबूत होने तक चुनाव टालना चाहते थे) को इस्लामिक कट्टरपंथियों ने अपना मत डालने से भी रोकने की कोशिश की, इतना ही नहीं उन पर पत्थरबाजी भी की। इसमें उदारवादी लोकतंत्र का भविष्य दिखाई पड़ता है या इस्लामिक असहिष्णुता का ?

इससे ये भय पैदा होता है कि कहीं अरब विद्रोह के बाद कई देशों में कट्टरपंथी इस्लामिक शक्तियां ही सत्ता में न आ जाए। अगर मेरा ये अनुमान गलत साबित होता है तो मुझे अच्छा ही लगेगा। लेकिन मेरे मन में एक निराशावादी खयाल आ रहा है कि संभव है कि हमें एक बार फिर ब्रतोल्त ब्रेख्त की वो पंक्तियां ओसामा के लिए भी दोहरानी पड़ सकती, जो उन्होंने हिटलर के संदर्भ में कहीं थीं-

ओ मानवों, उसकी हार का जश्न मत मनाओ
इस दुनिया ने एकजुट होकर उस कमीने इंसान को समाप्त तो कर दिया है,
लेकिन वो व्यभिचारिणी, जिसने उसे जन्म दिया था, फिर से गर्भवती होने जा रही है

- स्वामीनाथन अय्यर

स्वामीनाथन अय्यर