'राजधर्म' और 'दंडनीति'

लोकपाल बिल कुछ और समय के लिए टल गया है और अन्ना हजारे की टीम ने एक और आंदोलन करने की बात कही है। लोकायुक्त के मसले और लोकपाल को कौन हटा सकता है, लोकपाल से सीबीआई का रिपोर्टिंग संबंध कैसा होगा, जैसे बिंदुओं पर अब भी राजनीतिक दलों में सामंजस्य नहीं है। लेकिन वास्तव में ये सभी बहसें अर्थहीन हैं। वास्तविक समस्या है न्याय प्रक्रिया में होने वाला विलंब। यदि सीबीआई पर लोकपाल का नियंत्रण हो, तब भी अदालतों पर तो उसका कोई नियंत्रण नहीं होगा। निचली अदालतों में अनेक कारणों और अनेक तरीकों से अदालती मामलों को लंबित किया जाता है। यह एक बड़ी समस्या है। जैसा कि एक पुरानी कहावत भी है : देरी से मिलने वाला न्याय अन्याय के समकक्ष ही होता है।

रोज अखबार खोलते ही हमारी नजर न्यायिक प्रक्रिया में अनावश्यक विलंब के अनेक उदाहरणों पर पड़ती है। मिसाल के तौर पर पूर्व दूरसंचार मंत्री सुखराम के विरुद्ध १६ वर्षों से केस चल रहा है। कुछ माह पूर्व उच्च न्यायालय ने उन्हें दोषी पाया, लेकिन अब वे सर्वोच्च न्यायालय में अपील कर सकते हैं। सुखराम ८५ वर्ष के हैं और उनकी तबियत ठीक नहीं रहती है। यह केस कितने समय तक और खिंच सकता है? एक और उदाहरण लेते हैं : बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री और इंदिरा गांधी के दाएं हाथ समझे जाने वाले एलएन मिश्रा की हत्या, जो वर्ष १९७५ में हुई थी। हत्या के आरोपी के विरुद्ध ३७ वर्षों से केस चल रहा है। हत्या के समय वह व्यक्ति २७ वर्ष का था, लेकिन अब वह ६४ वर्ष का हो चुका है और उसकी भी तबियत अब ठीक नहीं रहती है। अपनी बेगुनाही साबित करने के लिए उसने जिन ३९ प्रत्यक्षदर्शियों का हवाला दिया था, उनमें से ३१ की मृत्यु हो चुकी है और अब तक २२ विभिन्न न्यायाधीश उस मुकदमे की सुनवाई कर चुके हैं। यदि किसी मुख्यमंत्री की हत्या के मुकदमे की यह स्थिति है तो इस बात की क्या उम्मीद की जा सकती है कि आप और मुझ जैसे सामान्य व्यक्तियों को सही समय पर इंसाफ मिलेगा?

पुलिस व्यवस्था की अनियमितताओं के कारण स्थिति और जटिल हो जाती है। पिछले साल १५०० लोगों की जान पुलिस हिरासत में चली गई। पुलिस बर्बरता की खबरें आम हो चली हैं। वास्तव में राज्यों की पुलिस व्यवस्था धीरे-धीरे राजनीतिक नेतृत्व का औजार बनती जा रही है और उसका उपयोग अक्सर प्रतिद्वंद्वियों से हिसाब चुकता करने के लिए किया जाता है। सर्वोच्च अदालत के एक पूर्व मुख्य न्यायाधीश ने हाल ही में कहा कि हालांकि संविधान की धारा २१ के तहत नागरिकों के लिए त्वरित न्याय सुनिश्चित किया गया है, लेकिन व्यवहार में यह इस पर निर्भर करता है कि मुकदमा किस व्यक्ति से संबंधित है। प्रभावी व्यक्ति अपने हितों के अनुसार मामले का त्वरित निपटारा करवा सकता है या उसे लंबित करवा सकता है। न्यायिक प्रक्रिया में देरी के कारण हुआ अन्याय वास्तव में मानवीय भावनाओं के विपरीत है।

जब अर्थशास्त्री बिबेक देबरॉय ने अपनी एक रिपोर्ट के माध्यम से हमारे सामने आंकड़े रखे, तब जाकर हमें पता चला कि वास्तव में स्थिति कितनी विकट है। देबरॉय ने बताया कि वर्तमान में ढाई करोड़ से भी अधिक मामले अदालतों में लंबित हैं। यदि एक मामले का निराकरण होने में बीस साल लगते हैं तो इन सभी मामलों के निपटारे में ३२४ वर्ष लग जाएंगे। उन्होंने यह भी कहा कि ३५०० केंद्रीय कानूनों में से लगभग ५०० अप्रचलित हैं और उन्हें समाप्त कर दिया जाना चाहिए। यही स्थिति प्रादेशिक कानूनों के साथ भी है। देबरॉय की रिपोर्ट से देश को सबसे बड़ा धक्का यह लगा कि न्यायिक प्रक्रिया में विलंब के लिए सबसे अधिक दोषी तो सरकार ही है, जो हर निर्णय पर यांत्रिक रूप से अपील कर देती है। इसका असर व्यक्तिगत मुकदमों पर पड़ता है। समस्या की जड़ यह है कि मुकदमा चलाने का निर्णय निम्न प्रशासनिक स्तर पर लिया जाता है, जबकि उच्चतर स्तर पर उसके विरुद्ध निर्णय लिया जाता है। यदि इस प्रक्रिया को उलट दिया जाए तो शासकीय मुकदमों की संख्या फौरन घट जाएगी।

उस कानून का कोई औचित्य नहीं, जो राज्यसत्ता द्वारा प्रभावी नहीं है। यह राजधर्म का केंद्रीय दायित्व है। 'अर्थशास्त्र' के अनुसार हर समाज को व्यवस्था बनाए रखने और प्रजा की रक्षा के लिए एक सशक्त 'क्षत्र' या सत्ताधीश की आवश्यकता होती है। इसीलिए प्राचीनकाल में सम्राटों के लिए 'दंडनीति' का बड़ा महत्व हुआ करता था। 'महाभारत' के शांतिपर्व में भीष्म ने युधिष्ठिर को इसी की शिक्षा दी थी। 'दंड' इतना महत्वपूर्ण राजधर्म है कि उसकी परिकल्पना एक दैवी व्यवस्था के रूप मेंकी गई है, जिसकी उत्पत्ति ब्रह्मा से हुई थी। मनु ने भी कहा है कि यदि राजा दोषियों को दंडित करने में असमर्थ होगा तो शक्तिशाली लोग दुर्बलों का दोहन करने लगेंगे। 'नारदशास्त्र' में कहा गया है कि दंड का भय इसलिए आवश्यक है, क्योंकि इसी से मनुष्य धर्मपथ पर प्रवृत्त हो सकता है।

यह देखकर हैरानी होती है कि जिस दंडनीति को हमारे प्राचीन ग्रंथों में इतना महत्व दिया गया है, वही आज हमारी सबसे बड़ी कमजोरी बन गई है। गरीबों और कमजोरों की रक्षा करने में हमारे सत्ताधीश लगातार असफल सिद्ध हो रहे हैं। वे 'मनुस्मृति' और 'याज्ञवल्क्यस्मृति' की यह बात भी भूलते जा रहे हैं कि जो राजा दंडनीति का पालन नहीं करता, वह अपने राजधर्म को क्षति पहुंचाता है और उसका पतन अवश्यंभावी है। हमारी पुलिस व न्याय व्यवस्था को आज युधिष्ठिर के इन शब्दों को याद करने की जरूरत है : 'हे कुरुपुत्र, इस संसार में दंड ही वह धुरी है, जिस पर सब कुछ निर्भर है।' सामाजिक नियंत्रण के लिए त्वरित न्याय आवश्यक है। साथ ही यह एक आम नागरिक द्वारा कानून के अनुपालन के लिए भी प्रेरक होता है। इसी से अपराधों की लगाम कसी जा सकती है और जनकल्याण सुनिश्चित किया जा सकता है।

मैं कामना करता हूं कि अन्ना और उनकी टीम न्यायिक प्रक्रिया में विलंब की समस्या के समाधान में अधिक से अधिक ऊर्जा लगाए।

- गुरचरण दास (लेखक जाने माने अर्थशास्त्री हैं)
साभारः दैनिक भास्कर

गुरचरण दास