अस्पष्टता से आवश्यक वस्तु (संशोधन) अधिनियम की उत्पादकता पर पड़ सकता है असर

आवश्यक वस्तु (संशोधन) अधिनियम, 2020 को कृषि क्षेत्र में नयी जान डाल देनी चाहिए ताकि उसकी पूरी क्षमता का दोहन किया जा सके। हालांकि जहां बहुत सारे लोगों की दलील है कि यह संशोधन सही दिशा में उठाया गया कदम है, यह अधिनियम आपने मौजूदा रूप में आदर्श नहीं है। कुछ नियमों के स्पष्ट न होने के कारण यह अनुत्पादक हो सकता है जिसकी वजह से उस स्थिरता पर खतरा पैदा हो सकता है जिसे यह बढ़ावा देना चाहता है।

संसद ने कीमतों में स्थिरता हासिल करने के लक्ष्य के साथ 1955 में आवश्यक वस्तु अधिनियम पारित किया था। इस अधिनियम से भारत सरकार को चीजों खासकर दालों और सब्जियों जैसी खाद्य वस्तुओं की जमाखोरी पर रोक लगाने के लिए भंडारण की सीमा तय करने का अधिकार मिल गया था।

देश के प्रमुख कृषि अर्थशास्त्री डॉ अशोक गुलाटी उन लोगों में शामिल थे जिन्होंने इस अधिनियम के रोक लगाने वाले प्रावधानों की आलोचना की थी और अधिनियम को निरस्त करने या उसमें संशोधन करने की मांग की थी। 2019-20 के आर्थिक सर्वेक्षण में इस बात का उल्लेख किया गया कि सरकार ने अधिनियम का इस्तेमाल करते हुए जो हस्तक्षेप किया, उससे कृषि व्यापार के लिए दिए जाने वाले प्रोत्साहनों में बदलाव आए और यह महंगाई पर रोक लगाने में नाकाम रहा। इससे किराया मांगने के व्यवहार को भी बढ़ावा मिला और कृषि क्षेत्र में शोषण की घटनाएं बढ़ीं।

संशोधन का उद्देश्य उपभोक्ताओं और किसानों दोनों के हितों की रक्षा करते हुए कृषि क्षेत्र में उदारीकरण लाना है। कृषि बाजारों के हितधारक अब अधिनियम का उल्लंघन करने के डर के बिना आवश्यक वस्तुओं का भंडारण कर सकते हैं, उन्हें एक-जगह से दूसरी जगह ले जा सकते हैं और लंबे समय के लिए समझौते कर सकते हैं। इसके अलावा संशोधन का उद्देश्य कृषि क्षेत्र में निजी निवेश को भी बढ़ावा देना है। भंडारण सुविधाओं जैसे क्षेत्रों में निवेश को बढ़ावा देने से बाजारों में कीमतों की स्थिरता में सुधार आएगी।

हालांकि संशोधन के कुछ पहलू अस्पष्ट हैं। उदाहरण के तौर पर, जहां सरकार केवल आसाधारण परिस्थितियों में खाद्य वस्तुओं की आपूर्ति को लेकर हस्तक्षेप कर सकती है, अधिनियम में यह साफ नहीं किया गया है कि असाधारण परिस्थिति के निर्धारण का क्या पैमाना होगा। सरकार इस अस्पष्टता का इस्तेमाल राजनीतिक उद्देश्यों के लिए किए जाने वाले हस्तक्षेप के लिए कर सकती है जैसे कि मूल्य वृद्धि को लेकर शहरी उपभोक्ताओं की शिकायतें। इसी तरह अधिनियम में हस्तक्षेप के आकार की सीमा और हितधारकों को हस्तक्षेप गलत लगने की स्थिति में निवारण तंत्र जैसे दूसरे महत्वपूर्ण विचारों को लेकर भी कुछ नहीं कहा गया है।

यह अधिनियम केवल मूल्य वृद्धि के आधार पर भंडारण की सीमाएं तय करने का अधिकार देता है। साथ ही यह प्रावधान करता है कि भंडारण की सीमाएं, कृषि उपज के किसी प्रोसेसर या मूल्य श्रृंखला प्रतिभागी पर लागू नहीं होंगी। अधिनियम के उपरोक्त प्रावधान को लेकर कुछ प्रासंगिक समस्याएं हैं; पहली बात कि किसी वस्तु का कोई एक मूल्य नहीं होता। उदाहरण के तौर पर प्याज की कीमतों को ले लें जो राज्यों की बात छोड़ दें तो अलग-अलग बाजार में ही अलग-अलग होता है। यह साफ नहीं है कि किस मूल्य का इस्तेमाल इस बात का निर्धारण करने के लिए किया जाएगा कि मूल्य वृद्धि अधिनियम में तय की गयी सीमाएं पार हो रही हैं या नहीं। दूसरी बात, चूंकि मूल्य वृद्धि से भंडारण की सीमाएं बढ़ सकती हैं, इससे कृषि भंडारण क्षेत्र में निवेश रुक सकता है। गोदाम अचानक से रातों रात गैरकानूनी हो सकते हैं क्योंकि इस बात का निर्धारण सरकार करती है कि किसी वस्तु की कीमत बहुत ज्यादा बढ़ गयी है। आखिरी बात, अधिनियम से यह साफ नहीं होता कि सरकार को कब भंडार संबंधी नियंत्रणों को खत्म कर देना चाहिए। ऐसा कानून का उल्लंघन किए बिना अनिश्चित काल तक चलता रह सकता है।

जहां आवश्यक वस्तु संशोधन अधिनियम सही दिशा में उठाया गया एक कदम लगता है, इसकी अस्पष्टता अप्रत्याशित परिणाम ला सकती है। इसलिए सरकार अगर निवेश बढ़ाने से जुड़ी अपनी प्रतिबद्धता को लेकर गंभीर है तो उसे इन नियमों को परिभाषित करना चाहिए।

- अर्जुन कृष्णन (रिसर्चर, सेंटर फॉर सिविल सोसायटी)