अनर्थ करने की जिद

यह देखना दयनीय है कि करीब-करीब हर मुद्दे पर मतभेद रखने वाले हमारे राजनीतिक दल इस पर एकजुट हैं कि राजनीतिक दलों को सूचना अधिकार कानून से बाहर रखा जाए। यह एकजुटता कितनी जोरदार है, इसका पता सूचना अधिकार कानून में संशोधन लाने के लिए पेश किए गए विधेयक से चलता है। इस पर गौर किया जाना चाहिए कि हमारे राजनीतिक दल अपने संकीर्ण स्वार्थो के लिए उस कानून को बदलने यानी कमजोर करने जा रहे हैं जिसे स्वतंत्रता के बाद सबसे प्रभावी कानूनों में से एक की संज्ञा दी गई है।

यह और कुछ नहीं संसद के बेजा और मनमाने इस्तेमाल का सबसे शर्मनाक नमूना है। राजनीतिक दल कानून बनाने के अपने अधिकार का खुला दुरुपयोग करने जा रहे हैं। सूचना अधिकार कानून में तब्दीली का मतलब है कि राजनीतिक दल एक ऐसे कानून के दायरे में आने से इन्कार कर रहे हैं जिसे वे अन्य सभी के लिए उपयोगी मानते हैं। यह घोर अलोकतांत्रिक कदम है। इससे भारतीय लोकतंत्र जगहंसाई का पात्र बनेगा और साथ ही उसका जनविरोधी चरित्र भी सामने आएगा।

सूचना अधिकार कानून में छेड़छाड़ की कोशिश से यही सिद्ध होता है कि राजनीतिक दल अभी भी सामंती प्रवृत्ति से ग्रस्त हैं। सामंती युग में शासक वर्ग जिस तरह यह मानकर चलता था कि उसके पास कुछ विशेष अधिकार होने के साथ-साथ उसे कुछ खास रियायतें मिलनी चाहिए उसी तरह की मानसिकता का प्रदर्शन खुद को लोकतांत्रिक बताने वाले हमारे राजनीतिक दल भी कर रहे हैं।

राजनीतिक दल सूचना अधिकार कानून से बाहर रहने के लिए जिस तर्क को जोरदारी से सामने रख रहे हैं वह यह है कि वे सरकारी निकाय जैसे नहीं हैं और इस कानून के दायरे में आकर खुद को संचालित नहीं कर सकेंगे। वस्तुत: यह तर्क नहीं कुतर्क है। राजनीतिक दल जिस शासन को संचालित करते हैं उसके सारे अंग सूचना अधिकार कानून के दायरे में आते हैं। आखिर जब राजनीतिक दलों द्वारा संचालित सरकार के सभी विभाग सूचना अधिकार कानून का हिस्सा हैं तो फिर इन दलों को इस कानून से बाहर रहने की छूट कैसे मिल सकती है? इसकी भी अनदेखी नहीं की जा सकती कि सरकारी विभागों में जो खामियां-खराबियां और भ्रष्टाचार है उसके लिए मूलत: राजनीतिक दल ही जिम्मेदार हैं।

सरकारी तंत्र में भ्रष्टाचार तो इसीलिए फल-फूल रहा है, क्योंकि राजनीतिक दल उसे संरक्षण प्रदान करते हैं। स्पष्ट है कि राजनीतिक दल सूचना अधिकार कानून से बाहर रहकर न केवल जवाबदेही से बचना चाह रहे हैं, बल्कि मनमानी करते रहने की भी छूट चाह रहे हैं। यह निराशाजनक है कि 700 से अधिक सांसदों में से एक-दो सांसदों को छोड़कर किसी ने भी राजनीतिक दलों द्वारा किए जा रहे इस अनर्थ के खिलाफ आवाज नहीं उठाई। इससे यही पता चलता है कि राजनीतिक दल किस तरह निजी कंपनियों की तरह काम कर रहे हैं। चूंकि सूचना अधिकार कानून को उलटने के लिए सभी राजनीतिक दल एकजुट हैं इसलिए उसके सलामत रहने की उम्मीद कम ही नजर आती है। फिर भी यह अपेक्षा तो की ही जाती है कि राष्ट्रपति संशोधित विधेयक पर मुहर लगाने से बचेंगे।

 

साभारः दैनिक जागरण