कृषि को सरकारी नियंत्रण से मुक्त करना जरूरी

केंद्र सरकार के कृषि कानूनों के खिलाफ राजस्थान विधानसभा में तीन कृषि संशोधन विधेयक पारित किए गए हैं जिनका उद्देश्य इन कानूनों के राज्य के किसानों पर असर को निष्प्रभावी करना है। राजस्थान सरकार का कहना है कि इससे किसानों के हितों की रक्षा होगी और उनके लिए न्यूनतम आय सुनिश्चित होगी। लेकिन विधेयकों पर ध्यान देने से पता चलता है कि इसके प्रावधान किसानों की मदद करने की बजाए लंबे समय में उन्हें नुकसान ही पहुंचाएंगे।

संशोधन विधेयक, न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) से कम कीमतों पर कृषि उपज के अनुबंध पर रोक लगाते हैं। इस प्रावधान के साथ एक समस्या यह है कि इसमें यह बात साफ नहीं की गयी है कि कृषि उपज के लिए कौन सी एमएसपी मिलनी चाहिए। भविष्य के कृषि उपज के लिए अनुबंध फसल के पांच मौसम तक प्रभाव में रह सकता है और फसल के हर मौसम में एक नयी एमएसपी की घोषणा की जाती है। लेकिन राजस्थान में पारित किए गए विधेयक यह साफ नहीं करते कि अनुबंध पर हस्ताक्षर करने की तारीख की एमएसपी या कृषि उपज की आपूर्ति की तारीख की एमएसपी में से कौन सी एमएसपी मापदंड होगी।

विधेयक राजस्थान सरकार को कृषि उपज बाजार समिति (एपीएमसी) के बाहर कृषि उपज की बिक्री पर शुल्क लगाने की मंजूरी भी देते हैं। विधेयक में कहा गया है कि कर की कीमत का बोझ किसान पर नहीं पड़ेगा बल्कि यह कर खरीदाता को कृषि उपज खरीदते समय चुकाना होगा। इसके अलावा निजी बाजार का फायदा यह है कि चूंकि उन्हें शुल्कों को लेकर प्रतिस्पर्धा करनी होती है, उन्हें किसानों के लिए आकर्षक होना पड़ता है। अब सरकार को राज्य संचालित मंडियों के बाहर होने वाले व्यापार पर कर लगाने की मंजूरी देने से किसानों को आखिर में मिलने वाली बिक्री की कीमत का प्रतिशत कम होगा। यह संशोधन किसानों के उतने हित में नहीं है जितना कि बताया जा रहा है।

संशोधन एमएसपी से कम कीमत पर रोक लगाते हैं, भले ही उसपर दोनों पक्षों में सहमति क्यों न हो। यह साफ नहीं है कि राज्य को एमएसपी से कम कीमतों पर कृषि उपज ना बेचने के लिए किसानों पर जोर डालने की खातिर कानूनी ताकत का सहारा लेने की क्या जरूरत है। अगर सरकार की एमएसपी ज्यादा है तो उससे कम पर कौन अपनी फसल बेचना चाहेगा? कोई किसान केवल इस कारण से एमएसपी से कम पर अपनी फसल बेचेगा अगर एपीएमसी तक फसल ले जाने का खर्च या एपीएमसी में ज्यादा शुल्क या किसी दूसरे तर्कसंगत कारण से किसान का अंतिम मुनाफा कम होता हो। यह विधेयक किसानों को निजी पार्टियों के साथ लेन-देन में अनिच्छुक भागीदार मानता है, जबकि निजी बाजारों को राज्य संचालित एपीएमसी के साथ प्रतिस्पर्धा करनी पड़ती है।

विधेयक के प्रावधान शोषण को अपराध के दायरे में डालते हैं। शोषण को अपराध मानना सही है, यहां इस बात पर ध्यान देना जरूरी है कि इसके लिए परिभाषाएं और सजा क्या हैं। अधिनियम कहता है कि कोई व्यक्ति अगर कृषि उपज की आपूर्ति पर सहमत हुआ था और फिर आपूर्ति होने पर उसे तीन दिन के भीतर स्वीकार नहीं करता या उसके लिए कीमत का भुगतान नहीं करता यह शोषण है। इसके लिए उसे तीन से सात साल की जेल की सजा हो सकती है। बहुत सारे लोगों को यह सजा काफी ज्यादा लग सकती है।

राजस्थान में पारित हुए इन संशोधन विधेयकों का निश्चित असर यह होगा कि इससे कृषि क्षेत्र से निजी निवेश दूर चले जाएंगे। कोई भी कृषि-व्यापारी राजस्थान में क्यों कारोबार करेगा और किसानों के साथ अनुबंध पर क्यों हस्ताक्षर करेगा जब उसे अतिरिक्त कर देना होगा, बदली हुई कीमतें देनी होंगी और साथ ही जेल की सजा का खतरा झेलना होगा? उनके लिए पड़ोसी राज्य कृषि निवेश के लिहाज से कहीं ज्यादा आकर्षक विकल्प होंगे।

जैसे विनिर्माण और सेवा क्षेत्र को मुक्त करने से देश में समृद्धि आयी है, समय आ गया है कि कृषि को भी मुक्त किया जाए ताकि भारत तरक्की करें।

- अर्जुन कृष्णन (लेखक सेंटर फॉर सिविल सोसायटी में रिसर्च एसोसिएट हैं)