यूनेस्को द्वारा शिक्षा के क्षेत्र में जवाबदेही की कमी पर उठाए गए प्रश्न का औचित्य!

'यूनाइटेड नेशंस एजुकेशनल, साइंटिफिक एंड कल्चरल ऑर्गनाइज़ेशन' (यूनेस्को) ने हाल ही में वर्ष 2017-18 के लिए 'द ग्लोबल एजुकेशन मॉनिटरिंग (जीईएम) रिपोर्ट' को जारी किया है। रिपोर्ट में दुनियाभर में स्कूली शिक्षा के हालात पर प्रकाश डाला गया है। लेकिन यूनेस्को की रिपोर्ट, भारत में स्कूली शिक्षा को लेकर कुछ ज्यादा ही चिंतित नजर आ रही है। रिपोर्ट का नाम 'अकाउंटेबिलिटी इन एजुकेशन' भी भारतीय परिस्थितियों के अनुरूप ज्यादा प्रतीत होता है। यूनेस्को द्वारा जारी रिपोर्ट में भारत सहित अन्य देशों में स्कूली शिक्षा के क्षेत्र में अकाउंटेबिलिटी अर्थात जवाबदेही की कमी को प्रमुखता से जगह दी गई है। रिपोर्ट में अध्यापकों की कक्षा में अनुपस्थिति पर भी प्रश्नचिन्ह खड़े किए गए हैं। रिपोर्ट में बताया गया है कि किस प्रकार जवाबदेही की कमी के कारण गुणवत्ता युक्त शिक्षा प्रदान करने के उद्देश्य को झटका लगा है।

रिपोर्ट के अनुसार देश की कुल आबादी का पांचवा हिस्सा (26 करोड़ लोग) अब भी पढ़ने लिखने में सक्षम नहीं है, जबकि आरटीई कानून के बावजूद सवा करोड़ (12 मिलियन) बच्चों का किसी भी स्कूल में नामांकन नहीं है। यह देश के नीति निर्धारकों के लिए बड़ी चिंता का विषय है।

हालांकि यह पहली बार नहीं है जब कि देश में सरकारों व अध्यापकों की जवाबदेही पर प्रश्न खड़े किए गए हों। शिक्षा के क्षेत्र में कार्यरत नागरिक संस्थाएं (सिविल सोसायटी) व शोधार्थी समय समय पर इस बाबत ध्यान आकर्षित कराते रहे हैं। इंस्टिट्यूट ऑफ एजुकेशन, यूनिवर्सिटी कॉलेज लंदन की प्रोफेसर गीता गांधी किंगडन ने लगातार अपने आंकड़ों के माध्यम से स्कूलों में अध्यापकों की उपस्थिति और गुणवत्ता युक्त शिक्षा प्रदान करने की उनकी जवाबदेही पर प्रश्न खड़े किए हैं। प्रो. किंगडन द्वारा 2008 में एकत्रित आंकड़ों के मुताबिक सरकारी स्कूलों में नियमित अध्यापकों की अनुपस्थिति औसतन 23-25 प्रतिशत थी। जबकि विश्व बैंक के आंकड़ों के मुताबिक भी स्कूलों में अध्यापकों की अनुपस्थिति 25 प्रतिशत पायी गई। इसके अलावा स्कूल में उपस्थित अध्यापकों में से मात्र 50 प्रतिशत अध्यापक ही शिक्षण कार्य करते पाए गए। यदि इसे उदाहरण के माध्यम से समझें तो यदि एक स्कूल में 40 अध्यापक नियुक्त हैं और 25 प्रतिशत अनुपस्थित हैं तो उपस्थित अध्यापकों की संख्या 30 हुई। इनमें से यदि 50 प्रतिशत ही अध्यापन कार्य करते हैं तो यह संख्या 15 हो जाती है। इस प्रकार स्थिति अत्यंत भयावह हो जाती है।

यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया के शिक्षाविद् कार्तिक मुरलीधरन के आंकड़ों के मुताबिक अध्यापकों की अनुपस्थिति देश के अलग अलग राज्यों में अलग अलग पायी गई। कार्तिक के अनुसार महाराष्ट्र के सरकारी स्कूलों में जहां 15 प्रतिशत अध्यापक अनुपस्थित पाए गए वहीं झारखंड के स्कूलों में अध्यापकों की अनुपस्थिति 42 प्रतिशत तक पायी गई। कार्तिक ने अध्यापकों की अनुपस्थिति का आंकलन धनराशि के आधार पर किया तो पाया कि अध्यापकों की अनुपस्थिति के कारण देश को प्रतिवर्ष 1.5 बिलियन डॉलर लगभग यानी लगभग 100 करोड़ रूपए का नुकसान होता है।

हालांकि स्कूल में अध्यापकों की अनुपस्थिति के कारणों के बारे में जानकर और अधिक हैरत होती है। आमतौर पर यह माना जाता है कि राज्यों द्वारा अध्यापकों को गैर शैक्षणिक कार्यों जैसे कि मिड डे मील, जनगणना, टीकाकरण, इलेक्शन ड्यूटी में लगाने के कारण अध्यापक स्कूल में अनुपस्थित रहते हैं। जबकि सरकार द्वारा गिनाए गए अनुपस्थिति के कारणों में अध्यापक अथवा उसके परिवार में किसी का बीमार होना, स्कूल से घर का दूर होना, स्कूल की टाइमिंग के दौरान परिवहन व्यवस्था का न होना, अन्य वित्तीय कार्यों जैसे कि खेती, व्यवसाय, ट्यूशन इत्यादि, अध्यापक की नियुक्ति पसंद के स्कूल में न होना और सामाजिक व राजनैतिक गतिविधियों में शामिल होना है। यह भी एक तथ्य है कि अध्यापकों के वेतन में वृद्धि से भी कक्षा में उनकी उपस्थिति पर फर्क नहीं पड़ा है।

वर्ल्ड बैंक और अब यूनेस्को की रिपोर्ट को ही पढ़कर सही सरकारों और नीति निर्धारकों को अब यह समझ में आ जाना चाहिए शिक्षा को लेकर तैयार मिलेनियम गोल महज स्कूल बिल्डिंग बनाने व अध्यापकों को नियुक्त करने अथवा वेतन वृद्धि से हासिल नहीं किया जा सकता। यदि सबको गुणवत्ता युक्त शिक्षा प्रदान करने के सपने को साकार करना है तो अध्यापकों की जवाबदेही को तय करना आवश्यक है।

- संपादक