ऊबर से ज्यादा हमारी व्यवस्था दोषी

तो हमने उबर पर प्रतिबंध लगा दिया और इसके साथ एप आधारित सारी टैक्स कंपनियों पर भी पाबंदी लगा दी, क्योंकि मोबाइल एप कंपनी में रजिस्टर्ड ड्राइवर ने टैक्सी में सवार दिल्ली की युवती से दुराचार किया था। कारण बताया गया कि उबर ने पंजीयन नहीं कराया और उस प्रक्रिया का पालन नहीं कराया, जो एक रेडियो कंपनी को करना चाहिए और स्वतंत्र रूप से अपने ड्राइवरों की पृष्ठभूमि की पर्याप्त जांच नहीं की। उनका सत्यापन नहीं कराया। बेशक, सरकार ने नहीं बताया कि कंपनी को दुराचार की घटना होने के पहले महीनों तक क्यों काम करने दिया गया।
 
उसने इस बात का भी उल्लेख नहीं किया कि उबर ने सरकार द्वारा मान्यता प्राप्त, व्यावसायिक लाइसेंस दिए गए ड्राइवरों की सेवाएं ही अपने यात्रियों को मुहैया कराईं। सरकार ने इस तथ्य पर गौर नहीं किया कि यहीं सरकारी मान्यता प्राप्त, व्यावसायिक लाइसेंस रखने वाले ड्राइवर बदमाश हो सकते हैं, जो झूठे चरित्र प्रमाणपत्र-दे सकते हैं, जिनका न कोई डिजिटल आर्काइव और न कोई डेटाबेस होता है।
 
हमने ड्राइवरों को मान्यता देने या किसी व्यक्ति का पुलिस रिकॉर्ड उपलब्ध न होने की व्यवस्थागत विफलता के वास्तविक मुद्‌दे पर गौर नहीं किया। हमने उबर और दिल्ली में ग्राहकों को लाइसेंसधारी ड्राइवरों से जोड़ने वाले एप पर प्रतिबंध लगा दिया। पता नहीं कैसे यह मान लिया गया कि इससे महिलाएं अधिक सुरक्षित हो जाएंगी। रातोंरात हजारों ड्राइवरों की नौकरियां चली गईं। दिल्ली की महिलाएं (और पुरुष भी), जो ऐसे एप का उपयोग कर एक स्थान से दूसरे स्थान जाती थीं उनके पास अब यह विकल्प नहीं होगा। अब बताइए कि महिलाओं से इस विकल्प के अलावा क्या करने की अपेक्षा है? अब इसका कोई जवाब नहीं है।
 
शायद वे किसी ऑटो की तलाश में अपनी किस्मत आजमाएंगी। यदि उन्हें ऑटो रिक्शा मिल भी गया तो ड्राइवर या तो आपके नियत स्थान पर जाने को राजी नहीं होगा या मीटर से चलने की बात नहीं मानेगा। इस तरह वे जिस क्षण ऑटो में बैठेंगी उसी क्षण वे कानून तोड़ देंगे। सरकार इस पचड़े में पड़ना नहीं चाहती कि वह यह देखें कि टैक्सी या ऑटो से सफर किस प्रकार अधिक सुरक्षित बनाया जाए। उबर और उस जैसों पर प्रतिबंध लगा दो। कहानी खत्म। आगे बढ़ो।
 
हम ऐसा क्यों करते हैं? अपनी सरकार खुद चुनने वाले समाज के रूप में हम तार्किक ढंग से प्रतिक्रिया व्यक्त करने की बजाय भावनात्मक प्रतिक्रिया देने का चुनाव करके बलि का आसान बकरा खोजने की कोशिश क्यों करते हैं। यदि ऐसी ही घटना ऑटो रिक्शा या साइकिल रिक्शा में सवारी के दौरान होती है तो क्या हम उन्हें बंद करने की हिम्मत करेंगे? नि:संदेह, ज्यादा महत्वपूर्ण सवाल तो यह है कि इस भयंकर घटना से हम क्या सीख सकते हैं? हम उबर जैसी कंपनियों पर अपना अपराध बोध छिपाने के लिए हमला करते हैं। हम उबर को इसलिए भी पसंद नहीं करते, क्योंकि यह नया और विदेशी है। यह ऐसी बात है, जो हमें डराती है और हमारे इनोवेशन विरोधी, विदेशी विरोधी और ‘मैंने बताया था न’ वाली प्रतिगामी मानसिकता को चुनौती देता है।
 
हालांकि, ज्यादा जरूरी यह है कि हमें अपनी पुलिस और आरटीओ प्रणाली को सुधारना होगा। जिन दो मुख्य बदलावों की जरूरत है वह है डिजटाइजेशन व रिकॉर्ड प्राप्ति आसान बनाना और सुगमता से काम करने वाली, भ्रष्टाचार मुक्त और परेशान न करने वाला पुलिस बल। बेशक, यह बहुत बड़ी अपेक्षाएं हैं, लेकिन जब तक हम इन्हें ठीक नहीं करते ऐसी घटनाएं होती रहेंगी। भारत में पुलिस सत्यापन कराने को कहा जाता है और किया भी जाता है, लेकिन इसका संबंध रिश्वत व उत्पीड़न से है। यही बात आरटीओ से संबंधित किसी भी काम पर लागू होती है। प्रक्रिया इतनी भारीभरकम बना दी गई है कि ज्यादातर लोग इससे बचने की कोशिश करते हैं।
 
यही वजह है कि ज्यादातर लोग अपने घरेलू सेवकों या ड्राइवरों का पुलिस सत्यापन नहीं कराते। विडंबना यह है कि रिश्वत देकर आप किसी भी मामले में सत्यापन करा सकते हैं। इससे पूरी प्रक्रिया का ही मखौल उड़ता है। इसी खामी का फायदा उठाकर दिल्ली घटना के आरोपी ने अपने कागजात हासिल किए और जिसके आधार पर उसे काम मिला। वह किसी अन्य टैक्सी स्टैंड या किसी अन्य रेडियो टैक्सी कंपनी में ड्राइवर हो सकता था और वही अपराध कर सकता था, इसलिए उबर पर प्रतिबंध लगाने की जरूरत नहीं है बल्कि हमें अपनी ही व्यवस्था सुधारने की आवश्यकता है।
 
तो क्या उबर को कोई दोष नहीं दिया जाना चाहिए? नहीं ऐसी बात भी नहीं है। उन्होंने एक गलती की है और इससे बहुत कुछ सीखा जा सकता है। और वह गलती यह है कि ड्राइवर का नामांकन करने के लिए उन्होंने सरकारी व्यवस्था पर भरोसा किया। किसी ड्राइवर की सेवाएं लेने के लिए पुलिस की ओर से चरित्र प्रमाण-पत्र और व्यावसायिक लाइसेंस किसी भी अन्य देश में पर्याप्त आधार होता। हालांकि, भारत में ऐसी चीजें छोटी-मोटी रिश्वत या जुगाड़ से आसानी से जुटाई जा सकती हैं।
 
यदि उबर का मतलब गंभीर अर्थों में विश्वस्तरीय होने से है तो हमारी जुगाड़ वाली मान्यता प्रणाली पर निर्भर होना दुर्भाग्य से बहुत बड़ी गलती है। अन्य छोटे निजी पर्यटन संबंधी टैक्सी के मालिक, जिनके पास दर्जनभर टैक्सी का बेड़ा होता है, वे सिर्फ सरकारी दस्तावेजों पर निर्भर नहीं होते। वे अपने ड्राइवरों पर निगाह रखते हैं- कौन शराब पिया हुआ है, कौन थोड़ा अजीब नजर आता है, उसके बारे में बाहर क्या कहा जाता है आदि। सत्यापन की नाकाम सरकारी प्रणाली के बदले इससे उद्‌देश्य हासिल हो जाता है। ड्राइवरों व उपयोगकर्ताओं को जोड़ने वाले  ग्लोबल एप के रूप में  उबर यह नहीं कर सकता। किंतु इसका यह मतलब नहीं है कि उबर भारत के लिए नहीं है। हम व्यवस्था की खराबी के कारण किसी उद्योग को असंगठित क्षेत्र में पड़े रहने नहीं दे सकते वरना हम तो कभी अपना दर्जा ऊंचा कर ही नहीं पाएंगे।
 
हमारी शहरी परिवहन व्यवस्था कमजोर है। सारे लोग इतने समृद्ध नहीं हैं कि कार इस्तेमाल कर सकें। हमारी सड़कें ज्यादा वाहनों को बर्दाश्त नहीं कर सकतीं। पार्किंग व्यवस्था भी सीमित ही है। हमें उबर जैसे एप्स की शिद्‌दत से जरूरत है ताकि परिवहन ढांचे की खामी को भरा जा सके। अाइए, महिलाओं की सुरक्षा के मामले में शॉर्ट कट या जुगाड़ को न अपनाएं। इसमें हमें दूरगामी उपाय करने होंगे। हमारी पुलिस और नियामक व्यवस्था को पूरी तरह सुधारकर भरोसेमंद बनाना होगा। यह विशेष रूप से बड़ा सबक है, जो हाल की घटना से मिला है। जो भी हो, ईश्वर के लिए महिलाओं का सम्मान करें और इसके लिए आपकों सरकारी मान्यता, सत्यापन या किसी एप की आवश्यकता नहीं है।
 
 
- चेतन भगत (अंग्रेजी के प्रसिद्ध युवा लेखक)
साभारः दैनिक भास्कर