मातृभाषा में दी गई स्कूली शिक्षा अधिक प्रभावीः स्वामी

- वार्षिक 'स्कूल च्वाइस नेशनल कांफ्रेस 2014' के दौरान शिक्षा में चयन और तकनीकि के प्रयोग पर हुई चर्चा
 
- शोध और नीतियों के बीच अंर्तसंबंधों पर भी दिया गया जोर
 
नई दिल्ली। जाने माने पत्रकार व स्तंभकार स्वामीनाथन अंकलेसरिया अय्यर ने कहा है कि स्कूलों में यदि मातृभाषा के माध्यम शिक्षा प्रदान की जाती है तो नौनिहालों की ग्राह्य क्षमता अन्य भाषा में दी गई शिक्षा के मुकाबले कई गुना ज्यादा होती है। उन्होंने विभिन्न देशों में हुए अध्ययनों का हवाला देते हुए कहा कि तकनीकि तौर पर किताब पढ़ते समय पहली व दूसरी कक्षा के बच्चों की ग्राह्य क्षमता प्रति शब्द 12 सेकेंड से कम होती है। यदि दूसरी भाषा में शिक्षा प्रदान की जाती है तो बच्चों को उक्त भाषा के शब्दों को पहले अपनी मातृभाषा में परिवर्तित करना पड़ता है और फिर समझना पड़ता है। इस क्रम में उन्हें 12 सेकेंड से ज्यादा का समय लगता है। इस प्रकार किसी शब्द को समझने में 12 सेकेंड से जितना अधिक समय लगता है बच्चों को उक्त शब्द को याद रखने में उतनी ही अधिक परेशानी होती है। वह शुक्रवार को शिक्षाविदों, सामाजिक कार्यकर्ताओं, अध्यापकों व स्कूल संचालकों के एक राष्ट्रीय सम्मेलन को संबोधित कर रहे थे। सम्मेलन का आयोजन सेंटर फॉर सिविल सोसायटी द्वारा किया गया था।
 
शुक्रवार को इंडिया हैबिटेट सेंटर में आयोजित वार्षिक 'स्कूल च्वाइस नेशनल कांफ्रेंस 2014' के दौरान उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के सचिव पार्थसारथी सेन शर्मा ने कहा कि आजादी के 60 वर्षों के बाद भी क्षिक्षा के क्षेत्र में होने वाले शोध और नीतियों के बीच अंर्तसंबंधों की कमी के कारण तमाम समस्याएं ज्यों की त्यों बनी हुई हैं। उन्होंने शोध व अध्ययनों की गुणवत्ता की विश्वसनीयता में सुधार करने की बात कही।
 
सेंटर फॉर सिविल सोसायटी के प्रेसीडेंट पार्थ जे. शाह ने कहा कि प्रत्येक बच्चे की प्रकृति व उसकी ग्राह्य क्षमता दूसरे से अलग होती है, लेकिन हमारी शिक्षा व्यवस्था सबके साथ समान तरीके से ही व्यवहार करती है जिस कारण बच्चों का प्रदर्शन सीमित या नैसर्गिक क्षमता से कम रह जाती। 
 
इस मौके पर लोकसत्ता पार्टी के अध्यक्ष जयप्रकाश नारायण, आर.सी.जैन, सेंट्रल स्क्वायर फाऊंडेशन की एरिका तारापोरेवाला, नमिता डालमिया, प्रेमा रंगाचारी, डा. मनीषा प्रियम, के सत्यानारायन आदि ने अपने विचार व्यक्त किए। कांफ्रेंस के दौरान शिक्षा में चयन, आजादी और तकनीकि के प्रयोग आदि विषयों पर गहन चर्चा की गई।