इंसान के सिर पर मैला

सिर पर मैला ढोने की कुप्रथा को लेकर जब भी हमारे देश में राज्य सरकारों से जबाव तलब किया जाता है तो उनका दावा होता है कि उनके यहां अब यह समस्या बिल्कुल नहीं। इस कुप्रथा का नामो निशान मिट गया है और इन सफाई कर्मियों का उन्होंने अपने यहां पूरी तरह पुनर्वास कर दिया है, लेकिन इन दावों में कितनी सच्चाई और कितना झूठ है, यह हाल ही में हमारे सामने निकलकर आया। साल 2011 की जनगणना के आंकड़े इन दावों की हवा निकाल रहे हैं। आंकड़ों के मुताबिक, 50 फीसद भारतीय खुले में शौच को जाते हैं और 13 लाख ऐसे अस्वच्छ शौचालयों का इस्तेमाल करते हैं, जिनकी साफ-सफाई का जिम्मा आज भी घोषित और अघोषित रूप से सफाईकर्मियों के पास है। महज अपनी जीविका की खातिर ये सफाईकर्मी न चाहते हुए भी इस अमानवीय और घृणित कार्य में लगे हुए हैं। यह हालत तब है, जब सरकार ने इस कुप्रथा पर पूरे देश में पाबंदी लगा रखी है। केंद्र सरकार साल 1993 में ही हाथ से सफाई और सूखा शौचालय निषेध कानून पारित कर चुकी है। यही नहीं, इस काम में लगे लोगों के पुनर्वास के लिए सरकार एक कानून भी लाई थी, लेकिन न तो इस कुप्रथा पर प्रतिबंध लग पाया और न ही कानून पूरी तरह से कारगर हो पाया। कानून मौजूद होने के बाद भी देश भर में पांच लाख से ज्यादा लोग सिर पर मैला ढोने के काम में लगे हुए हैं। ये सफाईकर्मी जिनमें महिलाएं एवं पुरुष दोनों शामिल हैं, सार्वजनिक एवं निजी शौचालयों में टीन प्लेटों और झाड़ूओं की सहायता से मैले को डिब्बे या टोकरियों में रखते हैं और फिर सिर पर उठाकर निर्धारित स्थान पर फेंकते हैं। सिर पर मैला ढोने का यह अमानवीय कार्य हमारे समाज में सालों से जारी है, लेकिन मजाल है कि कभी किसी के खिलाफ कोई कार्रवाई हुई हो। समूचा तंत्र इतना संवेदनहीन हो गया है कि उसकी आंखों के सामने यह काम चलता रहता है और वह सिर्फ तमाशा देखता रहता है। सिर पर मैला ढोने की कुप्रथा के मुक्ति अभियान में लगे गैरसरकारी संगठनों की पहली शिकायत है कि अनगिनत कोशिशों के बाद भी किसी सरकार ने इस समस्या को न तो गंभीरता से लिया और न इस सिलसिले में आज तक दृढ़ इच्छाशक्ति के साथ कोई समयबद्ध योजना या अभियान चलाया। इस कुप्रथा के खिलाफ जब देश भर में आवाज उठी तो केंद्र सरकार ने जनवरी-2011 में अपनी ओर से ऐलान किया कि पूरे देश में सूखे शौचालयों और हाथ से काम करने वाले सफाईकर्मियों की सही-सही संख्या मालूम करने के लिए एक सर्वेक्षण किया जाएगा। अफसोस कि डेढ़ साल से ज्यादा समय गुजर गया, मगर यह प्रक्रिया अब भी शुरू नहीं हो पाई है। जनगणना के हालिया आंकड़ों के बाद एक बार फिर सरकार ने हामी भरी है कि वह जल्द ही इस काम में लगे लोगों की सही संख्या का पता लगाएगी और संसद के आगामी सत्र यानी मानसून सत्र में इस कुप्रथा को रोकने के लिए एक कारगर कानून लाएगी। मैला ढोने वालों के पुनर्वास के लिए कहने को सरकार ने पूरे देश में बड़े ही जोर-शोर से स्वरोजगार योजना यानी एसआरएमएस शुरू की। इसके तहत मैला ढोने वालों को स्वरोजगार के लिए ऋण देना था, लेकिन सफाई कामगारों के प्रति राज्य सरकारों की उदासीनता कहिए या लापरवाही, इस योजना के लिए आवंटित 735.60 करोड़ रुपये में से 500 करोड़ रुपये आज तक खर्च नहीं हुए हैं। जो पैसा खर्च हुआ, उसमें भी धांधली और भ्रष्टाचार की खबरें सामने आई। योजना के तहत सरकार ने तीन लाख 42 हजार 468 मैला ढोने वालों को ऋण दिए जाने का लक्ष्य रखा, लेकिन साल 2010 तक इस योजना में केवल एक लाख 18 हजार 474 लोगों ने ही आवेदन किए, जिसमें से 40 हजार लोगों ने आवेदन भरने के बाद भी ऋण नहीं लिया। वजह, योजना में व्याप्त बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार और रिश्वतखोरी। योजना में भ्रष्टाचार और रिश्वतखोरी के चलते ज्यादातर लोग ऋण लेने से ही कतराते हैं। आलम यह है कि मैला ढोने के काम में लगे सफाइकर्मियों को अपने पैरों पर खड़ा करने वाली सरकार की इस महत्वाकांक्षी योजना पर बिल्कुल भी यकीन नहीं। योजना में गड़बड़ी और धांधली की तस्दीक एक रिपोर्ट भी करती है। इस रिपोर्ट में मध्य प्रदेश, राजस्थान, उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र में योजना के असल क्रियान्वयन की पड़ताल की गई है। राष्ट्रीय गरिमा अभियान नाम से हुए इस अध्ययन में जब मध्य प्रदेश में योजना के क्रियान्वयन की जमीनी हकीकत जानी गई तो कई हैरतअंगेज तथ्य सामने निकलकर आए। मसलन, सूबे में जिन लोगों को इस योजना का लाभ दिया गया, उनमें से 79 फीसद ने कभी मैला ढोने का काम किया ही नहीं था। ऋण पाने वालों में से 48 फीसद पुरुष हैं, जबकि सच्चाई यह है कि सूबे में 98 फीसद मैला ढोने वाली औरतें हैं। यही नहीं, पूरे सूबे में तीन फीसदी ऋण ऐसे लोगों को बांट दिया गया, जिनकी उम्र 18 साल से कम है यानी कायदे से तो वे इस योजना के लाभार्थी हो ही नहीं सकते। कुल मिलाकर अध्ययन यह साबित करता है कि सूबे में बड़े पैमाने पर ऋण बांटने में घोटाला हुआ और 85 फीसद मैला ढोने वाली महिलाओं को इस योजना का कोई फायदा नहीं मिला। सिर पर मैला ढोने की कुप्रथा न सिर्फ मानवाधिकारों का उल्लंघन है, बल्कि समूची इंसानियत पर भी एक धब्बा है। यह बुराई जड़ से खत्म हो, इसके लिए सरकार और समाज दोनों को ही अपनी-अपनी ओर से ईमानदार प्रयास करने होंगे। तभी जाकर यह कलंक मिटेगा। देर से ही सही, अब सरकार इस कुप्रथा पर रोक लगाने के लिए संजीदा हुई है। सरकार की सबसे पहली चुनौती इस समस्या के शिकार लोगों-परिवारों और क्षेत्रों का ठीक से पता लगाना है, जिससे उनके पुनर्वास के लिए कोई बेहतर योजना बनाई जा सके। दूसरी चुनौती संसद में एक ऐसा प्रभावी कानून पारित करवाना है, जिससे इस कुप्रथा पर पूरी तरह से रोक लग सके। एक बात और, महज कानूनी पाबंदी लगाने से ही यह अमानवीय प्रथा खत्म नहीं होगी, बल्कि इसके लिए समाज में और भी बड़े पैमाने पर बदलाव करने होंगे। खासतौर पर चुनौती समाज की मानसिकता को बदलने की है। सफाईकर्मियों के साथ भेदभाव और छुआछूत, उन्हें इस घृणित काम में जबरन धकेले जाने जैसी अमानवीयता, रूढि़ या परंपरा के नाम पर हमारे समाज में अपनी जड़ें जमाए हुए है। जाहिर है, जब तक समाज की मानसिकता नहीं बदलेगी, लाख कोशिशें कर लें, इस कुप्रथा पर काबू नहीं पाया जा सकता।

- जाहिद खान (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)
साभारः दैनिक जागरण