सुधारों की सुधरती गति

यूपीए सरकार ने बैंकिंग कानून (संशोधन) विधेयक- 2011 से विवादास्पद प्रावधान को हटाने की बुद्धिमत्ता दिखाई, जिसका परिणाम है कि इस संशोधन को लोकसभा की मंजूरी मिल गई है। कंपनी कानून में संशोधन का विधेयक भी लोकसभा में पास हो गया है। इन दोनों विधेयकों जैसी व्यापक राजनीतिक सहमति बनी, उसके बाद राज्यसभा में इनके लटकने की आशंका नहीं है। इस तरह संसद के मौजूदा सत्र में ही आर्थिक सुधारों की दिशा में ये अहम विधायी प्रक्रिया पूरी हो जाने की संभावना है। बीमा कानून में संशोधन का विधेयक और पेंशन फंड विनियामक और विकास प्राधिकरण बिल पर स्थिति अभी साफ नहीं है, जबकि नया भूमि सुधार कानून का मसला बजट सत्र तक टल गया है। इसके बावजूद सकारात्मक बात यह है कि भूमि सुधार बिल पर बात आगे बढ़ी है। चूंकि सरकार ने मूल विधेयक में डेढ़ सौ से अधिक संशोंधनों के साथ बिल को फिर से पेश किया, इसलिए विपक्ष की यह मांग अनुचित नहीं थी कि उसे राय बनाने के लिए अधिक वक्त मिलना चाहिए। उम्मीद है कि बजट सत्र तक विपक्ष और दूसरे हित-धारकों की तरफ से ऐसे ठोस सुझाव सामने आएंगे, जो एक ठोस और न्यायोचित कानून पास होने का आधार बनेंगे। इस बीच बैंकिंग बिल से वह प्रावधान हटा लिया गया, जिसके तहत बैंकों को वायदा कारोबार में निवेश की छूट मिल जाती। यह एक जोखिम भरा क्षेत्र है, अत: विपक्ष इस पर समझौता करने को तैयार नहीं था। आखिरकार सरकार ने कदम वापस खींचे। इससे अब भारतीय रिजर्व बैंक की ओर से नए बैंक खोलने के लिए लाइसेंस जारी करने का रास्ता खुल गया है। बैंकों की नीति तय करने में शेयरधारकों को अब ज्यादा अधिकार मिलेंगे। इससे इस क्षेत्र में देशी पूंजी आने और प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के लिए अनुकूल स्थितियां बनेंगी। कंपनी कानून के जरिए कंपनियों के कामकाज को अधिक पारदर्शी बनाने और उनमें निवेशकों को अधिक अधिकार संपन्न बनाने के प्रावधान किए गए हैं। नया कानून 1956 के कानून की जगह लेगा, जिसके प्रावधान बदलती स्थितियों के बीच पुराने पड़ गए हैं। इन विधेयकों के पास होने से अर्थव्यवस्था को सकारात्मक संकेत मिलेंगे। चौड़ी सियासी खाई और मतभेदों के बीच आर्थिक मसलों पर ऐसी राजनीतिक सहमति बनने का संदेश यह है कि लंबे समय तक लकवाग्रस्त रहने के बाद आखिरकार अब सरकार सबको साथ लेते हुए पक्के इरादे के साथ आगे बढ़ रही है। आज इसी की सबसे ज्यादा जरूरत है।

- नया इंडिया से साभार