शिक्षा का अधिकार ही निगल रहा है शिक्षा को

 

गैर सरकारी संस्था क्राई (चाइल्ड राइट्स ऐंड यू) की ओर से हाल ही में जारी रिपोर्ट ने बहुचर्चित शिक्षा के अधिकार (आरटीई) की कमियों की ओर एक बार फिर से ध्यान आकर्षित किया है। कुछ महीने पहले एक अन्य एनजीओ ‘प्रथम’ ने भी अपनी रिपोर्ट में बताया था कि आरटीई को लागू किये जाने के बाद शिक्षा के स्तर में गिरावट आई है। इसके लिए आमतौर पर दोषी ठहराए जाने वाले कारकों, जैसे राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी, लालफीताशाही, भ्रष्टाचार आदि को जिम्मेदार मानना सही नहीं होगा। कमियां इस कानून के भीतर ही हैं।

क्राई की रिपोर्ट के अनुसार, कक्षा पांच तक आते-आते सरकारी स्कूलों के 25 फीसदी छात्र-छात्राएं पढ़ाई छोड़ देते हैं और कक्षा आठ तक आते-आते तकरीबन 46 फीसदी विद्यार्थी स्कूल जाना बंद कर देते हैं। छह से 14 साल तक की उम्र के 80,43,889 बच्चों का कभी किसी स्कूल में नाम ही नहीं लिखा गया और वे स्कूलों से बाहर हैं, जबकि शिक्षा का अधिकार विधेयक को लागू किए जाने के समय बताया गया था कि आरटीई पांच से 14 साल की उम्र के सभी बच्चों के लिए उनके एक मौलिक अधिकार के तौर पर मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा सुनिश्चित करेगा। पर सच यह है कि अगर इस कानून को सच्चे अर्थों में लागू किया जाए, तो देश भर के हजारों स्कूलों को बंद करना पड़ेगा, क्योंकि वे स्कूल 31 मार्च तक वह जरूरी बुनियादी ढांचा स्थापित नहीं कर सके हैं, जिसका उल्लेख इस कानून में हैं। इनमें से ज्यादातर स्कूल गरीब व कमजोर तबकों के बच्चों के लिए हैं। आठवीं कक्षा तक परीक्षा न लेने के प्रस्ताव ने भी समस्या पैदा की है। हालांकि, इस प्रस्ताव के पीछे मंशा यह है कि बच्चों को परीक्षा से संबंधित तनाव से निजात मिले, पर सच्चाई यह है कि नई व्यवस्था ने सरकारी विद्यालयों के शिक्षकों को उचित तरीके से अपने कर्तव्य न निभाने का बहाना दे दिया है। इसका असर बच्चों की सीखने की क्षमता पर क्या पड़ा है, यह हम ‘प्रथम’ की रिपोर्ट में देख ही चुके हैं।

असली समस्या यह नहीं है कि शिक्षा का अधिकार कानून विफल रहा है। देश ने अबतक न जाने कितनी सरकारी विफलताओं को झेला है। असली समस्या यह है कि इसके कर्ताधर्ता इस बात को समझने में नाकाम रहे हैं कि आरटीई कानून कितना अधिक विफल रहा है। दरअसल, इसके सृजनकर्ता और उनके मानने वाले राजनेता इस महत्वपूर्ण तथ्य पर चर्चा तक नहीं कर रहे कि आरटीई की समस्या इसके क्रियान्वयन में नहीं, बल्कि कानून में ही है। भले ही सरकारी विद्यालयों में शिक्षा का स्तर गिरता रहे, भले ही कमजोर आर्थिक स्थिति वाले परिवारों के लाखों बच्चों को इस आरटीई नामक परोपकार का खामियाजा भुगतना पड़े, किंतु कल्याणकारी सिद्धांत की यह प्रलयकारी शक्ति इस्तेमाल की जाती रहैगी और इसकी वजह से लाखों अरमान और प्रतिभाएं कुचली जाती रहेंगी।

 

रवि शंकर कपूर (लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)

साभारः हिंदुस्तान