आरटीई के गुजरात मॉडल में छिपा है सभी समस्याओं का समाधान

- गुजरात मॉडल में स्कूल भवन, खेल के मैदान आदि की अनिवार्यता की बजाय छात्रों के प्रदर्शन को बनाया गया है मान्यता प्रदान करने का आधार

- आरटीई के गुजरात मॉडल को अपना दिल्ली सरकार बचा सकती है 2 हजार स्कूलों और 4 लाख छात्रों का भविष्य

शिक्षा का अधिकार कानून के तहत जहां एक ओर निजी स्कूलों के लिए मान्यता प्राप्त होना अनिवार्यता कर दिया गया है। वहीं मान्यता प्राप्त करने के लिए स्कूल भवन, क्लास रूम, खेल के मैदान आदि के लिए निश्चित आकार की आवश्यकता जैसे तमाम ऐसे प्रावधानों को अनिवार्य कर दिया गया है जिससे स्कूलों के समक्ष बड़ी समस्या पैदा हो गई है। इन प्रावधानों के समर्थक इसे छात्रों के सर्वांगीण विकास के लिए आवश्यक बताते हैं वहीं स्कूल संचालक जमीन की अनुपलब्धता और इसके काफी महंगे होने के कारण प्रावधानों को पूरा करने में स्वयं को असक्षम पाते हैं। परिणामस्वरूप स्कूलों और छात्रों का भविष्य अधर में लटका हुआ है। काफी माथा पच्ची करने के बावजूद दिल्ली सरकार समस्या के समाधान के लिए बीच का रास्ता तलाशने में अबतक नाकाम ही साबित हुई है।

हालांकि इस समस्या का समाधान एक वर्ष पूर्व ही गुजरात सरकार ने निकाल लिया था। यह रास्ता था स्कूलों को मान्यता देने के लिए स्कूल भवनों, क्लास रूमों व खेल के मैदानों के आकार से ज्यादा उनमें पढ़ने वाले छात्रों के प्रदर्शन को आधार बनाना। मान्यता प्रदान करने के गुजरात के इस मॉडल की लोकप्रियता अब दिल्ली तक पहुंच चुकी है और स्कूल संचालक व शिक्षा विशेषज्ञ इसे सर्वश्रेष्ठ तरीका बता रहे हैं। उधर, भारतीय जनता पार्टी का कहना है कि दिल्ली सरकार द्वारा आरटीई के गुजरात मॉडल को न अपनाने के पीछे मुख्य कारण राजनीति है।

थिंक टैंक संस्था सेंटर फॉर सिविल सोसायटी (सीसीएस) के अभिषेक भट्टाचार्या के मुताबिक आरटीई का गुजरात मॉडल स्कूल संचालकों और छात्रों दोनों की समस्याओं का बेहतर समाधान साबित हुआ है। दिल्ली सरकार इस मॉडल को अपनाकर छात्रों के भविष्य को भी बचा सकती है और स्कूलों को भी बंद होने से बचा सकती है।

उधर, सामाजिक कार्यकर्ता व भाजपा नेता संजय कौल का कहना है कि शीला सरकार द्वारा आरटीई के गुजरात मॉडल को न अपनाने के पीछे मुख्य कारण राजनीति है। उनका कहना है कि किसी ठोस समाधान की बजाए सरकार द्वारा मान्यता प्राप्त करने की समय सीमा बढ़ाने का मामला यह साबित करने के लिए काफी है कि वह इसे चुनावों तक लटकाकर रखना चाहती है।

संजय कौल के मुताबिक गुजरात में निजी स्कूलों को मान्यता देने के लिए स्कूलों में पढ़ने वाले छात्रों के प्रदर्शन, अध्यापकों की योग्यता व अन्य शैक्षणिक गतिविधियों को 85% व स्कूल भवनों को 15% महत्व देना तय किया गया है। यह मॉडल अपने आप में पूर्ण है और दिल्ली सहित अन्य राज्यों में इसे अपनाकर बेवजह परेशानी से बचा जा सकता है।

संजय कौल ने बताया कि गुजरात मॉडल अधिक लचीला भी है। इसमें कक्षा के आकार को अध्यापक छात्र के अनुपात के आधार पर ज्यादा कारगर तरीके से सुलझाया गया है। उदाहरण के लिए स्कूल में क्लास रूम का आकार 300 वर्ग मीटर होना आवश्यक है, लेकिन यदि स्कूल के पास क्लास रूम के आकार को बढ़ाने की जगह नहीं है तो वह छात्र व अध्यापक के अनुपात के आधार पर दो क्लास रूमों का संचालन कर सकते हैं।

- अविनाश चंद्र