ड्रॉफ्ट एनईपीः डूबते टाइटैनिक के डेक पर कुर्सियों को पुर्नव्यवस्थित करने जैसा

काफी इंतजार के बाद राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनईपी) 2019 का मसौदा आखिरकार जारी हो ही गया। यह मसौदा 484 पृष्ठों का व्यापक दस्तावेज है जिसे तैयार होने में चार वर्षों का समय लगा। इस मसौदे में स्कूली शिक्षा के संबंध में व्यक्तिगत तौर पर सुझायी गई कुछ अति उत्कृष्ट सिफारिशें भी शामिल हैं। इन सिफारिशों में शिक्षकों के प्रशिक्षण और स्कूली शिक्षा प्रणाली में सुधार, राष्ट्रीय शिक्षा आयोग की स्थापना, सरकार द्वारा नीति निर्धारक, संचालक, मूल्यांकनकर्ता और स्कूलों के नियामक सभी की भूमिका निभाने की बजाए इनके शासन की भूमिकाओं का पृथक्कीकरण आदि शामिल हैं। सरकार द्वारा स्कूल संचालन और मूल्यांकन दोनों स्वयं करने के कारण हितों के भारी टकराव की स्थिति उत्पन्न होती है। चूंकि सरकार स्वयं ही स्कूलों का संचालन भी करती है इसलिए सरकारी स्कूलों की जवाबदेही तय नहीं की जा सकती है।

मसौदे में कई नकारात्मक पहलू भी हैं। एनईपी का मसौदा स्कूली शिक्षा में व्याप्त गंभीर समस्याओं के अप्रभावी समाधान प्रस्तुत करता है। एक, इसमें सीखने के स्तर पर कोई स्पष्ट ध्यान केंद्रित नहीं किया गया है, जबकि सबसे पहले इसे ठीक किया जाना चाहिए। नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति का मुख्य कारण छात्रों के सीखने के स्तर में सुधार लाना माना जाता है लेकिन इस मसौदे में सीखने के स्तरों के बाबत चौंका देने वाले आँकड़ों का कोई हवाला तक नहीं दिया गया है।

दूसरा, यह खराब स्कूलों की मौजूदगी, अध्यापकों में जवाबदेही की कमी, अध्यापकों की अनुपस्थिति जैसी समस्याओं के समाधान के लिए किए जाने वाले प्रयासों की कमी जैसे शिक्षा के क्षेत्र में व्याप्त संकटों के कारणों की गलत व्याख्या करता है। यह ठीक वैसे ही है जैसे कि कमरे में मौजूद विशालकाय हाथी को देखकर भी अनदेखा करना। इसलिए, इस मसौदे में स्कूलों की जवाबदेही सुनिश्चित करने वाली संरचनाओं को पुनर्जीवित करने के लिए अनिवार्य रूप से कोई बड़ा मौलिक सुधार प्रस्तावित नहीं है। इसके बजाय, स्कूलों और अध्यापकों को जवाबदेह बनाने के लिए एनईपी बिना किसी शक्तियों वाले स्कूल प्रबंधन समितियों (एसएमसी) का प्रावधान करता है। यह महज़ एक रूमानी अवधारणा भर ही है, क्योंकि आरटीई अधिनियम के तहत पहले से ही अनिवार्य किए गए एसएमसी अप्रभावी साबित हो चुके हैं।

बाकी दुनिया जहां स्कूल वाउचर (प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण, डीबीटी) जैसे व्यापक सुधार वाले विचारों के साथ काम कर रही है, एनईपी का मसौदा इस पर विचार तक नहीं करता है। जबकि यह जवाबदेही सुनिश्चित करने वाले बड़े सुधार की धुरी बन सकता है।

यह दुर्भाग्यपूर्ण है क्योंकि भाजपा सरकार ने कई क्षेत्रों (किसान सब्सिडी, उज्ज्वला एलपीजी गैस सब्सिडी, आदि) में बड़े लाभ के लिए डीबीटी का साहसपूर्वक उपयोग किया है। यह लाभ सीधे नागरिकों-मतदाताओं को दे रही है, जो खर्च करने की शक्ति को प्राप्त कर प्रसन्नतापूर्वक उसका उपयोग कर रहे हैं। ऐसा कर 80 मिलियन फर्जी लाभार्थियों को रिकॉर्ड से हटा 1.1 लाख करोड़ रुपए की बचत करने में सफलता प्राप्त हुई। यह कहना गलत नहीं होगा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता का एक महत्वपूर्ण कारण साहसपूर्ण कल्पनाशील सुधार के प्रति उनका साहस और इसे कठोरता से लागू करना है।

आरटीई अधिनियम के तहत वंचित तबके के बच्चों को शिक्षित करने के लिए प्रतिपूर्ति के तौर पर निजी स्कूलों को सरकारी धन देते समय उसी प्रकार की चोरी का खतरा उपस्थित रहता है। वर्ष 2017 में मध्य प्रदेश के निजी स्कूलों और शिक्षा अधिकारियों की मिलीभगत से आरटीई प्रतिपूर्ति के नाम पर 600 करोड़ रुपये के गबन का खुलासा हुआ था।

संशोधित एनईपी, वंचित बच्चों की शिक्षा के लिए सार्वजनिक अनुदान को रिसाव वाली सरकारी संरचना के माध्यम से निजी स्कूलों को देने की बजाए डीबीटी के माध्यम से देने पर गंभीरता से विचार कर सकती है जिससे अभिभावकों को स्वयं स्कूल चुनने की स्वतंत्रता भी प्राप्त होगी। आम तौर पर, डीबीटी का उपयोग शिक्षा के लिए सभी सार्वजनिक सब्सिडी देने के लिए मोड के रूप में किया जा सकता है जिससे करोड़ों अभिभावकों के पास स्कूल चुनने और उन्हें जवाबदेह बनाने का अधिकार मिलेगा। केंद्र सरकार पहले से ही ऐसा करती है जब वह सभी केंद्रीय सरकारी कर्मचारियों को शिक्षा के लिए 2,250 रुपये प्रति माह प्रति बच्चा डीबीटी (छात्रवृत्ति) देती है।

एनईपी असमान रूप से छोटे सरकारी स्कूलों (अध्याय 7 हल्के फुल्के तरीके से यह बताता है कि देश के सभी सरकारी प्राथमिक स्कूलों के 28% में 30 से कम छात्र हैं) की समस्या की पहचान तो करता है, लेकिन यह सरकारी स्कूलों के खाली होने के कारणों का निदान नहीं करता है जिससे ये स्कूल शैक्षणिक और आर्थिक दोनों रूपों में अव्यवहारिक हैं।

डीआईएसई के आधिकारिक आंकड़ों के विश्लेषण से मुझे पता चला कि वर्ष 2010-11 और 2017-18 के बीच, सरकारी प्राथमिक विद्यालयों में होने वाले दाखिलों 2.4 करोड़ छात्रों की कमी आई जबकि मान्यता प्राप्त निजी गैर-सहायता प्राप्त स्कूलों में 2.1 करोड़ छात्रों की वृद्धि दर्ज की गई (माना जाता है कि बाकी छात्र संभवतः गैर मान्यता प्राप्त निजी स्कूलों में जा रहे हैं जो डीआईएसई के आंकड़ों में शामिल नहीं हैं)। यह तो तय है कि सरकारी स्कूलों में दाखिलों में आई कमी का कारण इस आयु वर्ग के बच्चों की आबादी में कमी आने के कारण नहीं थी क्योंकि उसी समयन्तराल (2009 से 2014 के बीच) एमएचआरडी द्वारा कमीशन किए गए आईएमआरबी के सर्वेक्षणों के अनुसार जनसंख्या में 4.3% की वृद्धि हुई थी।

2017-18 तक 20 प्रमुख राज्यों में 41% से अधिक सरकारी प्राथमिक विद्यालयों में 50 या उससे कम छात्र दाखिल थे जबकि प्रति विद्यालय पढ़ने वाले छात्रों की औसत संख्या 27.9 थी। इन स्कूलों में शिक्षकों और छात्रों का अनुपात 1::12 था जो यह बताता है कि इन स्कूलों में अध्यापकों की संख्या जरूरत से बहुच ज्यादा है। वर्ष 2017-18 में उपरोक्त 41% सरकारी स्कूलों में सरकारी खजाने से अकेले शिक्षकों के वेतन पर 51,917 रुपये प्रति छात्र खर्च किया गया। यह राशि उसी वर्ष भारत की प्रति व्यक्ति आय के 45% और बिहार की प्रति व्यक्ति आय के 134% के बराबर थी। इस प्रकार संसाधनों की कमी और उच्च छात्र-शिक्षक अनुपात के कारण शिक्षा की गुणवत्ता खराब होने की दलील बिल्कुल तर्कहीन है। शिक्षा में सुधार के लिए अधिक संसाधनों की मांग करने वालों से पहले भयावह अक्षमता को अनिवार्य रूप से सुधारने के लिए कहा जाना चाहिए।

एनईपी के मसौदे ने सरकारी शिक्षा को प्रभावित करने वाली अक्षमता की जड़ अर्थात् स्कूलों और शिक्षकों की जवाबदेही की कमी को नजरअंदाज किया है। यह कमरे में हाथी की मौज़ूदगी को नजरअंदाज करने जैसा है। जब तक इस हाथी को देखा नहीं जाता है और स्कूलों को डीबीटी फंडिंग के माध्यम से नियंत्रित नहीं किया जाता है, एनईपी की अच्छी नीयत और अत्यधिक श्रम से तैयार किए गए प्रावधानों का परिणाम शून्य ही होगा।

- प्रो. गीता गांधी किंगडन (लेखिका जानी मानी शिक्षाविद् हैं) 

साभारः यह लेख द टाइम्स ऑफ इंडिया में प्रकाशित मूल लेख का हिंदी रुपांतरण है।