सजा के खौफ से आता है सुशासन

जब आप यूरोप में यात्रा करें तो आमतौर पर आपको ट्रेन या बस में अापके टिकट की जांच करने वाला टिकट इंस्पेक्टर दिखाई नहीं देता। आप ऐसी कई यात्राएं कर सकते हैं, जिसमें आपके टिकट की जांच ही न हो। किंतु काफी समय बाद अचानक न जाने कहां से तीन-चार इंस्पेक्टर प्रकट होंगे। सारे दरवाजों पर खड़े हो जाएंगे और तेजी से टिकटों की जांच कर लेंगे। जिसके पास टिकट नहीं होगा, उसे तत्काल वास्तविक कीमत का 150 गुना दाम चुकाना होता है। कोई बहाना नहीं चलता है। जुर्माना नहीं भरा तो आपको हिरासत में ले लिया जाएगा। हर यात्रा में ऐसी जांच होने की संभावना 30 में से एक बार होती है जबकि जुर्माना एक बार में 150 गुना होता है। यह सिद्धांत अमेरिका के राष्ट्रपति रोनाल्ड रीगन ने 1980 के दशक में निकाला था। सिद्धांत यह कि मैं आप पर भरोसा करूंगा पर कभी-कभार परख भी लूंगा। यदि आप कसौटी पर खरे नहीं उतरे तो आपके सामने कानून की किताब रख दूंगा। विकसित देशों में ज्यादातर क्षेत्रों में शासन का यही सिद्धांत लागू किया जाता है और यह कारगर भी है।
 
प्रधानमंत्री ने अपने चुनाव अभियान में  ‘न्यूनतम सरकार, अधिकतम शासन’ का वादा किया था। इसकी व्याख्या इंस्पेक्टर राज में अत्यधिक कमी की अवधारणा के रूप में की गई है। इसका यह अर्थ नहीं है कि कोई जांच ही नहीं की जाएगी और न इसका मतलब यह है कि दिए गए हर बयान को शाश्वत सत्य मान लिया जाएगा। इसका सिर्फ इतना अर्थ है कि हर लेन-देन का सत्यापन नहीं किया जाएगा। हालांकि, यदि पकड़े गए तो सजा एक मिसाल होगी। ऐसी कि वह नियम-कायदे तोड़ने के प्रति खौफ पैदा करेगी। क्या इसे भारत में लागू करना संभव है- इसका उत्तर ‘हां’ है। बेशक, प्रक्रिया शुरू भी हो चुकी है।
 
देश समान सामान एवं सेवा कर (जीएसटी) अपनाए जाने की दहलीज पर पहुंच चुका है। यह ऐतिहासिक और दूरगामी कर सुधार होगा। यह व्यापार, वाणिज्य व उत्पादन और आमतौर पर पूरी अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देने वाला सुधार होगा। देश के भीतर व्यापार और सामानों की आवाजाही में बाधक ढेर सारे स्थानीय कर, शुल्क, अंतर-प्रांतीय कर और ऑक्ट्राय व ऐसे ही कृत्रिम बैरियर, जिनमें ऊर्जा तो काफी खर्च होती है, लेकिन उतना फायदा नहीं होता, जल्दी ही भूतकाल की बात हो जाएंगे। इसके अलावा भिन्न सामानों पर भिन्न करों वाली मौजूदा कर प्रणाली की तरह खींज पैदा करने वाली सीमा जांच प्रक्रिया ही व्यापक इंस्पेक्टर राज का कारण है, जिसके उतने ही व्यापक विपरीत प्रभाव हैं। यहां कहने का मतलब यह नहीं है कि दस्तावेजों की जांच व सत्यापन होना ही नहीं चाहिए बल्कि अाशय यह है कि उत्पादकों व व्यापारियों के बयानों को प्रथम दृष्टया स्वीकार कर लिया जाएगा पर बीच-बीच में उनकी जांच भी की जाएगी। यदि गड़बड़ी पाई गई तो जुर्माना ऐसा होगा कि वह कभी भूल नहीं पाएगा। यदि वाकई सरकार निकट भविष्य में जीएसटी को सफलतापूर्वक लागू कर पाती है, तो यह ऐतिहासिक कदम होगा और प्रमुख सुधार होगा।
 
बीमा क्षेत्र में जो कानून भारत में लागू है उसका आधार ‘सर्वोत्तम सद्इच्छा’ की अवधारणा है। इसमें प्रस्तावक को खुद के बारे में सबकुछ सत्यतापूर्वक उजागर करने की सुविधा दी जाती है। बेशक, यह सब उसे ‘पॉलिसी’ देने या खारिज किए जाने का निर्णय लेने के संदर्भ में प्रासंगिक है। वह प्रमाणित करेगा कि ‘जो तथ्य दिए गए हैं वे सत्य हैं और ऐसी कोई जानकारी छिपाई नहीं गई है, जो प्रासंगिक है।’ यदि किसी स्तर पर यह बयान असत्य पाया गया तो उसे बहुत भारी जुर्माना चुकाना होगा। यह भी संभव है कि उसकी पॉलिसी बिना कोई मुआवजा चुकाए खारिज कर दी जाए। सच्चाई बताने की जिम्मेदारी प्रपोजर की रहेगी, बीमा कंपनी इसे जानने के लिए जवाबदेह नहीं होगी। यह सिद्धांत शासन और क्रियान्वयन के कई क्षेत्रों में लगाया जा सकता है। इस प्रकार आयकर का आकलन करवाने वाला यदि आय को छिपाता है तो उसे राशि का 100 गुना जुर्माना चुकाना पड़ सकता है।
 
यदि कोई फैक्ट्री मालिक मंजूरी के वक्त माने गए पर्यावरण नियमों का उल्लंघन करता है तो उसकी मंजूरी रद्‌द कर फैक्ट्री को सरसरी तौर पर बंद किया जा सकता है। इसी प्रकार अन्य नियम लागू किए जा सकते हैं। यह अचानक की जाने वाली जांच और उसके साथ बहुत ज्यादा जुर्माना नियम-कायदे तोड़ने को हतोत्साहित करने का काम करेगा। आज जैसे लिजलिजे और कमजोर इंस्पेक्टर राज को उच्च गुणवत्ता की टेक्नोलॉजी और उल्लंघनकर्ताओं को कड़े दंड के जरिये सीमित, लेकिन प्रभावी निरीक्षण पद्धति में बदला जा सकता है। पिछले माह, 68 वर्षीय फैरी कमांडर की कोरिया में नौका पलट गई, जिसमें कई यात्री मारे गए। उसे 36 साल कैद की सजा सुनाई गई। हत्या के आरोप में नहीं बल्कि लापरवाही बरतने के आरोप में। अब हर बस, टैक्सी, ट्रेन ड्राइवर या बोट कैप्टन, विमान पायलट और कई अन्य इसे याद रखेंगे कि ‘लापरवाही’ 36 साल के लिए जेल में पटक सकती है। यह एक कदम 10 हजार इंस्पेक्टर के बराबर है।
 
हमने हाल में बिलासपुर में त्रासदी घटते देखी। नसबंदी ऑपरेशन के बाद 20 महिलाओं की मौत हो गई। बड़े जोर-शोर से किसी न किसी के त्याग-पत्र की मांग उठाई जाने लगी। क्या यह समाधान है? वास्तविकता यह है कि सार्वजनिक क्षेत्र की हर ठेका प्रणाली भीतर तक सड़ चुकी है। मिलावटी दवाओं का बोलबाला है। हर दुकान में कम तौला जाता है। हर खाद्य पदार्थ में मिलावट है- कुछ में तो खतरनाक चीजें डाली जाती हैं। आप किसी भी चीज को हाथ लगाएं उसमें स्तरहीनता, मिलावट ही मिलेगी। नि:संदेह यह दलील बेतुकी है कि विभाग के इंस्पेक्टर प्रत्येक मामले की असलियत नहीं जानते। छत्तीसगढ़ की घटना में जंग लगे उपकरण, मिलावटी/विषैली दवाएं, गंदा, संक्रमित वातावरण, इन सब ने भूमिका निभाई। जरूरी था कि एक माह के भीतर विश्वसनीय, उच्चस्तरीय जांच पूरी कर ली जाती, 10 या 15 दोषियों को पहचान लिया जाता और 15 साल के लिए जेल भेज दिया जाता (संभवत: हत्या में सहायता देने या अन्य किसी कानून के तहत)। उन्हें दुनिया को दिखा देना चाहिए कि वे प्रशासनिक सड़न को दूर करना चाहते हैं। खेद है कि बिलासपुर त्रासदी को भुला भी दिया गया है। ‘न्यूनतम सरकार, अधिकतम शासन’ लाने का एक और अवसर गंवा दिया गया।
 
इंस्पेक्टर राज में कटौती का युग लाने के लिए एक पूर्व शर्त है, जो बेहतर शासन की ओर ले जाएगी। वह है सजा या जुर्माने का डर। साबित हो चुके मामले में अत्यधिक ज्यादा सजा या जुर्माना। इसका मतलब है कि हमारी न्यायिक प्रणाली का नवीनीकरण करना होगा। कानून के उल्लंघन के खिलाफ डर पैदा करने वाली सजा के लिए फास्ट ट्रैक अदालतें कायम करनी होंगी। कड़े दंडात्मक तंत्र के बिना कोई चीज कारगर नहीं होगी। नई सरकार को सुधारात्मक कदम उठाने के लिए समय देने की जरूरत है। जीएसटी अच्छी शुरुआत होगी। ‘सद्इच्छा’ का सिद्धांत भी कई क्षेत्रों में लागू किया जा सकता है। यह सार्वजनिक क्षेत्र के लगभग हर पहलू में कारगर हो सकता है। यदि इसे उचित पद्धति से अपनाया जाए तो भ्रष्टाचार काफी हद तक कम होगा और हर जगह नजर आए बिना सरकार काफी प्रभावी सिद्ध हो सकती है।
 
 
- टीएसआर सुब्रमनियन, पूर्व कैबिनेट सचिव
साभारः दैनिक भास्कर