मजदूरी आर्थिक वृद्धि से बढ़ी है, मनरेगा से नहीं

पिछले छह वर्षों में खेत मजदूरों की मजदूरी काफी तेजी से बढ़ी है और इसके बढ़ने की रफ्तार चीजों की कीमतें बढ़ने की रफ्तार से ज्यादा रही है। इसका नतीजा ग्रामीण मजदूरों का जीवन स्तर सुधरने रूप में दिखाई पड़ा है। 2007-08 से लेकर अबतक देश के इस सर्वाधिक विपन्न तबके की आय में 6.8 प्रतिशत की वास्तविक सालाना बढ़त दर्ज की गई है। इस शानदार रुझान के पीछे क्या है? कई राजनेता और वामपंथी विश्लेषक इसका श्रेय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (मनरेगा) को देते हैं। लेकिन मेरे समेत कई अन्य लोग तेज आर्थिक वृद्धि को इसकी वजह मानते रहे हैं। हाल में कृषि लागत व मूल्य आयोग (सीएसीपी) के लिए किए गए अशोक गुलाटी के एक शोध अध्ययन से इस बहस का समाहार हो गया है।

नए अवसरों का सृजन

इस शोध से पता चला है कि जीडीपी ग्रोथ और इसके दो घटकों कृषि तथा विनिर्माण (कॉन्स्ट्रक्शन) में आई तेजी ने ग्रामीण मजदूरी बढ़ाने में मुख्य भूमिका निभाई है। जहां तक सवाल मनरेगा का है तो कई राज्यों में इसका प्रभाव नगण्य है, और जहां यह ठीकठाक है, वहां भी मजदूरी बढ़ाने में इसकी कोई खास भूमिका नहीं है। इससे एक बार फिर यह साबित होता है कि आर्थिक वृद्धि सिर्फ एक छोटे से अमीर तबके के लिए नहीं बल्कि गरीबों के लिए भी अच्छी साबित हुई है। तेज वृद्धि का मुख्य लाभ यह नहीं है कि इससे होने वाली अतिरिक्त आय मनरेगा जैसी गरीबी उन्मूलन योजनाओं के जरिये रिस-रिस कर गरीबों तक पहुंच जाती है। इसके बजाय तेज वृद्धि का मुख्य लाभ उद्यमियों और कामगारों के लिए नए अवसरों के सृजन के रूप में सामने आया है, जिससे उत्पादकता सुधरी है और वास्तविक आय बेहतर हुई है।

खाली मजदूर अब कहां

सदियों से हमारे यहां बेकार मजदूरों की एक बड़ी फौज उत्पादकता और रोजगार बढ़ने के बावजूद मजदूरी का स्तर नीचा बनाए रखने के काम आती रही है। लेकिन पिछले दशक की तेज वृद्धि ने खाली मजदूरों की इस समूची फौज को हजम कर लिया है और कृषि, उद्योग, सेवाक्षेत्र यानी सारे ही उत्पादक क्षेत्रों में कामगारों की कमी पैदा कर दी है। काफी सारे युवा काम की बजाय पढ़ाई में जुटे हैं, ताकि आर्थिक वृद्धि से पैदा होने वाले नए अवसरों का लाभ उठा सकें। इसके चलते 2004 से 2009 के बीच देश की कुल कार्यशक्ति में कोई खास बढ़ोतरी नहीं दर्ज की गई। मजदूरों की कमी का आरोप प्राय: मनरेगा पर लगाया जाता है लेकिन बजट के मात्र 0.3 प्रतिशत खर्च वाली इस योजना का आकार इतना बड़ा नहीं है कि कार्यशक्ति पर इतना बड़ा असर डाल सके। कुछ जगहों पर इसके चलते समस्या ज्यादा गंभीर हो गई है, लेकिन मुख्य कारण बन सकने की स्थिति में यह कहीं नहीं है। इसमें कोई अचंभे वाली बात नहीं है, क्योंकि तेज आर्थिक वृद्धि वाले सभी एशियाई देशों में मजदूरी तेजी से बढ़ी है, हालांकि मनरेगा जैसा कुछ इनमें कहीं नहीं था।

16 राज्यों में 1990-91 से 2011-12 तक के आंकड़ों के विश्लेषण से सीएसीपी का अध्ययन इस नतीजे पर पहुंचा है कि जीडीपी में 10 फीसदी की बढ़त वास्तविक ग्रामीण मजदूरी में 2.4 प्रतिशत की वृद्धि लेकर आती है। अफसोस की बात है कि कॉन्स्ट्रक्शन (और साथ में मजदूरी) को प्रोत्साहित करने के बजाय केंद्र और राज्य सरकारें इसके रास्ते में रोड़े अटकाना ही बेहतर समझती हैं। आईएफसी-वर्ल्ड बैंक की डूइंग बिजनेस रिपोर्ट-2013 के अनुसार किसी भी विनिर्माण के लिए परमिट हासिल करने की सहूलियत को लेकर बनाई गई कुल 185 देशों की लिस्ट में भारत का स्थान 183वां है। लाल फीताशाही और भ्रष्टाचार अपने यहां खूब फलफूल रहा है। मनरेगा का प्रभाव पांच राज्यों में काफी है- आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु, राजस्थान, असम और पश्चिम बंगाल। लेकिन उत्तर प्रदेश, बिहार, महाराष्ट्र और ओडिशा जैसे कई बड़े और गरीब राज्यों में इसका कुछ खास असर नहीं है। आंकड़ों की एक पहेली यह भी है कि गुजरात और हरियाणा जैसे कुछ जोरदार जीडीपी और कृषि वृद्धि वाले राज्यों में ग्रामीण मजदूरी धीमी रफ्तार से बढ़ी है।

कई किसान यह शिकायत करते हैं कि गांव के मजदूरों को सिर्फ मनरेगा की साइटों पर टहल आने के पैसे मिल जाते हैं, जबकि समय पर मजदूर न मिल पाने से खेती को नुकसान हो रहा है। यह शिकायत कुछ ज्यादा ही कही जाएगी, हालांकि इसमें सचाई का एक अंश हो सकता है। अध्ययन बताते हैं कि मनरेगा से कोई स्थायी संपदा नहीं सृजित हुई है। यह मुख्यत: नकदी बांटने की एक कल्याणकारी योजना है। मनरेगा में कुछ मजदूरों को हर मानसून में तबाह हो जाने वाली कच्ची सड़कें बनाने जैसे अनुत्पादक कामों में लगाया जाता है। लिहाजा सीएसीपी का अध्ययन सुझाता है कि सामान्य खेती-किसानी को भी इसके दायरे में शामिल कर लिया जाए। इसके मुताबिक मनरेगा फंड का इस्तेमाल किसानों द्वारा मजदूरों को दी जाने वाली मजदूरी का आधा हिस्सा चुकाने में किया जा सकता है। इससे मजदूरों की कमी जाती रहेगी और उन्हें अधिक उत्पादक काम में लगाया जा सकेगा।

एक और हवाई सुझाव

ऐसा ही एक सुझाव अर्थशास्त्री अजित रानाडे ने औद्योगिक मजदूरों के लिए भी दिया है। उद्योग जगत भी मजदूर कम पड़ने की शिकायत कर रहा है और इसके लिए मनरेगा को जिम्मेदार बता रहा है। रानाडे का कहना है कि मनरेगा फंड का उपयोग नए-नए काम पर लगे औद्योगिक मजदूरों की पगार के एक हिस्से के रूप में किया जाए। इससे कम उत्पादकता वाले खेत मजदूरों को अधिक उत्पादकता वाले उद्योगों की तरफ मोड़ा जा सकेगा और औद्योगिक श्रम की कमी को समाप्त किया जा सकेगा। समस्या यह है कि ऐसी सभी योजनाएं भ्रष्टाचार के नए नमूने पेश करने के ही काम आएंगी। मनरेगा का विस्तार अगर सभी औद्योगिक व खेतिहर मजदूरों तक करना जरूरी हो जाए, तो भी इस मद में उतना पैसा नहीं डाला जा सकता। ऐसे में कुछ चुनिंदा फार्मरों और उद्योगपतियों को ही इसका फायदा मिलेगा, और ये वही होंगे जिनका या तो राजनीतिक पव्वा सबसे ज्यादा होगा, या जो अफसरों को सबसे ज्यादा घूस खिला ले जाएंगे।

 

 

स्वामीनाथन एस. अंकलेसरिया अय्यर

साभारः नवभारत टाइम्स