भारत और पाकिस्तान के शहर संसाधन रहित हो गए हैं!

दशकों तक भारत में ‘अर्थशास्त्र’ का तात्पर्य गरीबी का अध्ययन रहा है। कुछ समय पहले तक कॉलेज में अर्थशास्त्र पढ़ाने की शुरूआत ‘गरीबी के दोषपूर्ण चक्र’ नामक सिद्धांत (Theory of vicious circle of poverty) से की जाती थी। इस सिद्धांत के अनुसार गरीबी को दूर नहीं किया जा सकता है। गरीब लोग तथा गरीब राष्ट्र के लिए गरीब रहना नियति है। वास्तव में यह कोरी बकवास है। यदि यह सत्य होता तो संसार आज भी पाषाण युग में होता। जीवनियों (Biography) का इतिहास ‘गरीबी से अमीरी’ का सफर करने वाली कथाओं से भरा पड़ा है। हांगकांग और अमेरिका गरीब अप्रवासियों (immigrants) द्वारा ही बनाये गए। गरीब लोग कठोर परिश्रम करते हैं और अक्सर सफल होते हैं। अमीर लोग आलसी हो जाते हैं और विलासिता में फंस जाते हैं। यह ‘गरीबी के दुष्चक्र’ नामक सिद्धांत अब आईसीएसई एवं सीबीएसई बोर्ड के स्कूलों में पढ़ाया जाता है। ऐसी किताबों को, जिनमें ऐसे बकवास सिद्धांत दिए गए हैं, तुरंत हटा देना चाहिए।

अर्थशास्त्र गरीबी का अध्ययन नहीं है वरन् यह धन पैदा करने का अध्ययन है।
सन 1776 में एडम स्मिथ ने ‘एन एन्क्वायरी इन टू द नेचर एंड कॉजेज ऑफ द वेल्थ ऑफ नेशंस’ नामक पुस्तक लिखी। एडम स्मिथ ने धन के कारणों का अध्ययन किया और मुक्त बाजार के अनुयायी भी इसी का अध्ययन करते हैं।

भारत को गरीब देश कहा जाता है तथा गरीबी की समस्या को हल करने के लिए राजनैतिक कार्यवाही की बात की जाती है। गरीबी उन्मूलन के लिए नेताओं द्वारा करोड़ों रूपया खर्च करने के बाद भी गरीबी समाप्त नहीं हो रही है। तो क्या नेताओं द्वारा की गयी इन कार्यवाहियों एवं खर्चों को जारी रहना चाहिए? आइए हम अपने आस-पास दिखाई देने वाले गरीबी के लक्षणों (जैसे भिखारियों) पर नजर डालते हैं और उनकी स्थिति को थोड़ा पास से जानने की कोशिश करते हैं।

कभी आप दिल्ली और देहरादून के बीच बस या कार से यात्रा करें तो पाएंगे कि रूड़की से आगे सड़क एक घने जंगल से गुजरती है। इस सड़क के दोनों तरफ हजारों बंदर इकट्ठा रहते हैं और उन हनुमान भक्तों का इंतेजार करते रहते हैं जो उन्हें खाना खिलायें। लेकिन क्या इससे सिद्ध होता है कि जंगल निर्धन एवं संसाधन रहित हैं? 

या यह प्रेरकों (इंसेंटिव्स) की भूमिका को प्रदर्शित करता है? (इंसेंटिव- जिसे मनोवैज्ञानिक धनात्मक पुर्नबलन भी कहते हैं)। दरअसल, बंदर यह सीख चुके हैं कि सड़क के आसपास इकट्ठा रहकर भोजन प्राप्त करना, जीवित रहने का (अस्तित्व में बने रहने का) आसान तरीका है और यही बात भिखारियों के संदर्भ में भी सत्य है। 

बहुत पहले लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स एंड पॉलिटिकल साइंस के विकास अर्थशास्त्री ने तथ्यों की छानबीन कर, निष्कर्ष निकाला कि भारत एवं पाकिस्तान के शहरों एवं कस्बों में फैली हुई भिखारियों की संख्या, गरीबी का सूचक नहीं है, बल्कि यह दोनों ही देशों में पूर्व प्रधान (pre dominant) संप्रदायों का परिणाम है। हिंदू और मुसलमान दोनों ही सोचते हैं कि गरीब को भिक्षा देने से वे पूण्य कमायेंगे। इन देशों में पारसी, जैन और सिक्ख भिखारी नहीं मिलते क्योंकि ये संप्रदाय पुण्य कमाने के अन्य तरीकों में विश्वास करते हैं तथा अपनी मदद स्वयं करने को प्रोत्साहित करते हैं।

भारत में बच्चों को अंग भंग करके भिक्षावृति में धकेलने के विरोध में कानून है। इस प्रकार के कानून का अस्तित्व, इस घटिया व्यवस्था/कृत्य की उपस्थिति को सिद्ध करता है।

इस घटिया कृत्य की उपस्थिति के कारण ही अधिकांश भिखारी भयानक रूप से अपंग हैं। निगम और पुलिस के अधिकारियों की छोटी मोटी चोरी की आदत, भिक्षावृति के इस कृत्य को बढ़िया कमाई के साधन के रूप में देखती है।

भिक्षावृति एक व्यवसाय है और यह सिर्फ एक बात सिद्ध करता है कि हमें ‘दान’ या ‘भिक्षा’ देने के स्वरूप के बारे में फिर से सोचना चाहिए। हमें भिखारियों को भीख देने की बजाए निजी सहायता समूहों (private charities) को प्रोत्साहन देना चाहिए।

इसलिए चोरों (नेताओं) को कर से प्राप्त धन को गरीबों की मदद के नाम पर खर्च करने की अनुमति देने का कोई कारण नहीं है। परस्पर प्रतियोगी निजी सहायता समूह ही एकमात्र सर्वोत्तम उपाय है।
ध्यान दें.. स्वावलंबन या स्व-सहायता (Self help) एक नैतिक सिद्धांत है, जिसका मानना है कि बाहर से ली गई मदद व्यक्ति को कमजोर बनाती है। वाह्य मदद केवल अत्यधिक मजबूरी की स्थिति में लेनी चाहिए और वह भी निजी मददकर्ताओं (सहायता समूहों) या दोस्तों व परिवार से।

- आजादी.मी

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