पुराने वाहनों को नष्ट करने में नहीं, निर्यात करने में समझदारी है

ऐसा कहा जा रहा है कि सरकार वाहनों को नष्ट करने के बाबत एक नीति लाने को लेकर काफी उत्सुक है, जिसके तहत पुराने वाहनों को नष्ट करना अनिवार्य किया जाएगा या फिर उन्हें स्वयं नष्ट करने वालों को कुछ सब्सिडी प्रदान की जाएगी। ऐसा करने का एक उद्देश्य नई कारों की मांग में वृद्धि कर ऑटो इंडस्ट्री को बढ़ावा देना है। वर्ष 2008 में आई मंदी के बाद यूएस और यूरोप में वाहनों को नष्ट करने के प्रति प्रोत्साहित करने के पीछे वास्तव में यही उद्देश्य था। दूसरा उद्देश्य प्रदूषण को कम करना है, चूंकि पुराने वाहन आमतौर पर नए वाहनों की तुलना में अधिक प्रदूषण युक्त वायु और पीएम 2.5 उत्सर्जित करते हैं। तीसरा उद्देश्य ईंधन की खपत को कम करना है क्योंकि नए वाहन पुराने वाहनों की तुलना में ईंधन की कम खपत करने वाले हैं। परिवहन मंत्री नितिन गडकरी वाहनों को नष्ट करने वाली इस नई नीति के सबसे अधिक उत्सुक प्रस्तावक रहे हैं।

हालांकि, वाहनों को नष्ट करने की पूर्व की नीतियों से जुड़े वैश्विक अनुभव इस नीति की खामियों को भी उजागर करते हैं। पुराने वाहनों को नष्ट करने की नीति सबसे पहले तो वहीं खराब साबित होती है जहां पुराने वाहनों का रखरखाव बेहतर तरीके से किया जाता है या फिर जिनमें नए इंजनों को फिट किया गया हो। भारत जैसे देश में यह बहुत ही सामान्य बात है। मैं स्वयं भी यूएस में 17 वर्ष पुरानी कार इस्तेमाल करता हूं जो वाशिंगटन डीसी के उत्सर्जन परीक्षण को सफलतापूर्वक पास करता है।

दूसरी बात, पुराने वाहनों को नष्ट करने से पुराने सेकंड हैंड वाहनों की कीमतों में वृद्धि हो जाएगी। यह सभी गरीब कार मालिकों और छोटे ट्रक मालिकों को प्रभावित करेगा जबकि पहले से ही लाभ अर्जित करने वाले कार उत्पादकों को और अधिक समृद्ध करेगा। 

तीसरा, कई देशों के साक्ष्यों और अनुभवों से ज्ञात होता है कि पुराने वाहनों को नष्ट करने की नीति से नए वाहनों को खरीद कार्य में कुछ महीने की तेजी अवश्य देखने को मिलती है लेकिन दीर्घकाल में बिक्री में कोई प्रगति नहीं होती है। कंसल्टिंग फर्म मैक्रोइकोनॉमिक एडवाइज़र्स का आंकलन है कि यूएस में वर्ष 2009 में लगभग 250,000 नए वाहनों की बिक्री हुई। कुल हुई इस बिक्री के लगभग आधे वाहनों की बिक्री इस कार्यक्रम के समापन के बाद के महीनों में हुई जबकि बाकी के आधे वाहनों की बिक्री इस कार्यक्रम के दौरान ही हो गई थी। वर्ष 2020 में भारतीय ऑटो इंडस्ट्री बुरी तरह प्रभावित हुई थी और उस समय प्रोत्साहन के इस कदम का स्वागत हुआ होता, लेकिन अब जब बिक्री में फिर से तेजी आने लगी है तब ऑटो इंडस्ट्री को सरकारी खर्चे पर कृत्रिम प्रोत्साहन की कोई आवश्यकता नहीं है।

एक बड़ा मुद्दा प्रदूषण का है। शहरों को उन वाहनों को आवश्यक रूप से प्रतिबंधित कर देना चाहिए जो उत्सर्जन परीक्षण प्रक्रिया में सफल नहीं होते हैं, लेकिन इसका वाहनों की उम्र से कोई लेना देना नहीं होता है। कई वाहन तुलनात्मक रूप से ज्यादा पुराने न होने के बावजूद बुरे रख रखाव के कारण  बहुत अधिक प्रदूषण करते हैं। भारतीय शहरों को यूएस की तरह ही गंभीर संस्थानों की मदद से अपने यहां भी प्रत्येक दूसरे वर्ष सभी वाहनों का प्रदूषण परीक्षण अनिवार्य बना देना चाहिए। इस काम को सरकार के लिए राजस्व प्राप्त करने के स्रोत के तौर पर देखना चाहिए जिससे कि रिश्वतखोरी और फर्जी अनुमति पत्र जारी करने को रोकने के प्रति राजनैतिक प्रोत्साहन में वृद्धि होगी।

कई देशों में उत्सर्जन परीक्षण में असफल रहने वाले वाहनों को आमतौर पर ग्रामीण इलाकों में कम कीमत पर बेच दिया जाता है। इससे उन इलाकों में भी वहन करने की क्षमता और जीवन स्तर को बढ़ावा देने में मदद मिलती है। ग्रामीण क्षेत्रों में हवा तुलनात्मक रूप से स्वच्छ होती है और वह कुछ अतिरिक्त वाहनों के कारण होने वाले प्रदूषण को सहन कर सकती है। ये जरूर है कि इससे कार्बन के उत्सर्जन की कटौती में सहायता नहीं मिलेगी लेकिन इससे शहरी इलाकों के उन हानिकारक प्रदूषकों को दूसरे क्षेत्रों में विस्थापित किया जा सकता है जो मानव स्वास्थ्य को खराब करता है। 

नए वाहन आयातित ईंधन की खपत को कम करेंगे। इलेक्ट्रिक वाहन ऐसा और अधिक करेंगे लेकिन ऐसे वाहनों के परिणाम स्वरूप दिखाई देने वाले प्रभावी बदलावों के लिए इनका व्यापक स्तर पर प्रयुक्त होना जरूरी है, जिसमें एक दशक का वक्त लग सकता है। उम्मीद की एक किरणः यदि पुराने कार ग्रामीण इलाकों में जाते हैं तो वे कुछ हद तक सामानों और लोगों के परिवहन के लिए इस्तेमाल में आने वाले ट्रैक्टरों का स्थानापन्न बन जाएंगे। वे ट्रैक्टर जो अत्यधिक ईंधन की खपत करते हैं और ज्यादा प्रदूषण फैलाते हैं।

ग्रामीण क्षेत्रों में कार्यरत कई गैर सरकारी संगठन धन और परिवहन की अनुपलब्धता के कारण पंगु बने हुए हैं। यूएस में कई लोग पुरानी कारों को उपहार स्वरूप मुक्ति सेवा दल को दे देते हैं। जिनका प्रयोग दल के लोग धर्मार्थ कार्यों के लिए करते हैं अथवा वास्तविक जरूरतमंदों को उपहार के तौर पर दे देते हैं। पुराने वाहनों को नष्ट करने को बढ़ावा देने के लिए सार्वजनिक कोष का प्रयोग की बजाए लोगों को अपने पुराने वाहनों को ग्रामीण इलाकों के गैर सरकारी संगठनों और पंचायतों को बेचने के प्रति प्रोत्साहित करना ज्यादा समझदारी का कार्य है।

जर्मनी में वर्ष 2009 में एक कार्यक्रम की शुरुआत की गई थी जिसका नाम था ‘कैश फॉर क्लंकर्स’। पुराने वाहनों को नष्ट करने के लिए दी जाने वाली सब्सिडी वाले इस कार्यक्रम का उद्देश्य देश में कार उद्योग को पुनर्जीवित करना था। जर्मनी की पुलिस यूनियन ‘द बंड ड्यूट्शर क्रिमिनालबीमसर’ के एक अनुमान के मुताबिक नष्ट करने के लिए स्क्रैप यार्ड्स को बेची गई 50 हजार कारों को गैरकानूनी तरीके से अफ्रीका और पूर्वी यूरोप में बेच दिया गया था। सरकार ने इन वाहनों को नष्ट करने के लिए 125 मिलियन यूरो की भारी भरकम धनराशि खर्च की थी ताकि लोग कम ईंधन की खपत करने वाली नई कारें खरीदें। जर्मनी में पर्यावरण के क्षेत्र में काम करने वाला समूह ड्यूक अम्वेल्थाइफ ने इस योजना के कारण वर्ष के अंत तक कारों के अनैतिक निर्यात की संख्या दोगुनी हो जाने का पूर्वानुमान लगाया था।

पुराने वाहनों को नष्ट करने की बजाए क्यों न लोगों को उन वाहनों को ऐसे देशों (मुख्य रूप से अफ्रीका आदि) को निर्यात करने के लिए प्रोत्साहित किया जाए जहां वाहनों की संख्या अत्यंत कम है और जो सेकेंड हैंड वाहनों को ही खरीदते हैं क्योंकि वे नए वाहनों को खरीदने का खर्च वहन नहीं कर सकते हैं।

आदर्श रूप में सरकार को चाहिए कि वह एक ऐसी योजना चलाकर वाहन निर्माता कंपनियों को प्रोत्साहित करें ताकि वे पुराने वाहनों का नवीनीकरण (रिफर्बिश) करें जो कि उत्सर्जन (प्रदूषण) मानकों को पूरा करते हो और खरीदारों को सीमित अवधि की आश्वस्ति (वारंटी) भी प्रदान करें। इससे भारत में वाहनों के जीवन काल में वृद्धि हो सकेगी और एक गरीब देश में धन की कमी को भी संरक्षित किया जा सकेगा। नवीनीकृत (रिफर्बिश्ड) वारंटीशुदा वाहनों का यूएस में एक बड़ा बाजार है।

ऐसे नवीनीकृत वाहन दूसरे देशों विशेषकर विकासशील देशों में निर्यात के लिए काफी आकर्षक होंगे। इतना ही नहीं अ-नवीनीकृत पुराने वाहनों के निर्यात का भी बड़ा बाजार मौजूद है और जर्मनी के वर्ष 2009 के मामले में यह साबित भी हो चुका है। इससे प्रदूषण का भी कम प्रदूषित देशों को निर्यात हो सकेगा और भारत की समस्या कम होगी। इससे कार्बन के वैश्विक उत्सर्जन की मात्रा में कमी तो नहीं आएगी लेकिन पुराने वाहनों का योगदान इस वैश्विक समस्या में बेहद कम होता है।

स्वामिनॉमिक्स, इंडिया, टीओआइ में एसए अय्यर ( लेखक द इकोनॉमिक टाइम्स के कंसल्टिंग एडिटर हैं)

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स्वामीनाथन अय्यर