जिम्मेदार बजट पर मंदी से जल्द मुक्ति नहीं

वित्तमंत्री ने खतरा न उठाकर संजीदगी दिखाई, संरक्षणवाद को पलटने में नाकाम रहीं

हमारी जैसी मंदी से निपटने के केवल दो ही तरीके हैं। एक उपभोग के जरिए और दूसरा निवेश के माध्यम से। इस बजट में दूसरा तरीका अपनाया गया है और मेरे विचार में यह सही रास्ता है। उपभोग के पहले तरीके में लोगों के हाथों में बैंक ट्रांसफर के माध्यम से पैसा देना पड़ता। वे पैसा खर्च करते, सामान इस्तेमाल करते और मांग को बढ़ाते, जिससे फैक्टरियां चलतीं और अधिक नौकरियां आतीं, जिससे और खर्च बढ़ता। इस चक्र के चलने से अर्थव्यवस्था में गति आ जाती। 

निवेश के दूसरे तरीके में निवेश से नौकरियां आती हैं। नौकरियों से लोगों के हाथों में धन आता है और यह चक्र जारी रहने से हम मंदी से बाहर निकल जाते हैं। मैं दूसरे तरीके को इसलिए प्राथमिकता देता हूं, क्योंकि इससे परिसंपत्तियां बनती हैं। यह बजट सड़क, पेयजल के लिए पाइपलाइन, जलमार्ग, हाउसिंग और अस्पतालों जैसे इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्टों में कुल 103 लाख करोड़ के निवेश का वादा करता है।

बड़ा मौका गंवा दिया वित्तमंत्री ने

वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण ने यह स्वीकार करते हुए कि देश की अर्थव्यवस्था गंभीर संकट में थी, जब यह समझाया कि उन्होंने इससे निकलने के लिए किस तरह से योजना बनाई, एक तरह से खुद पर ही अहसान किया। उन्होंने बजट में अनेक रोजगार पैदा करने वाली पहल की है। अगर उन्होंने इन प्रयासों से आने वाले सीधे व परोक्ष रोजगारों की अनुमानित गणना करके बताया होता तो शायद हमें अधिक खुशी होती। यद्यपि, बजट केवल सुधारों की घोषणा का मौका नहीं है, सीतारमण ने एक बड़े मौके को गंवा दिया। सुधार तब ठीक तरीके से लागू होते हैं, जब संकट होता है। लोग सुधार करने वाली अल्पकालिक मुश्किलों को स्वीकार करते हैं। 

उदाहरण के लिए, उन्होंने हमें एक प्रमुख कृषि सुधार की याद दिलाई, जिससे किसानों की जमीन को लंबे पट्टे पर से उत्पादकता नाटकीय रूप से बढ़ेगी। केंद्र तो इस पर काफी समय से जोर दे रहा है, लेकिन राज्यों की सरकारें इसका जवाब देने में धीमी रहीं। हम इस प्रमुख सुधार को धरातल पर आने के लिए केंद्र की ओर से दिए जाने वाले प्रलोभन व प्रताड़ना के प्रस्तावों का इंतजार कर रहे थे। अगर उन्होंने भूमि और श्रम को लेकर उन चर्चित सुधारों की घोषणा कर दी होती, जिनमें भाजपा विश्वास करती है तो इसने पूरे देश को उत्साह से भर दिया होता।

यह रही मेरी सबसे बड़ी निराशा

इस बजट से मेरी सबसे बड़ी निराशा यह रही कि यह संरक्षणवाद को पलटने की घोषणा करने और आयात के विकल्प को तलाशने के बेकार विचार को नकारने में विफल रहा। आर्थिक सर्वेक्षण ने एक निर्यातोन्मुख बजट को लेकर बड़ी उम्मीदें पैदा कर दी थीं। इसमें भारत के वैश्विक वैल्यू चेन में शामिल होने की महत्ता को स्वीकार करते हुए सुझाव दिया गया था कि मेक इन इंडिया को नया रूप देकर उसे असेंबल इस इंडिया यानी दुनिया के लिए भारत में बना कहा जाना चाहिए। 

ऐसी पहल को बढ़ाने का यह सही समय है, क्योंकि इस समय वैश्विक चेन नए सिरे से निर्धारित हो रही है, जिसने चीन को परेशानी में डाला हुआ है। हरेक को उम्मीद थी कि बजट में शुल्क में कमी की जाएगी, लेकिन इसके उलट ये कई सामानों पर बढ़ गई। याद रखें कि इतिहास में कोई भी देश सिर्फ घरेलू बाजार के भरोसे रहकर संपन्न नहीं बन सका। निर्यात इस सरकार की सबसे बड़ी आर्थिक विफलता रही है और रोजगार के मोर्चे पर सरकार के खराब प्रदर्शन की यह एक आंशिक वजह भी रही है। पिछले सात सालों में जहां भारत का निर्यात लगभग स्थिर रहा है वहीं वियतनाम का निर्यात इसी अवधि में 300 प्रतिशत बढ़ा है।

इसके बावजूद यह दूरदर्शी और वास्तविकता वाला बजट

बजट 2020 से तत्काल व जल्द ही कोई असर नहीं आएगा। हालांकि, यह एक दूरदर्शी और यथार्थवादी बजट है। कोई बड़ा प्रोत्साहन देने के लिए शायद ही राजकोषीय गुंजाइश थी। वित्तमंत्री ने किसी भी तरह का खतरा न उठाकर संजीदगी का ही परिचय दिया। 2008 के वित्तीय संकट के समय जिस तरह उत्तेजना में हमने जो जोखिम उठाए थे, उनका बाद में गंभीर  असर रहा था। कुल मिलाकर वित्तमंत्री ने खर्च को नियंत्रण में रखकर और नॉमिनल जीडीपी में एक नरम 10 फीसदी की बढ़ोतरी का प्रस्ताव करके दूरदर्शिता दिखाई।
अपनी बात को खत्म करने से पहले मैं इस बजट के कुछ खास बिंदुओं की ओर ध्यान लाना चाहूंगाः

1. यह प्रतिबद्धता कि सीवर की हाथों से सफाई न हो इसे सुनिश्चित करेंगे
2. कंपनीज एक्ट में संशोधन करके ऐसे कई अपराधों को गैरआपराधिक बनाएंगे, जिनकी वजह से सरकार ने व्यापारी वर्ग का भरोसा खोया
3. एक करदाता चार्टर बनाएंगे, जो सरकार को बाध्य करेगा कि वह किसी करदाता को प्रताड़ित न कर सके।
अगर मोदी सरकार इसे हासिल कर सकी तो यह कोई छोटी जीत नहीं होगी।

- गुरचरण दास  (प्रॉक्टर एंड गैम्बल इंडिया के पूर्व सीईओ और 'इंडिया अनबाउंड' के लेखक हैं))
साभारः दैनिक भास्कर
फोटो साभारः स्वराज्य मैगजीन

गुरचरण दास