क्या सरकार के इशारों पर चलेंगे विश्वविद्यालय

26 मई 2014 को केंद्र में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली बीजेपी सरकार के गठन के बाद कुछ खतरनाक विकास सामने आए हैं। पहली घटना 4 जून 2014 को 'शिक्षा बचाओ आंदोलन समिति' के दीनानाथ बत्रा द्वारा ओरिएंट ब्लैकस्वान पब्लिशर को एक लीगल नोटिस जारी करवाने से शुरू हुई। बत्रा कथित तौर पर राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ से जुड़े हैं। इसके चलते पब्लिशर को 'कम्युनलिज्म एंड सेक्सुअल वायलेंस : अहमदाबाद सिन्स 1969' नामक पुस्तक को 'मूल्यांकन' के लिए रखना पड़ा जबकि यह पुस्तक पहले ही बाजार में बिकने के लिए भेजी जा चुकी है। इस घटनाक्रम से इस पुस्तक की लेखिका डॉ. मेघा कुमार इतनी असंतुष्ट हुईं कि उन्होंने कहा, 'भारत में नए चुनावी बदलाव को देखते हुए एक अकेडमीशियन के रूप में मेरे लिए और बड़े पैमाने पर सामाजिक विज्ञान और मानविकी के लिए यह काफी दुखद है।'
 
दूसरी घटना दिल्ली विश्वविद्यालय के बीजेपी से जुड़े शिक्षक और छात्र संगठनों द्वारा विश्वविद्यालय की स्वायत्तता पर हमले की साजिश से जुड़ी है। 30 मई 2014 को अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद और एनडीटीएफ (नैशनल डेमोक्रैटिक टीचर्स फ्रंट) दोनों के प्रतिनिधि मानव संसाधन विकास मंत्री स्मृति इरानी से मिले और उन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय के चार वर्षीय प्रोग्राम को समाप्त करने के लिए विश्वविद्यालय की स्वायत्तता में हस्तक्षेप की मांग की। यह नया पाठ्यक्रम पिछले वर्ष ही शुरू किया गया है। इसके विरोधियों के पथप्रदर्शक संघ परिवार, एनडीटीएफ, एबीवीपी और संघ परिवार से जुड़े और इंडियन पॉलिसी फाउंडेशन से संबद्ध अकेडमीशियन डॉ. राकेश सिन्हा हैं। सभी विरोधी केंद्र में बीजेपी सरकार आने के बाद सक्रिय हो गए हैं।
 
ताजा स्थिति यह है कि सरकार के इशारे पर यूजीसी ने दिल्ली विश्वविद्यालय के सारे कॉलेजों को साफ शब्दों में धमकाते हुए कहा है कि वे या तो चार वर्षीय डिग्री कोर्स की व्यवस्था को समाप्त करें या फिर कड़़े कदमों के लिए तैयार हो जाएं। सारे संकेत यही बताते हैं कि कड़े कदम का मतलब है कॉलेज को मिलने वाले फंड पर रोक।
 
गौरतलब है कि दिल्ली विश्वविद्यालय की स्थापना संसद के एक विधान के जरिए हुई है, जो विश्वविद्यालय को पूरी स्वायत्तता देता है। अपने निर्णयों के लिए इस विश्वविद्यालय के पास कार्यकारिणी समिति, शैक्षणिक समिति और अध्ययन परिषद (बोर्ड ऑफ स्टडीज) हैं। इनको ध्यान में रखते हुए विश्वविद्यालय को किसी भी प्रोग्राम के निर्माण और संचालन से जुड़े बहुत से अधिकार दिए गए हैं। उदाहरण के तौर पर विश्वविद्यालय अपनी समितियों और परिषदों आदि के द्वारा पाठ्यक्रम का निर्धारण कर सकता है। इसके अलावा वह शिक्षण की प्रविधि एवं मूल्यांकन की व्यवस्था के साथ-साथ किसी भी पाठ्यक्रम की अवधि का भी निर्धारण कर सकता है।
 
किसी भी विश्वविद्यालय में अकादमिक मुद्दों पर नीति-निर्धारण की बुनियादी जरूरत शिक्षक समुदाय की पूर्ण भागीदारी है। ध्यान देने वाली बात यह भी है कि दिल्ली विश्वविद्यालय का चार वर्षीय पाठ्यक्रम (एफवाइयूपी) शिक्षक समुदाय और निर्णायक घटकों की पूरी सहमति के बाद बना है। इसलिए कानूनी प्रक्रिया के उल्लंघन का तो कोई आरोप ही नहीं बनता। ऐसे में यूजीसी का शक्ति प्रदर्शन शक्तियों के बंटवारे के सिद्धांत का उल्लंघन दर्शाता है, जिसमें एक स्वायत्त संस्थान को एक बाहरी ताकत के असहनीय दबाव का सामना करना पड़ रहा है। 
 
दिल्ली विश्वविद्यालय के शिक्षकों, छात्रों या उनके किसी संगठन द्वारा किसी भी बाहरी ताकत से विश्वविद्यालय की स्वायत्तता में हस्तक्षेप कराना बहुत खतरनाक साबित हो सकता है। यदि शिक्षक स्वयं अपनी स्वायत्तता के लिए नहीं खड़े होंगे तो मंत्री विश्वविद्यालय को नौकरशाही के जरिए उसी तरह चलाएंगे, जैसे उनके विभाग चलते हैं। ऐसे में पाठ्यक्रम का निर्धारण विश्वविद्यालय की अपनी व्यवस्था के अनुरूप न होकर केंद्र सरकार के निर्देशों के अनुरूप होगा। 
 
यह याद रखा जाना चाहिए कि शिक्षण की संरचना में बदलाव के लिए विश्वविद्यालय के भीतर भी बहुतेरी व्यवस्थाएं मौजूद हैं। असहमति और विरोध विश्वविद्यालय व्यवस्था की आत्मा हैं। विश्वविद्यालय प्रबंधन के किसी फैसले से असंतुष्ट शिक्षक या छात्र संगठनों को किसी राजनीतिक दल का दरवाजा खटखटाने के बदले इन व्यवस्थाओं का इस्तेमाल करने के बारे में सोचना चाहिए।
 
दूसरे शब्दों में, विश्वविद्यालय की स्वायत्तता की रक्षा हर सूरत में की जानी चाहिए। यदि ज्ञान का ढांचा बनाए रखना है तो उसे स्वायत्तता देना आवश्यक है। यह समझना भी जरूरी है कि केंद्र का स्वायत्तता में हस्तक्षेप केवल दिल्ली विश्वविद्यालय तक ही सीमित नहीं रहेगा। केंद्र की मोदी सरकार अगर दिल्ली विश्वविद्यालय में अपनी मनमानी चलाने में कामयाब हो जाएगी तो इससे सभी नए-पुराने विश्वविद्यालयों में उसके हस्तक्षेप का रास्ता खुल जाएगा। 
 
 
- सी. पी. भांबरी
साभारः नवभारत टाइम्स