जश्न नहीं आत्ममंथन का समय है

हमारी संसद के साठ साल पूरे हो गये हैं। इतने वर्ष के सफर में एक तरफ देश में लोकतंत्र मजबूत हुआ है तो दूसरी तरफ उसके सभी उपकरण अपने अंर्तकलह से कमजोर हुए हैं। संसदीय लोकतंत्र की राजनीतिक प्रणाली दलीय प्रणाली पर चलती है जो हमारे देश में छिन्न भिन्न हो गई है। सत्तारूढ़ कांग्रेस पार्टी में जवाहरलाल नेहरू के रहते हुए एक लंबी बहस की परंपरा डाली गई थी। संसदीय व्यवस्था में नेहरू के समय में प्रधानमंत्री, पक्ष, विपक्ष सभी बहस करते थे। उनके बाद इंदिरा जी ने ये परंपराएं रोक दीं। अब तो कांग्रेस भी लोकतांत्रिक पार्टी नहीं रह गई है। आज विपक्षी पार्टियां भी यूपीए का ही अनुगमन कर रही हैं। एक समय था जब संसद में नेहरू जी का जवाब देने के लिए श्यामा प्रसाद मुखर्जी थे। आगे उनकी कमी को सीपीआई के प्रो हीरेन मुखर्जी ने पूरा किया। तब सीपीआई या विपक्ष की संख्या कम थी फिर भी वे सरकार को दो टांगों पर खड़ा होने को मजबूर कर देते थे। सोशलिस्ट पार्टी के नाथपाई और हरि विष्णु कामत सहित थोड़े से लोग विपक्ष में थे जिन पर पूरे देश का ध्यान लगा रहता था कि उनके प्रश्नों के उत्तर में नेहरू क्या बोल रहे हैं।

संसद में 13 अगस्त, 1963 कई मायने से एतिहासिक दिन था जब डा. राम मनोहर लोहिया फरुर्खाबाद लोकसभा उपचुनाव में जीत कर पहले दिन लोकसभा पहुंचे। संसद के बाहर ही उनकी छवि ऐसे विपक्षी नेता की थी कि सभी 448 सांसद उनके पहुंचने पर खड़े हो गये। लोकसभा के इतिहास में ऐसा दृश्य कम ही दिखा। उसी दिन दीनू मसानी (बड़ौदा से) और आचार्य जेबी कृपलानी (अमरोहा से) ने भी शपथ ली। उन तीन लोगों की जीत के बाद नेहरू जी इतने चिंतित हुए कि कामराज योजना सामने आई। के कामराज की पहल पर राज्यों के मुख्यमंत्रियों, केन्द्रिय मंत्रियों और अन्य मंत्रियों सहित तीन सौ लोगों ने इस्तीफा दिया। नेहरू ने मात्र 6 लोगों के इस्तीफे स्वीकार किये। कहना यह है कि तब संसद में जन भावना का प्रगतिकरण होता था। आज 10-15 चुनाव हारने के बाद भी कांग्रेस पार्टी नेतृत्व के पास कोई योजना नहीं है।  

आज सांसदों को जनता की परवाह नहीं है। उस समय संसद के पहले ही दिन आचार्य कृपलानी ने नेहरू सरकार के खिलाफ अविस्वास प्रस्ताव पेश किया था जबकि उन दोनों की वर्षों से गहरी मित्रता थी। उस प्रस्ताव पर हुए बहस में बोलते हुए डा. लोहिया ने गरीबी-अमीरी की खाई पर ऐसा भाषण दिया कि नेहरू जी को भी निरूत्तर होना पड़़ा। आज उसके विपरीत 10-12 सांसदों के भरोसे चलने वाली केन्द्र में सरकार है। विपक्ष चाहे तो सरकार गिरा दे लेकिन पक्ष और विपक्ष दोनों की नीतियों में समानता होने के कारण दोनों ही भ्रष्टाचार, अपराधीकरण, महंगाई से विमुख होकर अपनी ही दुनिया में सिमटे हैं और जनता से बेपरवाह हैं।

साठ साल का जश्न वास्तव में रस्म अदायगी है। अगर ऐसा न होता तो जश्न मनाने वालों से यह पूछना चाहिए कि 1997 में मनाये गये आजादी की 50 वीं वर्षगांठ (स्वर्ण जयंती) में लिए गये उन संकल्पों का क्या हुआ जो पूरी संसद ने लिया था। तब पीए संगमा स्पीकर और आईके गुजराल प्रधानमंत्री थे। उस समय अब तक का सबसे बड़ा पंचदिवसीय विशेष अधिवेशन बुलाया गया था। दिन तो पांच ही थे लेकिन रात-रात भर बहस चली। लगभग नब्बे फीसदी सदस्यों ने बहस में हिस्सा लिया जिसमें 277 संसद सदस्यों ने तो सदन में खड़े होकर बोला और जो नहीं बोल पाये वे स्पीकर से अनुमति लेकर लिखकर भाषण दिये। विपक्ष के नेता अटल बिहरी वाजपेयी ने सदन में एक संकल्प रखा कि आज जितनी भी पार्टियां हैं वे राजनीतिक अपराधीकरण, भ्रष्टाचार, संसद में घटती हुई बहस, स्थगन जैसे सवालों पर यह संकल्प लें कि आगे से ऐसा नहीं होगा। सभी पार्टियों ने यह निर्णय लिया कि आगे से वे संसद की मर्यादा को आगे बनाये रखेंगे।

इसलिए यह जरूरी है कि साठ साल का जश्न मनाने से पहले यह सोचा जाय कि 50 वें साल के संकल्पों का क्या होगा। आवश्यकता है कि एक विशेष कार्यबल गठित करके उसके गुनाहगारों की पहचान की जाय। क्योंकि उन संकल्पों के विपरीत अब संसद में नई प्रवृत्ति आ गई है। संसदीय कार्यवाही का स्थगन आम बात है। अब लोकसभा लोगों की समस्याओं पर बहस के लिए नहीं रही है। लोकसभा की शुरुआत ही प्रश्न काल से होती है, जहां सत्ता व विपक्ष का भेद मिट जाता है। यह जनप्रतिनिधि और सरकार के जवाबदेही का काल होता है। लेकिन दुर्भाग्य है कि विगत वर्षों में संसद में पैसे लेकर सवाल पूछने के लिए ग्यारह सदस्यों की सदस्यता गई। एक सांसद तो कबूतरबाजी में भी पकड़े गये। एक समय था जब 1951 के अस्थाई संसद में मुंबई से चुनकर आये हुए सांसद एचवी मुद्गल को बुलियन एसोसिएशन में मात्र 2700 रुपये की दलाली के आरोप में संसद से निष्कासित कर दिया गया। लोकसभा के तत्कालीन स्पीकर जीवी मावलंकर ने जांच करवाई जिसमें आरोप सही पाये गये। मैनें वह जांच रिपोर्ट पढ़ी है, उसमें 2700 रुपये का जिक्र नहीं है। मुद्गल ने अपना नाम बचाने के लिए पहले ही इस्तीफा दिया लेकिन तत्कालीन प्रधानमंत्री नेहरू जी और स्पीकर ने यह पहले ही सुनिश्चित कर दिया कि मुद्गल को पहले निकाला जाएगा। यह उस समय के प्रधानमंत्री और संसद सदस्यों के ऊंची मर्यादा का सशक्त उदाहरण है। जबकि आज अधिकांश जनप्रतिनिधियों के व्वहार में कदाचार दिखता है, तो उसका जश्न कैसा? आज की संसद में कदाचार पर भी पार्टी लाइन का पालन करते हुए बचाव किया जाता है। अपराधीकरण के मामले में 1997 के संकल्पों के विपरीत आज संसद में अपराधियों की संख्या भी बढ़ी है।

पिछले साठ सालों के संसदीय यात्रा के बाद हमारे देश में लोकतांत्रिक चेतना बढ़ी है। जो कि हमारे स्वभाव में भी पहले से है। परन्तु लोकतंत्र के उपकरणों में जंग लग गई है। लेकिन यह भी सत्य है कि जो लोकतांत्रिक चेतना बढ़ी है, वह जब प्रबल होगी तो जंग लगे उपकरणों को बदल कर रख देगी। शुरुआती दौर में तमाम बुद्धिजीवी भविष्यवाणी करते थे कि भारत में संसदीय प्रणाली सफल नहीं होगी। ऐसे लोगों को जनता ने झूठा साबित कर दिया। एक तरफ दुनिया भर में भारत ने ही अपने लोकतंत्र को मजबूत किया है तो दूसरी तरफ उसके उपकरणों में गिरावट आई है। जिसके लिए राजनीतिक नेतृत्व जिम्मेदार हैं। इन दिनों अपनी नाकामी को ढकने के लिए कुछ लोग संसदीय प्रणाली पर ही सवाल उठाने लगे हैं और दो दलीय तथा जनता द्वारा प्रधानमंत्री चुनने जैसे सुझाव देने लगे हैं। वे यह भूल रहे हैं कि वर्तमान व्यवस्था बनाते समय अरविन्दो ने राष्ट्रपति प्रणाली की हिमाकत की थी जिसे सर्वसम्मत से अस्वीकार कर दिया गया था। अगर पीएम सीधे चुना जाएगा तो वह प्रधानमंत्री प्रणाली हो जाएगी। जबकि हमारे यहां संसदीय प्रणाली में सांसद पीएम चुनते हैं और वह अपनी टीम बनाता है। हमारे लिखित संविधान में राष्ट्रपति को सर्वोच्च अधिकार दिया गया है लेकिन पीएम उसकी ओर से उसका इस्तेमाल करता है। साफ है कि नकारेपन से मुंह छिपाने के लिए नई व्यवस्थाओं की बात कही जा रही है। लोकपाल की मांग भी इसी का उदाहरण है।

हाल में हुए जनांदोलनों में जो जनता का समर्थन दिखा वह लोकतंत्र के उपकरणों को बदलने की कुलबुलाहट का नतीजा था। यह अलग बात है कि आंदोलन को चला रहे लोगों ने जनता के लक्ष्य को नहीं पहचाना। बरसात अगर मैदान में हो तो धारा बनकर नदी बन जाती है। वहीं पहाड़ में बारिश का पानी बिखर जाता है, नदी नहीं बनती। हमारे देश में लोकतंत्र की बरसात हो रही है और नदी भी बनेगी। यह समय देश के राजनीतिक दलों के चिंतन का है। सौ-पचास वर्षों से चले आ रहे दलों को सुधरना ही होगा। संसदीय प्रणाली में राजनीतिक दलों का ठीक होना अनिवार्य है। अगर ऐसा नहीं होगा तो जनतांत्रिक चेतना अपना काम करेगी और जंग लगे लोकतांत्रिक उपकरणों से अपने से ही मुक्ति पा लेगी।

साभार - राष्ट्रीय सहारा
प्रस्तुतिः मुकेश मिश्रा