उद्देश्यों से भटकती शिक्षा प्रणाली

वर्तमान शिक्षा प्रणाली पर कटाक्ष करती कुछ साल पहले प्रदर्शित हुई बालीवुड की चर्चित फिल्म ‘थ्री ईडीयट्स’में अभिनेता आमीर खान (रणछोड़ दास चांचड़ उर्फ रैंचो) का एक डायलॉग काफी सराहा गया था जिसमें जीवन रूपी ब्लैकबोर्ड पर दिखने वाले सभी प्रश्नों के जवाब सिर्फ किताबों में ढूंढने को गलत बताने की कोशिश की गई थी। बात को सिद्ध करने के उद्देश्य से रैंचो ब्लैकबोर्ड पर दो पदार्थों का नाम लिखता है और प्रो. वीरू सहस्त्रबुद्धे सहित सभी छात्रों से उसके बारे में पूछता है। जवाब जानने के लिए रैंचो लोगों को पांच मिनट का समय और साथ ही पुस्तक की सहायता लेने की अनुमति देता है। हालांकि प्रो. सहस्त्रबुद्धे (उर्फ वायरस) सहित कोई भी इस प्रश्न का जवाब नहीं दे पाता। बाद में रैंचो खुलासा करता है कि ब्लैकबोर्ड पर लिखे पदार्थों का नाम उसके दो दोस्तों राजू व फरहान के नाम से प्रेरित हैं और “राजूफिकेशन”व “फरहानिमेट”नाम का कोई पदार्थ दरअसल होता ही नहीं।

फिल्म में हल्केफुल्के ढंग से दिए गए शिक्षा के उद्देश्य सम्बंधी संदेश में नया कुछ भी नहीं। दरअसल, शिक्षा का मूल उद्देश्य ही नित नए ज्ञान को अर्जित कर स्वयं व समाज के हितार्थ प्रयोग करना है। हालांकि वर्तमान में शिक्षा का उद्देश्य संकुचित होकर ऐण केण प्रकारेण (किसी प्रकार से) एक अच्छी सी (उंचे वेतन वाली) नौकरी पा लेने तक ही सीमित होकर रह गया है। इस किताबी ज्ञान के जंजाल में मानवीय संवेदना कहीं गुम सी होकर रह गई है। आज शिक्षा की सबसे बड़ी चुनौती है, उसका जीवनोन्मुखी न होकर परीक्षोन्मुखी होना। सभी का सारा जोर परीक्षा पास करने या परीक्षा में अधिकाधिक अंक प्राप्त करने में है। शिक्षक शिक्षण इस तरीके से करते हैं, जिससे बच्चे परीक्षा में अधिक से अधिक अंक प्राप्त कर सकें।

यही चाह अभिभावकों की भी रहती है। बच्चे तो फिर बच्चे हैं, अध्यापकों और अभिभावकों की महत्वाकांक्षाओं के हाथों कैद। परीक्षा ने बच्चों को महज किताबी कीड़ाबना दिया है। जीवन के लिए शिक्षा एक मुहावरा मात्र बन कर रह गया है। ज्ञान की दो दुनिया बना दी गई हैं। एक, स्कूली ज्ञान और दूसरा,बाहरी जीवन का ज्ञान। ऐसा वातावरण तैयार कर दिया गया है, जैसे कि स्कूल का ज्ञान बाहरी जीवन के ज्ञान से श्रेष्ठ और अलग है। जीवन की सफलता-असफलता स्कूली ज्ञान से ही निर्धारित होती है तथा स्कूली ज्ञान परीक्षा से नियंत्रित होता है। बच्चों के पास खेलने का समय ही नहीं है। उनकी जिंदगी तो यूनिट टेस्ट, वार्षिक, बोर्ड परीक्षा और अन्य अनगिनत प्रतियोगी परीक्षाओं से नियंत्रित रहती है।

ऐसा प्रतीत होता है जैसे जीवन प्रतियोगिता के लिए ही बना है। बस दौड़ते रहे हो कहीं कोई दूसरा आपसे आगे नहीं निकल जाए। साथ-साथ आगे बढ़ने की तो कहीं कोई बात ही नहीं। बच्चे का परीक्षाओं में प्रदर्शन मां-बाप से मिलने वाले प्यार की कसौटी बन गया है। परीक्षा का इतना महत्वपूर्ण होना शिक्षा का नौकरी के हित होने से जुड़ा है। जहां से यह सोच विकसित हुई कि शिक्षा इसलिए प्राप्त की जाए ताकि पढ़-लिखकर आने वाले समय में अच्छी नौकरी मिल सके। वहीं से शिक्षा का उद्देश्य संकुचित हो गया। अच्छी नौकरी का मतलब भी ऐसी नौकरी से है,जिसमें वेतन ऊंचा हो और शारीरिक श्रम कम से कम। यह ठीक है कि शिक्षा रोजगार का जरिया बने, पर शिक्षा केवल रोजगार के लिए हो यह बातठीक नहीं। आज बाजार अलग-अलग गुणवत्ता वाली शिक्षा को लेकर उपस्थित हो रहा है। कम पैसे वालों के लिए अलग शिक्षा है और अधिक पैसों वालों के लिए अलग तरह की। बाजार में बिक रही शिक्षा का मूल्यों से कुछ लेना-देना नहीं है। बाजार सोचने-समझने वाला संवेदनशील मानव नहीं चाहता। ऐसा मानव उसके किसी काम का नहीं। इसलिए आज की शिक्षा एक कुशल डॉक्टर, इंजीनियर, प्रबंधक या प्रशासक तो तैयार कर रही है,पर उसे एक संवेदनशील इंसान नहीं बना रही है। क्या शिक्षा का वास्तवित उद्देश्य यही है?

- अविनाश चंद्र