कायदे-कायदे की बात

2जी स्पेक्ट्रम घोटाले के चक्कर में पंद्रह महीने जेल में बिताकर लौटे पूर्व दूरसंचार मंत्री ए राजा कुछ हफ्ते पूर्व जब चेन्नई पहुंचे तो उनका जोरदार स्वागत किया गया। उन्मादी भीड़ उस शख्स के लिए आतिशबाजी कर रही थी, जो तमिलनाडु चुनाव में अपनी पार्टी की हार के लिए काफी हद तक जिम्मेदार था। जिसने दुनिया की नजरों में भारत की छवि खराब कर दी और केंद्र सरकार को झुकने के लिए मजबूर कर दिया। इसके अगले ही हफ्ते राजा जब अपने निर्वाचन क्षेत्र नीलगिरिस व गृहनगर पेरंबलूर पहुंचे तो उनका और भी जबरदस्त स्वागत किया गया। अपने देश और अपनी पार्टी को इतना अधिक नुकसान पहुंचाने पर उन्हें दंडित करने के बजाए करुणानीधि परिवार के प्रति वफादारी निभाने के लिए द्रमुक समर्थकों द्वारा सिर आंखों पर बैठाया गया।

बीते हफ्ते हमें पता चला कि राहुल गांधी का जल्द ही प्रमोशन होगा, ताकि वे सरकार व पार्टी में ज्यादा बड़ी भूमिका निभा सकें। यह तब है जबकि कुछ समय पूर्व ही उनकी पार्टी को उनके नेतृत्व में यूपी चुनाव में करारी पराजय झेलनी पड़ी। लेकिन यहां भी दोषी ठहराने के बजाए उन्हें पुरस्कृत किया जा रहा है और वह प्रधानमंत्री पद के दावेदार बने रहेंगे। इसके लिए काफी हद तक गांधी नेहरू परिवार के प्रति चमचागिरी की वह प्रवृति भी जिम्मेदार है, जो कांग्रेस पार्टी में कीसी भी अन्य राजनेता (युवा या बुजुर्ग) को इसके युवराज की चमक फीकी करने की इजाजत नहीं देती। यहां भी एक विशिष्ट परिवार व पार्टी के प्रति निष्ठा को देश के लिए किए गए प्रदर्शन से ज्यादा अहम माना जाता है।

हम इस तथ्य को सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश जस्टीस बीआर कृष्णा अय्यर द्वारा वर्ष 1975 में दिए गए एक फैसले के आधार पर समझ सकते हैं, जिसमें उन्होंने “कानून के कायदों” और “जीवन के कायदों” में अंतर स्थापित करते हुए एक विशेष धर्म के प्रत्याशी के चुनाव को वैध ठहराया था। उस प्रत्याशी के चुनाव को इस आधार पर कोर्ट में चुनौती दी गई थी कि उसने मतदाताओं से यह कहते हुए अपने पक्ष में वोट डालने की अपील की कि उसकी मां उसके धर्म की थी। यह एक साम्प्रदायिक अपील थी, जो जनप्रतिनिधि कानून के बिल्कुल उलट थी। लेकिन अदालत ने अपने फैसले में कहा कि “जीवन के कायदे” स्वधर्म की तरह है, जिसमें अपने परिवार, अपनी जाति और समुदाय के प्रति कर्तव्यों की बात होत है। दूसरी ओर “कानून के कायदे” साधारण ध्रम के समान हैं, जहां धर्मशास्त्रों के मुताबिक तमाम इंसानों द्वारा उच्च मूल्यों (जैसे सत्य, अहिंसा इत्यादि) का पालन करने की बात कही जाती है। ये उच्च मूल्य हमारे संविधान के आदर्शों को भी दर्शाते हैं। ए राजा और राहुल गांधी के समर्थकों का बर्ताव स्वधर्म की मिसाल है, जो अक्सर भाई-भतीजावाद और भ्रष्टाचार को बढ़ावा देता है।

आज देश के विभिन्न राजनीतिक दलों में रिश्तेदारों और संगी-साथियों की भरमार है। वर्ष 2009 में भारत के तकरीबन एक तिहाई सांसदों (राज्यसभा व लोकसभा) का वंशानुगत संबंध था। हालांकि कई ऐसे भी थे जो यहां अपनी योग्यता के बल पर पहुंचे थे। अकाली दल के नेता प्रकाश सिंह बादल के सुपुत्र सुखबीर सिंह बादल फरवरी 2012 में पंजाब में अपनी सत्ता बरकरार रखने के बाद कहा था मैं राजनीतिक खानदान से हूं और यह एक बड़ा प्लस प्वाइंट है लेकिन भरोसा विरासत में नहीं मिलता। यदि मैं अच्छा काम करूंगा तो लोग अगली बार मुझे सत्ता से बेदखल कर देंगे। ऐसे में विरासत व वंश के फर्क को समझना जरूरी है। विरासत के जरिए आपको लोकतंत्र में अच्छी शुरुआत तो मिल सकती है लेकिन उसके बाद आपको खुद ही आगे बढ़ना होगा।

गुरचरन दास (लेखक जाने माने अर्थशास्त्री और स्तंभकार हैं)

गुरचरण दास