मनरेगा में 200 दिन नहीं होंगे हितकर

मनरेगा (MGNREGA) के अंतर्गत 100 श्रमिक दिवसों को बढ़ा कर 200 दिवस करने की कई दिनों से बात चल रही है. भारत के अति निर्धनों की आय का स्त्रोत बनी इस विवादित स्कीम के अंतर्गत दिन बढाने का प्रस्ताव सुनने में तो लोक कल्याणकारी लगता है पर इस का बहुत गंभीर आंकलन करने की आवश्यकता है. हमें ध्यान देना होगा की अति निर्धन को आय की गारंटी पहुचाने वाली ये स्कीम कहीं स्थायी रोज़गार गारंटी स्कीम के रूप में ना तब्दील हो जाए. यदि ऐसा होता है तो आर्थिक सुधार के पथ पर चल रहे हमारे देश के लिए ये एक पीछे जाने वाला कदम होगा.

सरकार की यह योजना इस मान्यता पर आधारित थी कि विकास में तेजी लाने के साथ ही विकास के लाभ को उन लोगों तक पहुंचाना जो अभी तक इससे वंचित हैं। यह योजना प्रत्येक ग्रामीण परिवार के कम से कम एक सदस्य को वर्ष में 100 दिनों का रोजगार प्राप्त करने का कानूनी अधिकार देती है। यह योजना अकुशल श्रम की गारंटी देती है तथा इसके लिए वैधानिक न्यूनतम मजदूरी का भुगतान किया जाता है। इस योजना के तहत कोई भी इच्छुक व्यक्ति अपना पंजीकरण करा सकता है, और पंजीकरण के 15 दिनों के अंदर रोजगार नहीं दिये जाने पर निर्धारित दर से बेरोजगारी भत्ता सरकार द्वारा प्रदान किये जाने का प्रावधान है। कार्य सामान्यत: गांव के 5 कि.मी. क्षेत्र के भीतर उपलब्ध कराया जाएगा अन्यथा 10 प्रतिशत अतिरिक्त मजदूरी देय होगी। ग्राम पंचायत सत्यापन के बाद परिवार को जॉब कार्ड जारी करती है जो कि नि:शुल्क दिया जाता है।

MGNREGA ग्रामीण विकास और रोजगार के दोहरे लक्ष्य की तरफ केन्द्रित है. MGNREGA यह उल्लेख करता है कि कार्य को ग्रामीण विकास गतिविधियों के एक विशिष्ट सेट की ओर उन्मुख होना चाहिए जैसे: जल संरक्षण और संचयन, वनीकरण, ग्रामीण संपर्क-तंत्र, बाढ़ नियंत्रण और सुरक्षा जिसमें शामिल है तटबंधों का निर्माण और मरम्मत, नए टैंक/तालाबों की खुदाई, रिसाव टैंक और छोटे बांधों के निर्माण आदि. कार्यरत लोगों को भूमि समतल, वृक्षारोपण जैसे कार्य प्रदान किये जाते हैं.

आन्ध्र प्रदेश के अंनतपुर जिले से शुरु हुई मनरेगा योजना अपनी शुरुआती चरण में देश के 200 जिलों से शुरु हुई थी। परन्तु योजना की सफलता को देखते हुए अप्रैल 2008 से देश के बाकी जिलों को भी नरेगा से जोड़ दिया गया। सरकार ने वित्त वर्ष 2010-11 में इस  राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना के लिए 40,100 करोड़ रुपए का प्रावधान किया है।

सरकार प्रत्येक वर्ष नरेगा पर करोड़ों रुपया व्यय कर रही है, ताकि देश में मौजूद गरीबी और बेरोजगारी की दर को कम किया जा सके और सभी को दो वक्त की रोटी आसानी से मुहैया कराया जा सके। लोग भूखे ना मरें और सब को दो जून रोटी मुहैया  कराने तक तो तो ये स्कीम सुसंगत लगती है लेकिन यदि एक साल के अन्दर 200 दिन हम उनको रोज़गार सुनिश्चित करा देंगे तो हम सिर्फ एक ऐसे वर्ग को जन्म देंगे जो पूरी तरह से सरकार पर निर्भर रहेगा. कुछ नया करने की ऊर्जा और प्रोत्साहन उनके अन्दर से जाता रहेगा और सरकार को जो करोड़ों का  अतिरिक्त व्यय करना होगा वो अलग. ये एक ऐसा निर्भर वर्ग होगा जो एक तरह से सरकार के अनुदान पर स्थायी तौर पर आश्रित रहेगा. हमे ये भी ध्यान देना होगा कि दिन बढाने मैं जो अतिरिक्त व्यय आयेगा वो सार्वजनिक फंड से ही निकाला जायेगा और अभी नरेगा के अंतर्गत होने वाले कामो की गुणवत्ता की भी गारंटी नहीं है.

कृत्रिम रोज़गार पैदा करने जैसे आरोप पहले से झेल रही मनरेगा स्कीम को कमज़ोर तबके के लिए एक सामाजिक सुरक्षा कवर की तरह तो लिया जा सकता है परन्तु यदि इस कवर का विस्तार किया जाता है तो ये फिर एक सरकारी रोज़गार (नौकरी) की योजना बन कर रह जायेगी. जिस तरह एक समय पर सालों साल भारतीय रेल में भारी संख्या में लोगो को भर के हम ने विश्व के सबसे बड़े 'एम्प्लायेर' को तो जन्म दे दिया पर ये 'एम्प्लायेर' एक ऐसा हाथी साबित हुआ जो अपना भार उठाने में असमर्थ हो गया. वोट बैंक राजनीति में रियायतों की भूमिका अहम होती है पर देश को यदि तरक्की की राह पर ले जाना है तो दृष्टिकोण को और अधिक व्यापक बनाना होगा. मनरेगा जैसी योजनाओं के अलावा ये भी ज़रूरी है कि हम ग्रामीण क्षेत्रों में औद्योगीकरण को बल दें और दूसरे तरीकों से गरीब जनता तक नौकरियां उपलब्ध कराएं और उनका शहरों की और पलायन रोकें.

इस परिपेक्ष्य में महाराष्ट्र की EGS ( रोज़गार गारंटी योजना) का ज़िक्र करना ज़रूरी है. ६० के दशक में चालू हुई ये योजना एक तरह से मनरेगा की जनक है और विभिन्न लोक नीति कार्यक्रमों के लिए एक मॉडल सरीखी है. इस स्कीम के तहत बेरोजगार ग्रामीण लोगों को अकुशल श्रम के बदले में एक न्यूनतम वेतन दिया जाता है जो चालू बाज़ार रेट से कम होता है. इस का ये लाभ देखा गया कि बेरोजगार वर्ग को जैसे ही कहीं और बेहतर वेतन प्राप्त होता दिखता है, वो इस सरकारी स्कीम को छोड़ आगे बढ़ जाता है. बाज़ार भाव या उससे ज्यादा का आकर्षण मायने रखता है. इस तरह यह स्कीम बेरोज़गारी कि स्थिति में सिर्फ आय की गारंटी देती है, स्थायी रोज़गार की नहीं. हमारे देश की जनता का पेट भरना सरकार की ज़िम्मेदारी है पर एक पूर्णतह सरकार पर निर्भर वर्ग पैदा करना हितकर नहीं होगा.

- स्निग्धा द्विवेदी