समाज व्यवस्था ऐसी होनी चाहिए जो प्रत्येक को अपने हित के लिए जीने का मौका दे -ओशो
मेरे प्रिय आत्मन !
एक मित्र ने पूछा है कि पूंजीवाद तो स्वार्थ की व्यवस्था है फिर भी आप उसका समर्थन कर रहे हैं ?
इस संबंध में थोड़ी सी बात समझ लेना जरूरी है। पहली बात तो यह है कि आजतक मनुष्य को जो गलत बातें सीखायी गई हैं उनमें से एक गलत बात यह है कि अपने लिए जीना बुरा है। मनुष्य पैदा ही इसलिए होता है कि अपने लिए जिये ! मनुष्य को समझाया जाता रहा है कि दूसरों के लिए जियो,अपने लिए जीना बुरा है।बाप बेटे के लिए जिये और बेटा फिर अपने बेटे के लिए जिये ; और इस तरह से न बाप जी पाए न बेटा जी पाये।समाज के लिए जियो,राष्ट्र के लिए जियो,मनुष्यता के लिए जियो,भगवान के लिए जियो,मोक्ष के लिए जियो। बस एक भूल मत कर बैठना कि अपने लिए नहीं जीना।यह बात इतनी बार समझाई गई है कि हमारे प्राणों में गहरे तक पैठ गई है कि अपने लिए जीना जैसे पाप है ,जबकि कोई आदमी अगर जिये तो सिर्फ अपने लिए ही जी सकता है और अगर दूसरों के लिए जीने भी निकलता है तो वह अपने लिए जीने की गहराई का परिणाम है,वह उसकी सुगंध है।
कोई आदमी इस जगत में दूसरे के लिए नहीं जी सकता ,असंभव है यह । मां भी बेटे के लिए नहीं जीती है और अगर बेटे के लिए मरती है तो वह मां का आनंद है। बेटा सिर्फ बहाना है । अगर नदी में एक आदमी डूब रहा हो और आप किनारे पर खड़े हों और दौड़कर जब आप उस आदमी को बचाते हैं तो शायद आप लोगों से कहें कि इस आदमी को मरने से बचाने के लिए मैंने अपना जीवन दांव पर लगा दिया। आप बिल्कुल गलत कह रहे हैं।सच्चाई यह है कि आप उस आदमी को डूबते हुए नहीं देख सके। यह आपकी पीड़ा है यह आपका कष्ट था । इस कष्ट को मिटाने के लिए आप कूदें हैं और उस आदमी को आपने बचाया है। उस आदमी का आपसे कोई संबंध नहीं और अगर आपको यह पीड़ा नहीं होती तो आप न बचाते।
अगर एक आदमी जाकर गरीबों की सेवा कर रहा है वह गरीबों की सेवा नहीं कर रहा है । अगर कह रहा है तो गलत कह रहा है।वह आदमी गरीब को गरीब देखना असंभव पा रहा है। उसके भीतर एक पीड़ा जन्म ले रही है जिसे दूर किए बगैर वह नहीं रह सकता। वह अपनी पीड़ा को दूर करने को गरीब की सेवा करने गया है। आजतक कोई मनुष्य दूसरे के लिए नहीं जिया है।सब अपने ही लिए जीते हैं।लेकिन अपने लिए जीना दो तरह का हो सकता है। एक अपने लिए जीना जिसमें दूसरों को मारना भी आ जाए ,मिटाना भी आ जाए।एक ऐसा जीना जिसमें दूसरे का जीवन भी विकसित होता हो।लेकिन परोपकार की बात बहुत खतरनाक है। जब भी हम किसी आदमी को सिखाते हैं कि दूसरे के लिए जियो ,तभी वह आदमी रुग्ण ,बीमार और अस्वस्थ होना शुरू हो जाता है।
मनुष्य का व्यक्तित्व ,मनुष्य का स्वभाव अपने लिए जीने का है। लेकिन यह सीधी साफ बात स्वीकृत नहीं है। हम इसे गाली देते हैं। हम कहते हैं यह स्वार्थ है। स्वार्थ ही स्वाभाविक है। अस्वाभाविक नहीं है स्वार्थ।अस्वाभाविक वहां होता है जहां मेरा स्वार्थ आपके स्वार्थ की हत्या करना शुरू कर देता है। इसलिए समाज व्यवस्था ऐसी नहीं होनी चाहिए जिसमें हम कहें कि समाज के लिए कुर्बानी करो।
समाज की व्यवस्था ऐसी होनी चाहिए हम प्रत्येक को अपने हित के लिए जीने का मौका दे और समाज तथा कानून एवं राज्य सिर्फ वहीं बाधा बने ,जहां कोई व्यक्ति किसी के स्वार्थ की हत्या करता हो अन्यथा समाज को बीच में आने की कोई भी जरूरत नहीं है।लेकिन तथाकथित समाजवादी,साम्यवादी चिंतन कहता है व्यक्ति का बलिदान करेंगे समाज की बलिवेदी पर। समाज है लक्ष्य, व्यक्ति को जीना है समाज के लिए और जब भी ये बड़े लक्ष्य पैदा किए जाते हैं तो व्यक्ति की कुर्बानी दी जा सकती है। फिर व्यक्ति निहत्था हो जाता है।वह कहता है कि क्या करें इतना बड़ा समाज है उसके हित में कुर्बानी देनी है।आजतक मनुष्य जाति ने जितनी भी हत्याएं की हैं वह इसी तरकीब से की हैं। कोई इस्लाम के लिए मर रहा है कोई इस्लाम के लिए मरवा रहा है कि जाओ मरो इस्लाम के लिए तो बहिश्त निश्चित है।कोई कह रहा है हिन्दू होने के लिए जियो ,हिन्दू के मंदिर की मूर्ति के लिए जियो। मूर्ति बचे तुम मिटो कोई फिक्र नहीं। तुम मर जाओ लेकिन मूर्ति को बचाओ,मंदिर को बचाओ। कोई कहता है हिन्दुस्तान के लिए जियों कोई कहता है पाकिस्तान के लिए। कोई कहता है चीन के लिए कोई कहता है समाजवाद के लिए जियो। कोई भी नहीं कहता प्रत्येक अपने लिए जियो। जबकि वही सरल और सहज है। लेकिन सरल और सहज सत्य छूट जाते हैं। हमारे ख्याल से उड़ जाते हैं।हर आदमी अपने लिए ही जी सकता है और अगर हमने जोर जबरदस्ती की तो वह पाखंडी हो जाएगा। इसलिए हमारे सेवक निश्चित ही पाखंडी हो जाते हैं क्योंकि वह जीते तो अपने लिए हैं लेकिन दिखाते फिरते हैं कि वह किसी और के लिए जी रहे हैं। नेता दिखाता है कि वह सारे राष्ट्र के लिए मरा जा रहा है । वह अपनी कुर्सी के लिए मरता है लेकिन सारे राष्ट्र की बात करता है। सारा राष्ट्र यानी कुर्सी जिस पर वह बैठा हुआ है। यदि वह कुर्सी नहीं सारा राष्ट्र कहीं भी जाए उससे कोई मतलब नहीं। राजनीतिक मरा जा रहा है देशों के लिए ,वादों के लिए ,संस्कृतियों के लिए ,सभ्यताओं के लिए ।धर्मगुरू मरे जा रहे हैं धर्मों के लिए संप्रदायों के लिए लेकिन कोई भी इन सबके लिए नहीं मर रहा है। ये सारी बातें हैं।मर रहा है अपने पद अपनी प्रतिष्ठा ,अपने अहंकार के लिए।– लेकिन इस सीधे सत्य को हम स्वीकार करेंगे ? स्वीकार न करने के कारण हिप्पोक्रेसी पैदा होती है और पाखंड इतने जाल बुनता है कि जिंदगी बिल्कुल गलत रास्ते पर भटक जाती है।
मैं आपसे कहना चाहता हूं कि स्वार्थी होना स्वस्थ होना है। इसमें कुछ भी पाप नहीं है और मैं तो मानता हूं कि महावीर ,बुद्ध या क्राइस्ट से ज्यादा स्वार्थी आदमी इस दुनिया में दूसरे नहीं हुए हैं। क्यो? क्योंकि वे निपट अपने आनंद,अपने मोक्ष ,अपनी आत्मा और परमात्मा की खोज के लिए जी रहे हैं और मजे की बात यह है कि उनसे बड़े परोपकारी कहीं भी नहीं हुए। क्योंकि जो आदमी अपने को पा लेता है वह अपने को बांटना शुरू कर देता है। जब अपने को पा लेता है तो एक नया आनंद शुरू होता है अपने को बांटने का ।जब कोई आदमी भीतर आनंद से भर जाता है तो करेगा क्या?
जो जानते हैं वे भलीभांति जानते हैं कि सेवा भी बहुत बड़ा स्वार्थ है । वह सेवा करनेवाले का आनंद है लेकिन यह आनंद तभी है होगा जब हम स्वार्थ को स्वीकार कर लें । पूंजीवाद की व्यवस्था अत्यंत नैसर्गिक व्यवस्था है। वहां हम किसी को किसी पर बलिदान नहीं कर रहे हैं। प्रत्येक व्यक्ति अपने लिए जी रहा है। जीने की खोज कर रहा है। इस खोज से दूसरे के लिए भी जियेगा।क्योंकि कोई भी व्यक्ति अकेला नहीं जी सकता है। जीने का मतलब संघर्षों में जीना है।और जब सारे लोग अपना सुख खोजते हैं तब अनिवार्यता वे शेष लोगों के लिए भी सुख का स्रोत बन जाते हैं। अगर हजार आदमी यहां बैठकर अपना सुख खोजें तो हजार गुना सुख कल पैदा हो जाएगा। वह सुख बंटेगा वह जाएगा कहां?लेकिन प्रत्येक आदमी दूसरे के लिए कुर्बानी करे और अपना सुख न खोजे और हजार आदमियों में से हर आदमी नौ सौ निन्यानवे के लिए कुर्बानी करता रहे।वहां दुख ही दुख इकट्ठा हो जाएगा। वहां सुख इकट्ठा नहीं हो सकता। मेरे मित्र जिन्होंने पूछा है –उन्होंने यही कहा है कि स्वार्थ के कारण ही तो दुनिया बर्बाद है।
मैं आपसे कहना चाहता हूं कि स्वार्थ के कारण नहीं परोपकार की अस्वाभाविक ,अवैज्ञानिक शिक्षाओं कारण दुनिया परेशान है। अगर आप सहज ही अपना सुख खोज सके तो काफी है। जन्म और मृत्यु के बीच अपना सुख खोज लें तो दुनिया आपको धन्यवाद देगी।क्योंकि जो आदमी अपना सुख खोज लेता है वह दूसरों को दुख देना बंद कर देता है। क्यों ? क्योंकि जो जानता है कि उसे सुख चाहिए वह यह भी जान लेता है कि दूसरे को दुख देकर सुख लाना असंभव है। वह दूसरों को दुख देना बंद कर देता है।और जो आदमी यह जान लेता है कि दूसरों को दुख देने से मेरा सुख कम होता है वह बहुत जल्दी जान लेता है दूसरों को सुख देने से मेरा सुख बढ़ता है। यह गणित है सीधा। यह जिस दिन दिखाई पड़ जाता है उस दिन जिंदगी में क्रांति हो जाती है।
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