स्वामीनाथन एस. ए. अय्यर

इस पेज पर स्वामीनाथन एस. ए. अय्यर के लेख दिये गये हैं। ये लेख शीर्ष बिजनेस अखबारों में स्वामीनॉमिक्स कॉलम में प्रकाशित होते हैं।

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रिश्वतखोरी के बावजूद विकास हो रहा है

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मुझे इस बात की खुशी है कि भ्रष्टाचार के मुद्दे पर आम लोगों में बहस हो रही है। मौजूदा दौर में भ्रष्टाचार की स्थिति को और अच्छी तरह से समझने के लिए मैंने तीन स्मॉल और मिडकैप कम्पनियों के प्रमुखों के साथ भोजन के दौरान चर्चा की।

उनकी फौरी प्रतिक्रिया यही थी कि हालात तेजी से बिगड़े हैं। ज्यादा गहराई से पूछताछ करने पर उन्होंने बताया कि राज्य और जिला स्तर पर निचले स्तर पर भ्रष्टाचार की समस्या काफी बढ़ गई है। एक कारोबारी ने कहा कि निचले स्तर के इंस्पेक्टर्स और अधिकारियों से काम करवाने में इतनी ज्यादा अड़चनें आ रहीं थीं और इतनी खीझ हो रही थी कि उन्होंने अपना मुख्य उद्योग ही बेच डाला। तीनों ने हालांकि यह माना कि निचले स्तर का भ्रष्टाचार इतना ज्यादा नहीं है कि आप अपना कारोबार फायदे के साथ न चला सकें, लेकिन यह हर दिन बढ़ने वाला सिरदर्द जरूर बन गया है।

सामाजिक खर्च तो पहले ही काफी अधिक हो रहा है

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विकास और सामाजिक खर्च को लेकर पिछले एक-दो महीने से इंटरनेट पर अर्थशास्त्रियों के बीच बहस छिड़ी हुई है। फाइनेंशियल टाइम्स द्वारा शुरू किए गए इस बहस में नोबल पुरस्कार विजेता और जाने-माने अर्थशास्त्री अमर्त्य सेन को यह कहते हुए उद्धृत किया गया कि सामाजिक खर्च में वृद्धि नहीं कर सिर्फ दोहरे अंकों की विकास दर हासिल करने पर ध्यान देना नासमझी होगी। समाचार पत्र ने इसके जवाब में नोबेल पुरस्कार के एक दूसरे दावेदार जगदीश भगवती को भी उद्धृत किया, जिन्होंने कहा कि सामाजिक खर्च बढ़ाने से अधिक जरूरी है कि उसे बेहतर तरीके से लक्षित किया जाए और उसके लिए अधिक-से-अधिक धन की व्यवस्था करने के लिए विकास दर बढ़ाने की जरूरत है और उसके लिए दूसरी पीढ़ी का आर्थिक सुधार किया जाना जरूरी है।

भारत का विकास अफ्रीका से बेहतर क्यों

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भारत आर्थिक सुधार करने में भले ही अफ्रीका से पीछे रहा, लेकिन विकास में काफी आगे निकल चुका है। भारत में ज्यादातर सुधार जीडीपी विकास दर के 6 फीसदी से बढ़कर 9 फीसदी तक पहुंचने से काफी पहले ही हो चुके थे। ब्रिटिश विद्वान जेम्स मेनर कहते हैं कि घाना और दक्षिण अफ्रीका के विचारशील लोग उनसे पूछते हैं, "भारतीय ऐसा कैसे कर पाते हैं? उनके यहां उदारीकरण हमसे कम हुआ, लेकिन उनकी विकास दर हमसे ज्यादा है और समाज में स्थिरता भी अधिक है।"

इसका जवाब मैं देना चाहुंगा। आर्थिक सफलता महज आर्थिक सुधारों पर नहीं बल्कि सांस्थानिक मजबूती और ऐतिहासिक कौशल पर भी निर्भर करती है- जिसे अर्थशास्त्री ‘आरंभिक स्थितियां’ (इनिशियल कंडीशन) कहते हैं। भारत और चीन ऐतिहासिक महाशक्तियां हैं। यहां औद्योगिक क्रांति से पहले दुनिया के संपूर्ण औद्योगिक उत्पादन का 70 फीसदी उत्पादन होता था।

बजट 2011: घाटे और विकास के बीच खींचतान

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बजट के प्रस्तुत होते ही सेंसेक्स ने 600 अंकों की छलांग लगाई, लेकिन जैसे ही निवेशकों को ये समझ आया कि बजट की कुछ बातें वित्तीय घाटे को ध्यान में रखने की बजाय आंकड़ों में सुधार और आशावाद पर अधिक आधारित है, तो सेंसेक्स को नीचे गिरते भी ज्यादा वक्त नहीं लगा।

वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी के बजट में कर प्रबंधन की कुशलता की कमी दिखाई पड़ती है, फिर भी इसमें वित्तीय स्थिति में उल्लेखनीय सुधार दिखाई पड़ती है और रसोई गैस, खाद और मिट्टी के तेल के लिए नकद सब्सिडी की एक नई नीति सामने रखता है।

वित्त मंत्री ने वित्तीय क्षेत्र के सात अहम विधेयकों पर फिर से विचार शुरू करने का संकल्प कर आर्थिक सुधारों की संभावनाएं बढ़ाई हैं। इनमें बीमा क्षेत्र में विदेशी निवेश को बढ़ाकर 49 फीसदी करने और बैंकों में विदेशी निवेशकों के मतदान अधिकार को समाप्त करने संबंधी विधेयक भी शामिल है।

संकट काल में ही पड़ते हैं कामयाबी के बीज

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बड़ी आपदाएं निरंतर आती रहती हैं। एशिया के आर्थिक संकट ने एशिया की चमत्कारिक अर्थव्यवस्था को तहस नहस कर दिया। 2007-09 की महामंदी ने वॉल स्ट्रीट के पांच शीर्ष निवेश बैंकों, सबसे बड़े बैंक (सिटी बैंक), सबसे बड़ी इंश्योरेंस कंपनी (एआईजी), सबसे बड़ी वाहन निर्माता कंपनी (जनरल मोटर्स) और सबसे बड़ी बंधक एवं बीमा कंपनी (फैनी मे और फ्रेडी मैक) को दीवालियेपन / राहत की कगार पर पहुंचा दिया। कैरिबियन सागर में हुई बीपी दुर्घटना दुनिया की सबसे बड़ी पर्यावरण त्रासदी मानी जाती है। कुछ लोगों को डर है कि ग्लोबल वार्मिंग अब तक का सबसे बड़ा मानवनिर्मित संकट होगा।

निजी पहल से निखर रही है भारत की वैश्विक छवि

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हम एक नए दशक में प्रवेश कर रहे हैं और यह सही समय है, जब हमें भारत की वैश्विक स्थिति की वास्तविकता को भली-भांति समझ लेना चाहिए। 1990 में भारत विदेशी सहायता के लिए हाथ फैलाए दिखता था, जिसने भुखमरी और गरीबी के विश्व रिकॉर्ड बनाए थे। भारत खुद को तीसरी दुनिया के नेता के तौर पर पेश करता था, लेकिन अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलनों में अन्य विकासशील देश भारत को आर्थिक और राजनीतिक रो

पुलिस को राजनीतिक नियंत्रण से मुक्त करें

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जब विकृत या गलत या उल्टी प्रोत्साहन व्यवस्था भ्रष्टाचार को दंडित करने की बजाए ईनाम देती है, तब भ्रष्टाचार बढ़ने लगता है। हमें इस विकृत प्रोत्साहन का अंत करने के लिए संस्थागत परिवर्तनों की जरूरत है।

जुगाड़ भारत का सबसे अहम संसाधन है

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लोग कई बार मुझसे ये पूछते हैं कि वाकई जुगाड़ है क्या? ग्लोबल मैनेजमेंट विशेषज्ञ भारत के तेजी से हो रहे आर्थिक विकास का श्रेय जुगाड़ को देते हैं। लेगाटम इंस्टीच्यूट के एक ताजा सर्वे में भारतीय कारोबारियों में 81 फीसदी ने ये कहा कि उनकी कामयाबी में जुगाड़ ने मुख्य भूमिका निभाई।

इनटाइटलमेंट और अधिकारों में फर्क है

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राजनेता और सामाजिक कार्यकर्ता् लगातार नए अधिकारों की बात करते हैं- काम का अधिकार, शिक्षा का अधिकार और अब भोजन का अधिकार। "अधिकार" शब्द को तोड़-मरोड़कर इनटाइटलमेंट के पर्याय में इस्तेमाल किया जाने लगा है, लेकिन दोनों में काफी फर्क है।

शहरों में हों और भी अधिक झुग्गी बस्तियां

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एक आदर्श शहर के लिए क्या-क्या जरूरी सुविधाएं हो सकती हैं? 24 घंटे बिजली और पानी? स्वच्छ वातावरण, कार, साइकिल और पैदल चलने वालों के लिए पर्याप्त चौड़ी सड़कें? शिक्षा और स्वास्थ्य की बेहतर सुविधाएं, खेल के मैदान, संग्रहालय, आदि?