स्वामीनाथन एस. ए. अय्यर
इस पेज पर स्वामीनाथन एस. ए. अय्यर के लेख दिये गये हैं। ये लेख शीर्ष बिजनेस अखबारों में स्वामीनॉमिक्स कॉलम में प्रकाशित होते हैं।
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आने वाले समय में चीन को पछाड़ देगा भारत
अगस्त 8, 2011 - 14:03पिछले कई दशकों तक भारत भुखमरी, फॉरेन एड और घूसखोरी में दुनिया में नंबर वन रहा, लेकिन साल 2000 से शुरू हुआ नया दशक हर दौड़ में पिछड़ने वाले इस देश के संभावित महाशक्ति में बदलने का गवाह बना। 21वीं सदी का एक और दशक पूरा करने पर यानी 2020 में भारत का स्वरूप क्या होगा, इस बारे में पेश हैं 8 संभावनाएं।
लोकपाल काफी नहीं, बुनियादी सुधारों की है जरूरत
अगस्त 1, 2011 - 12:31कुछ साल पहले मैंने इसी कॉलम में इस बात पर बड़ा आश्चर्य जताया था कि कैसे अमरिका के शीर्ष उद्योगपतियों को भ्रष्टाचार के मामलों में गिरफ्तार कर लिया जाता है और उन्हें सजा भी मिल जाती है, लेकिन भारत में ऐसे ही अपराधों में शामिल व्यवसायी आसानी से बच जाते हैं। भारत में दरअसल भ्रष्ट राजनेताओं ने पुलिस और न्यायिक व्यवस्था को इस तरह से अपंग बना दिया है कि तमाम स्तर की सुनवाइयों के बाद भी उन्हें दोषी साबित नहीं किया जा सकता। जाहिर है कि इस तरह का सड़ा हुआ सिस्टम धूर्त उद्योगपतियों को भी गिरफ्तार नहीं होने देगा, क्योंकि किसी भी तरह का घपला इन दोनों की मिलीभगत से ही अंजाम दिया जाता है। ऐसे में जब हमारा सिस्टम इन धूर्त राजनेताओं पर कार्रवाई करेगा, तब ही भ्रष्ट उद्योगपतियों को भी गिरफ्तार किया जा सकेगा।
गरीब राज्यों को मिल रहा है बेहतर जनसांख्यिकी लाभांश
जुलाई 25, 2011 - 13:57देश में गरीब राज्यों को बेहतर जनसांख्यिकी लाभांश (डेमोग्राफिक डिविडेंड) मिल रहा है। इस बार की जनगणना में देश की जनसंख्या वृद्धि दर में कुछ कमी दर्ज की गई है। वर्ष 2001 की जनगणना में जहां जनसंख्या वृद्धि दर 21.54 फीसदी दर्ज की गई थी, वहां इस बार की जनगणना में यह दर 17.64 फीसदी दर्ज की गई है। सबसे अच्छी बात यह है कि 0-6 वर्ष तक के बच्चों की संख्या में 3.08 फीसदी की कमी आई है।
बच्चों की संख्या में कमी होने से किसी भी क्षेत्र को जनसांख्यिकी लाभांश हासिल होता है, जिसके कारण आने वाले दशक में उन क्षेत्रों में प्रति व्यक्ति आय में काफी वृद्धि होगी। छह वर्ष तक के बच्चों की संख्या में सर्वाधिक 4.1 फीसदी की कमी उत्तर प्रदेश में हुई। बच्चों की संख्या में राजस्थान में 3.5 फीसदी, मध्य प्रदेश में 3.4 फीसदी, छत्तीसगढ में 3.1 फीसदी और बिहार में 2.3 फीसदी की गिरावट दर्ज की गई है।
साम्यवाद नहीं, सामाजिक लोकतंत्र
जुलाई 18, 2011 - 15:08सोवियत यूनियन और इसके साम्यवादी साम्राज्य के अंत की 20 वीं सालगिरह से पहले उसके सिद्धांतों पर चलने वाले भारत के एक राज्य पश्चिम बंगाल में भी साम्यवादी शासन ध्वस्त हो गया। चुनाव के बाद बृंदा करात के विश्लेषण से साफ जाहिर हुआ कि सीपीएम पहले सोवियत संघ और बाद में पश्चिम बंगाल में हार की वजहों से आंखें मूंदे बैठा है।
ब्रिटिश साम्राज्यवादी दावा करते हैं कि वे पिछड़ी नस्ल की आबादी में सभ्यता का प्रसार कर रहे थे। वामपंथी साम्राज्यवादियों ने भी उन लोगों के उत्थान का दावा किया, जिनमें क्रांतिकारी चेतना का अभाव था। अलबत्ता, पिछड़ी हुई नस्लों ने साम्राज्यवादी शासन के खिलाफ विद्रोह कर दिया, पहले ब्रिटिश उपनिवेशों में विद्रोह हुआ और 1989 में यही विद्रोह सोवियत उपनिवेशों में भी दिखाई पड़ा।
विकास की राह में विषमता की फिक्र छोड़ दें
जून 20, 2011 - 13:15लोग अगर पूरी तरह स्वतंत्र हों तो सबसे ज्यादा प्रतिभावान ( और सौभाग्यशाली ) लोग सबसे सुस्त और दुर्भाग्यशाली लोगों से कहीं ज्यादा अमीर होंगे। यानी स्वतंत्रता से असमानता पैदा होगी। कम्युनिस्ट देशों ने तानाशाही नियंत्रण के जरिए समाज में समता लाने का प्रयास किया , लेकिन वह पाखंड मात्र था। इन देशों में नियम बनाने वालों और उनका पालन करने वालों के बीच ताकत की कोई समानता मौजूद नहीं थी। स्वतंत्रता और समानता के बीच का तनाव कम करने के लिए देशों को अवसरों की समानता लाने का लक्ष्य लेकर चलना होता है , परिणाम की समानता का नहीं। इसके बावजूद अर्थशास्त्री लगभग हर जगह विषमता का आकलन परिणाम के ही पदों में करते हैं। इससे आंकड़ों का विरोधाभास उत्पन्न होता और गलत विश्लेषण सामने आता है।
ओसामा की मौत से अरब विद्रोह का हो सकता है अंत!
जून 7, 2011 - 12:27मैंने ओसामा बिन लादेन की मौत का जश्न नहीं मनाया। किसी विचार को खत्म करने से कहीं ज्यादा आसान है, किसी व्यक्ति को मार देना। ओसामा की मौत के बाद भी उसके जेहाद की विचारधारा जिंदा रहेगी।
वो 9/11 का मास्टरमाइंड था और जेहाद की दुनिया का सबसे बड़ा चेहरा बन चुका था। हालांकि लंबे वक्त से वो जेहादी गतिविधियों से सीधे तौर पर नहीं जुड़ा था, लेकिन इस बीच उसने अलकायदा के विरोधी मुस्लिमों की हत्या करवाने का घृणित काम किया था।
गरीबी बनी मुनाफे का जरिया
मई 9, 2011 - 11:16जातिवादी समर्थक इस बात पर जोर देते हैं कि जनगणना में जाति से जुड़े सवाल भी होने चाहिए ताकि जातियों का सही-सही अनुपात सामने आ सके। जबकि विरोधियों का कहना है कि जाति आधारित जनगणना समाज को बांटने का काम करती है। वे इसके विरोध में कुछ व्यावहारिक आपत्ति जताते हैं- जाति आधारित जनगणना की घोषणा का असर ये हो सकता है कि लोग खुद को उस जाति का बताना शुरू कर दें, जिन्हें आरक्षण का लाभ प्राप्त होता है।
रिश्वतखोरी के बावजूद विकास हो रहा है
मई 2, 2011 - 12:40मुझे इस बात की खुशी है कि भ्रष्टाचार के मुद्दे पर आम लोगों में बहस हो रही है। मौजूदा दौर में भ्रष्टाचार की स्थिति को और अच्छी तरह से समझने के लिए मैंने तीन स्मॉल और मिडकैप कम्पनियों के प्रमुखों के साथ भोजन के दौरान चर्चा की।
उनकी फौरी प्रतिक्रिया यही थी कि हालात तेजी से बिगड़े हैं। ज्यादा गहराई से पूछताछ करने पर उन्होंने बताया कि राज्य और जिला स्तर पर निचले स्तर पर भ्रष्टाचार की समस्या काफी बढ़ गई है। एक कारोबारी ने कहा कि निचले स्तर के इंस्पेक्टर्स और अधिकारियों से काम करवाने में इतनी ज्यादा अड़चनें आ रहीं थीं और इतनी खीझ हो रही थी कि उन्होंने अपना मुख्य उद्योग ही बेच डाला। तीनों ने हालांकि यह माना कि निचले स्तर का भ्रष्टाचार इतना ज्यादा नहीं है कि आप अपना कारोबार फायदे के साथ न चला सकें, लेकिन यह हर दिन बढ़ने वाला सिरदर्द जरूर बन गया है।
सामाजिक खर्च तो पहले ही काफी अधिक हो रहा है
अप्रैल 18, 2011 - 12:29विकास और सामाजिक खर्च को लेकर पिछले एक-दो महीने से इंटरनेट पर अर्थशास्त्रियों के बीच बहस छिड़ी हुई है। फाइनेंशियल टाइम्स द्वारा शुरू किए गए इस बहस में नोबल पुरस्कार विजेता और जाने-माने अर्थशास्त्री अमर्त्य सेन को यह कहते हुए उद्धृत किया गया कि सामाजिक खर्च में वृद्धि नहीं कर सिर्फ दोहरे अंकों की विकास दर हासिल करने पर ध्यान देना नासमझी होगी। समाचार पत्र ने इसके जवाब में नोबेल पुरस्कार के एक दूसरे दावेदार जगदीश भगवती को भी उद्धृत किया, जिन्होंने कहा कि सामाजिक खर्च बढ़ाने से अधिक जरूरी है कि उसे बेहतर तरीके से लक्षित किया जाए और उसके लिए अधिक-से-अधिक धन की व्यवस्था करने के लिए विकास दर बढ़ाने की जरूरत है और उसके लिए दूसरी पीढ़ी का आर्थिक सुधार किया जाना जरूरी है।
भारत का विकास अफ्रीका से बेहतर क्यों
मार्च 22, 2011 - 12:51भारत आर्थिक सुधार करने में भले ही अफ्रीका से पीछे रहा, लेकिन विकास में काफी आगे निकल चुका है। भारत में ज्यादातर सुधार जीडीपी विकास दर के 6 फीसदी से बढ़कर 9 फीसदी तक पहुंचने से काफी पहले ही हो चुके थे। ब्रिटिश विद्वान जेम्स मेनर कहते हैं कि घाना और दक्षिण अफ्रीका के विचारशील लोग उनसे पूछते हैं, "भारतीय ऐसा कैसे कर पाते हैं? उनके यहां उदारीकरण हमसे कम हुआ, लेकिन उनकी विकास दर हमसे ज्यादा है और समाज में स्थिरता भी अधिक है।"
इसका जवाब मैं देना चाहुंगा। आर्थिक सफलता महज आर्थिक सुधारों पर नहीं बल्कि सांस्थानिक मजबूती और ऐतिहासिक कौशल पर भी निर्भर करती है- जिसे अर्थशास्त्री ‘आरंभिक स्थितियां’ (इनिशियल कंडीशन) कहते हैं। भारत और चीन ऐतिहासिक महाशक्तियां हैं। यहां औद्योगिक क्रांति से पहले दुनिया के संपूर्ण औद्योगिक उत्पादन का 70 फीसदी उत्पादन होता था।
