स्वामीनाथन एस. ए. अय्यर

इस पेज पर स्वामीनाथन एस. ए. अय्यर के लेख दिये गये हैं। ये लेख शीर्ष बिजनेस अखबारों में स्वामीनॉमिक्स कॉलम में प्रकाशित होते हैं।

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जब दोषियों को सजा हो तभी फायदा है भंड़ाफोड़ का

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क्या राबर्ट वढेरा के बारे में भंडाफोड़ भ्रष्टाचार को खत्म कर देगा ? या यह एक और सनसनी है जो मध्यम वर्ग को कुछ सप्ताह तक झनझनाती रहेगी और फिर उसे भुला दिया जाएगा। क्या राजनीति भारत का अबतक का सबसे बड़ा धंधा है?

चुनाव आयोग, सुप्रीम कोर्ट और सीएजी की चुनौती

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आज की भारतीय राजनीति राजनीतिज्ञों से कम और सुप्रीम कोर्ट और महा लेखा नियंत्रक (सीएजी)द्वारा ज्यादा संचालित हो रही है।इसका भारतीय राजनीति पर क्या असर पड़ेगा?

भारत में सूखा अब बहुत बड़ी आपदा नहीं

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इस वर्ष मानसून बहुत कमजोर रहा जैसा 1965 में रहा था। लेकिन इस बार इसे थोड़ी बड़ी असुविधा से ज्यादा महत्व नहीं दिया जा रहा जबकि 1965 में यह दैत्याकार और भयावह आपदा थी। भारत पर अब सूखे का असर न पड़ना एक यशोगाथा है लेकिन  ऐसी जिसे आमतौर पर गलत समझा गया है।

मनमोहन सिंह से महत्वपूर्ण आर्थिक सुधारों की उम्मीद मत कीजिए

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प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह अब वित्तमंत्री भी बन गए हैं। उनका वित्तमंत्री के रूप में पहला कार्यकाल(1991-96) आर्थिक सुधार का महत्वपूर्ण कालखंड़ था जिसने भारत को अंतर्राष्ट्रीय भिखारी से संभावित महाशक्ति में बदल दिया। क्या मनमोहन सिंह के वित्तमंत्री के रूप में दूसरा कार्यकाल में भी वैसे ही साहसिक सुधार देखने को मिलेंगे?

आकाश टेबलेट में जनता के पैसे डुबोने से बेहतर है छात्रों को वाउचर दिए जाएं

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राजनीतिज्ञ औद्योगिक क्षेत्र के विजेता उत्पादों को चुनना और उन्हें ,सब्सिडी देना पसंद करते हैं । भ्रष्ट राजनीतिज्ञ विजेताओं की मदद करने के लिए उनसे रिश्वत लेते हैं। लेकिन बुद्धिमान और ईमानदार राजनीतिज्ञों को विश्वास होता है कि किउन्होंने वह दिमाग और नजरिया पाया है जो बाजार से आगे जाकर सोच सकते है।

सकल घरेलू उत्पाद में तेजी से वृद्धि गरीबी का सबसे कारगर इलाज

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सकल घरेलू उत्पाद में तेजी से वृद्धि गरीबी का सबसे कारगर इलाज है। यही मुखर  संदेश है वर्ष  2009-10 के गरीबी के बारे में आंकड़ों का।2004-05 और 2009 -2010 के बीच 8.5 प्रतिशत  प्रतिवर्ष की रेकार्ड विकास दर ने 1.5 प्रतिशत प्रतिवर्ष की  रेकार्ड दर से गरीबी घटाई है। यह आंकड़ा  इससे पहले के 11वर्षों में गरीबी घटने की 0.7 प्रतिशत प्रतिवर्ष की दर के आंकड़े से द

आम बनिया आम आदमी नहीं

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सरकार द्वारा बहु-ब्रांड खुदरा में 51 प्रतिशत प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की अनुमति के खिलाफ बीते हफ्ते पांच करोड़ दुकानदारों और व्यापारियों ने बंद का आह्वान किया। असलियत में यह साबित करता है कि छोटे व्यापारियों का वह दावा कितना खोखला है, जिसमें वे खुद को असंगठित क्षेत्र का कमजोर प्रतिनिधि बताते हैं। हड़ताल पर गए पांच करोड़ ये व्यापारी देश के समूचे संगठित क्षेत्र के कामगारों (3 करो

तब भी जीत सकती है टीम अन्ना

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टीम अन्ना की छवि धूमिल हो रही है। ऐसा किरण बेदी, अरविंद केजरीवाल और भूषणों के गैर-गांधीवादी व्यवहार के कारण हुआ है। कांग्रेस व अन्य पार्टियों के नेता इस बात पर चुटकी ले सकते हैं, लेकिन उन्हें यह मुगालता कतई नहीं पालना चाहिए कि भ्रष्टाचार को लेकर जनता का गुस्सा राई भर भी कम पड़ा है। अन्ना हजारे द्वारा आम जन के इस गुस्से को बखूबी उभारकर एक दिशा दे दी गई है, लेकिन इसकी ताकत जनलो

खनन रॉयल्टी से जनजातियों को मिलेगा अधिक फायदा

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आखिरकार जमीन और जंगल के अन्यायपूर्ण राष्ट्रीयकरण की नीतियों में आंशिक सुधार का रास्ता तैयार हो रहा है। मंत्रियों के एक समूह ने एक खनन विधेयक को मंजूरी दे दी है, जिसमें यह व्यवस्था की गयी है कि स्थानीय समूहों (आदिवासियों या ग्रामीणों) को कोयले के खनन से होने वाले लाभ में 26 फीसदी हिस्सेदारी दी जाएगी और अन्य खनिजों के खनन के मामले में राज्य सरकार को पिछले साल दी गई रायल्टी के बराबर राशि ग्रामीणों को भी दी जाएगी।

गरीबी पर मध्यवर्ग का ढोंग

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गरीबी रेखा के हालिया विवाद से दो चीजें साबित होती हैं। पहली, संख्याओं को अलग-अलग तरीके से रखकर आंकड़ों का भ्रम पैदा किया जा सकता है। दूसरी, भारतीय मध्यवर्ग में दोहरे चरित्र और गरीबी को झुठलाने की बीमारी है। सुप्रीम कोर्ट में दायर योजना आयोग के हलफनामे के बाद मीडिया में भूचाल आ गया। ये कोई नए आंकड़े नहीं थे, बल्कि विश्लेषक इनसे पहले से परिचित थे। इसमें शहरों में रोजाना 32 रुपये कमाने वाले को गरीबी रेखा के ऊपर माना गया। इसी तरह ग्रामीण क्षेत्रों के लिए यह आंकड़ा 26 रुपये रखा गया है। मीडिया और मध्यवर्ग चीख-चीखकर यह सवाल पूछने लगे कि कैसे कोई इतने कम पैसों में गुजारा कर सकता है। कई रिपोर्टों का हवाला दिया गया, जिनके मुताबिक पटरी पर रेहड़ी लगाने वाले भी रोजाना बस किराए में ही 32 रुपये खर्च कर देते हैं।